कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
पृष्ठ 273, कुल 442 में से
संदर्भ में पढ़ेंथा और उमा के मुखचन्द्र पर ही अपने नेत्रों को चकोर के ही भाँति बना लिया था अर्थात् वे सर्वदा उसके ही मुख का अवलोकन किया करते थे। किसी समय गिरिजा के लिए पुष्पों का समाहरण करके भगवान् शंकर अत्यन्त सुन्दर माला बनाया करते थे जो कि उसके सर्व अंगों में नीचे तक लटकने वाली होवे । किसी समय दर्पण में एक ही साथ अपना मुख और उमा देवी का मुख वृषभध्वज देखा करते थे। किसी अवसर पर कस्तूरिकाओं के द्वारा गन्धपत्रकों के विलेपनों से दोनों स्तनों पर भगवान् शंकर विलेपन किया करते थे। भगवान् शम्भु अम्बिका के शरीर पर गन्धसार का विलेपन करते थे और ललाट पर लगाकर उसे सुन्दर किया करते थे। चन्द्र के सामन घनी सन्धियों वाले उमा देवी के निर्माश से संसक्त केशपाशों में चित्रक लिखा करते थे। चन्दन, अगरु (गूगल), कस्तूरी और कुंकुम के विलोपनों के द्वारा विचित्र कर दिया करते थे। जिससे उन देवी का केशपाश विशेष रूप से शोभायमान हो जाता था। जो केशपाश नृत्य करने के लिए अवतीर्ण मयूर के पुच्छ की समता का धारण करने वाला हो जाया करता था। वृषभ ध्वज सुवर्ण से परिपूर्ण मनोहर कुण्डल आदि अलंकारों को उमादेवी के देह में समाकर्षित किया करते थे। उन सुवर्ण से विनितयोजित अलंकारों से गिरिजा देवी का शरीर जलदों से आपूर्ण तड़ित गणों से कालिका की ही भाँति शोभित हो रहा था। सम्पूर्ण दिव्य अलंकारों, अनेक प्रकार के रत्नों तथा सुन्दर वस्त्रों से पूर्ण रूप से मण्डित हुई काली ने प्रकृति देवी की सदृश्यता को धारण किया था। इस प्रकार से जगत् के पति भगवान् शम्भु सर्वदा उस काली में अनुराग से युक्त हो गये। उन्होंने जगत् के हित के लिए काली के साथ क्रीड़ा की थी। जगतों की माता, महामाया, जगन्माया काली, योगनिद्रा, जगत् की बुद्धि विद्या और अखिलविद्या के स्वरूप वाली थी। वह परमाभूति-प्रकृति और सर्ग-स्थिति और संहार के करने वाली थी। वह जगतों की हित की इच्छा करने वाली इसी कारण के भगवान् शंकर