कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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प्रतियां दी हैं, उन लोगोंने छपी हुई ? । २ प्रतिके साथ अपनी हस्त लिखित प्रतिभी वापस पाने के इरादेसेही दिये हैं ।
इसके अतिरिक्त धर्ममें व्यापारके प्रवेशके कारण एकही कवीरके नाम लेनेवालोंमें निजनिज शाखाओंकी श्रेष्ठता दिखानेके लिये लोभ और तृष्णा द्वारा इतनी स्वार्थ परता और विचारशून्यता आ गयी है कि, जिस प्रकार वंश-घरवालोंने प्रत्येक ग्रन्थोंमें मिलौनी कर, अपनी श्रेष्ठता मानता बढानेके लिये, सबको कालदूत कहना आरंभ कर दिया था, उसी प्रकार अपने को सर्व श्रेष्ठ बतलानेवाली एक शाखाके कुछ अदूरदर्शी व्यक्तियोंने प्रत्येक वाणी-जिनमें धर्मदास साहबका नाम आया है-उसमेंसे धर्मदास शब्दको निकालकर, उसके बदले कुछ और ही रखना आरंभकर दिया है । पुरानी वाणियोंमेंसे धर्मदास-जीका नाम उनने निकाला तो निकाला, किन्तु थोडे दिनोंकी बनी गुरुमहिमामेंसेभी अंतिम साखी जिसमें धर्मदासजीका नाम आता है, निकालकर छपवाया है । यह गुरु महिमा श्रीमहंत शंबुदासजी कृत है ।
इस प्रकार धर्मदासके नामको लुप्त करनेका प्रयत्न सूर्य्यपर धूल डालने के समान है, इससे उनकी शाखाका गौरव नहीं बढता है किन्तु उलटा उनकी निन्दा होती है। भला वह कहाँ तक धर्मदासका नाम मिटानेका प्रयत्न करेंगे। कवीरके साथही साथ धर्मदासका नाम तो इतना अटल अविनाशी हो गया है कि, इन थोडेसे धर्मदास द्वेषियोंके सिवाय सब पंथवाले धर्मदासकी श्रेष्ठताको स्वीकार करते हैं और कवीर धर्मदासके सम्वादवाले ग्रंथोंको पढकर अपना कल्याण चाहते हैं।
ऐसेही सब बातोंको विचारकर इस “कवीरपंथी शब्दावली” के सम्पादनमें मुझे प्रवृत्त होना पडा है।
इस संग्रहमें कई विभाग करके अलग अलग विषयोंको संक्षेपमें दर्शानेका प्रयत्न किया है । जो वाणी प्रत्यक्षमें दूसरोंकी है । उन्हें अगले विभागोंमें रखा है और जिन वाणियोंमें कवीरकेही नाम आते हैं वे सब इकट्ठा संग्रह किया है। इस वाणी जंगलमेंसे खास कवीरकी वाणीको परखनेकी कुंजीभी इसीमें छाप दी है। तथापि पाठकोंको अधिकार है अपने ज्ञान पहुँच और रुचिके अनुसार लाभ उठा सकते हैं ।
कवीरपंथी शब्दावली २