कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
का श्रवण करके हर्ष से समन्वित हो गया और मन्द मुस्कान से संयुक्त होकर उसने मुनि से यह पूछा-उस सती गिरिजा देवी ने शंकर भगवान् के शरीर का आधा भाग कैसे हरण किया था ? हे द्विजश्रेष्ठो! उसे ही मैं श्रवण करना चाहता हूँ । जिस नीति से अपनी आत्मा का अर्थात् अपने आपका भार्या का अथवा सुत का योजन करना चाहिए उस नीति का और सदाचार संहिता का भी मैं श्रवण करना चाहता हूँ । हे द्विज, राजनीति, सत्पुरुषों की नीति और अन्य कृतात्माओं की नीति का मैं पृथक्-पृथक् श्रवण करने की इच्छा वाला हूँ। मैं आपकी प्रार्थना करता हूँ। हे ब्रह्मन्! यदि यह परम गोपनीय हो तो भी मैं सुनना चाहता हूँ। मैं उस भाँति से आपको कोई आज्ञा नहीं दे रहा हूँ और उसके ही समान मैं श्रवण करने का इच्छुक हूँ। कृपा करके आपको मुझे बतलाना चाहिए यदि वह बतलाने के योग्य हो तो हे मुनिवर! आप कहिए। द्विजो में परम श्रेष्ठ और्व ने भी उस राजा पर कृपालु होते हुए उस महान् आत्मा वाले के प्रति कहा। और्व ने कहा-हे राजन् आप श्रवण कीजिए। आपने यहाँ पर जो-जो भी पूछा है उसे मैं आप को बतलाऊँगा। पहले पुराने समय में हिमवान् की पुत्री ने जिस रीति से भगवान् हर के शरीर का आधा भाग का हरण किया था। हे नृपोत्तम! जहाँ पर आपको जैसी नीति करना चाहिए उसे और सबका सदाचार जो भी होना चाहिए इसे क्रम से ही मैं बतलाऊँगा यह आप श्रवण कीजिए। जिस समय में महात्मा शंकर ने हिमवान् की पुत्री के साथ विवाह किया था। वह उस समय कितने काल पर्यन्त वहाँ पर उमा के साथ रहे थे अर्थात् कितना समय व्यतीत किया था। शिखर पर कुन्ज में और पर्वत की दरियों में उसके साथ रमण करते हुए भगवान् हर ने पार्वती को प्रसन्न करते हुए वहाँ पर चिरकाल तक विहार किया था। काल के समाप्त होने पर भगवान् शम्भु अपने गणों के सहित और अपनी भार्या के साथ स्वर्ग के समान कैलास पर्वत पर चले गये थे। उमा के साथ क्रीड़ा करते हुए ध्यान और आत्मा का चिन्तन त्याग दिया