भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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भूमिका ।

इसी प्रकार सद्गुरु कबीर, आदिसे अंत तक, जीवोंको कालसे वचनेके लिये, शब्दकी पारख करनेकी शिक्षा देते हैं। संसारमें शब्द जालही ऐसा जाल है जिसमें फँसकर जीव सुखदुख आवागमन जन्म मरण आदि द्वंद्वजमें पडकर अनन्त कष्ट भोगा करते हैं। इसी लिये सद्गुरुने उन शब्दजालोंको काटनेके लिये सत्य शब्द प्रकट कर जीवोंको दुखसे छूटनेका मार्ग बतलाया है। जिस प्रकार लोहेको काटनेके लिये लोहे की ही छेनी हथोड़ा और निहायकी आवश्यकता होती है, उसी प्रकार शब्दोंसे ही शब्दकी परख कर, उसकी कोर कसर को निकाल हंसके समान सारवस्तु को ग्रहण करनेका आदेश सद्गुरुने दिया है। किन्तु काल और कर्मके प्रतापसे, सत्यकी ओर बहुत कम लोगोंका झुकाव होता है और मायिक संसारमें लोग विशेष प्रवृत्त होकर काल कर्म कोही सत्य मानकर यथार्थ सत्यकी उपेक्षा करते हैं। यद्यपि यह दशा देखकर, उत्साह भंग हो जाता है, वृत्ति इस ओर जानेसे अटकती है, तथापि सद्गुरुके आदेश “धर्मदास मैं—तोहि सुनावा। कै कै बार जिवन पर आवा ॥ जीवनकाज फिरौं में जाई। जे चीन्हें तेहि लोक पठाई ॥ तुम क्यों चिन्ता मनमें आनो। आपन काज करो मन मानों ॥” के अनुसार उसने जो कार्य सौंपा है सो करना प्रत्येक का कर्तव्य है। सद्गुरुने जन्मसेही मुझे कबीरपंथी वाणीके प्रकाशन और ग्रन्थोंके जीर्णोद्धारका कार्य सौंपा है। उसीकी आज्ञा और सहायता से आजतक मैंने निष्काम वृत्तिसे अनेक ग्रन्थोंका प्रकाशन किया कराया है, इस ग्रन्थके भी प्रकाशनमें सद्गुरुकी दयाकाही हाथ है। विशेष प्रस्तावनामें देखना चाहिये।

कवीराश्रम खरसिया स्टेशन जि० विलासपुर सी० पी० हाल कुबेरभवन राष्ट्रियशाला रोड विले पारले, बंबई. ता० २७-१०-३१

भवदीय

श्रीयुगलानन्द विहारी (आचार्य कवीराश्रम)

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