भारतकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 442 में से

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पृष्ठ 274

का सम्मोहन करके सुधांशु के साथ चन्द्रिका की भाँति उनके साथ उस देवी ने रमण किया था।

बेताल भैरव उत्पत्ति

और्व मुनि ने कहा-इसके अनन्तर वे काल क्रम से ही महान् बल वाले प्रवृद्ध हो गये थे। वे शस्त्रों और अस्त्रों के ज्ञान में कुशल थे और शास्त्रों के अर्थों में परिनिष्ठत थे। वे यौवन के सम्प्राप्त करने वाले थे तथा परम दीप्त एवं परिपन्थियों के द्वारा दुर्धर्ष थे अर्थात् शत्रुगण उनके तेज को सहन नहीं कर सकते थे। वे धर्म और अर्थ के ज्ञान में परम प्रवीण थे तथा ब्रह्मण्य एवं सत्यवादी थे। वहाँ पर प्रीति से वेताल और भैरव सर्वदा सहचर थे। अलर्की, दमन और उपरिचर ये तीन थे। चन्द्रशेखर भाई सदा नित्य साथ में चरण करने वाले थे। राजा के तीन पुत्रों में जो उपचार प्रभृति थे उनमें अधिक ममत्व उसका था। किन्तु दो नित्य अधिक प्रीति और स्नेह वाले थे। चन्द्रशेखर नृप की वेताल और भैरव में भी वैसी प्रीति नहीं थी जैसी उनमें होती थी। वह चन्द्रशेखर नृप उन दोनों को देखकर कभी भी निरन्तर आह्लादित नहीं होता था अथवा पुत्र की बुद्धि से चाहता भी नहीं था। वे दोनों वीर धर्म में कुशल थे और महान् बल तथा पराक्रम से समन्वित थे। वे दोनों लोकों के विजय करने में दक्ष थे तथा शास्त्रों एवं अस्त्रों की विद्या में पारगामी थे।

नृप उन दोनों से डरा करता था कि ये दोनों वेताल और भैरव किस समय में मुझे-सुतों को अथवा राज्य को नष्ट कर देंगे। इसी चिन्ता में राजा नित्य ही वेताल और भैरव इन दोनों पुत्रों को भली भाँति प्रणत भी देखा करता था। इसके अनन्तर राजा ने उपरिचर को युवराज्य पद पर अभिषेक कर दिया था। वह सबसे बड़ा और समस्त राजाओं के गुणों से संयुत औरस पुत्र था। जो पीछे नीतियों के द्वारा समस्त राजाओं को योजित करेगा। उपरिचर नाम वाला समस्त शास्त्रों के अर्थों में पारंगत था। राजा ने दमन के लिए तथा अलर्क के लिए