BharatKosha
Back to the archive

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages
Page 39Permalink

२६२ ] [ कल्कि पुराण किङ्किणी से लोको को मोहने वाली झंकार करती हुई और आगत नरेशो के कुल, गुण, शील आदि का वर्णन श्रवण करती हुई वह हंसगति वाली राजकन्या हाथ मे रत्नमाला लिए हुए अपने चंचल अंगो से शोभा को पाती हुई और कटाक्षपूर्वक सब को देखती हुई बढ़ती जा रही थी । वह हिलते हुए कुण्डल वाली, केशकुन्तल की चंचलता से युक्त, सुन्दर ग्रीवा वाली, विकसित मुख से मद मुमकराती हुई, जिसके दांतो की पक्तियाँ चमक रही थी, लाल रंग के रेशमी वस्त्र धारण किये हुए, कोकिला जैसे कण्ठ स्वर वाली, जिसके रूप लावण्य से तीनो लोक मोहित हो रहे थे, उस मनमोहिनी सुकुमारी राज कन्या को रंगभूमि मे घूमती हुई देख- कर कामदेव के वशीभूत हुए राजागण ऐसे विह्वल चित्त होगये कि उनके शस्त्रास्त्र और वस्त्रादि सभी खुल-खुल कर पृथिवी पर गिरने लगे ।१६-२४। तस्याः स्मरक्षोभ निरीक्षणेन स्त्रियो बभूवुः कमनीयरूपाः । बृहन्नितम्बस्तनभारनम्रा सुमध्यमास्तत्स्मृतिजातरूपा. ।२५। विलासहास व्यसनातिचित्राः कान्तानन. शोणसरोज नेत्राः । स्त्रीरूपमात्मानमवेक्ष्य भूपास्तामन्वगच्छन्विशदानुवृत्त्या ।२६। अह वटस्थः परहर्षितात्मा पद्माविवाहोत्सवदर्शनाकुल. । तस्या वचोऽन्तर्हृदि दुःखितायाः श्रोतु स्थित. स्त्रीत्वमितेषु तेषु । जाहीहि कल्के कमलाविलाप श्रुत विचित्रं जगतामधीश । गते विवाहोत्सवमङ्गले सा शिव शरण्य हृदये निधाय ।२८। तान्दृष्ट्वा नृपती.गजाश्वरथिभिरत्यक्तान्सखित्व गतान् । स्त्रीभावेन समन्विताननुगतानपद्मा विलोक्यान्तिके । दीना त्यक्तविभूषणा विलिखती पादागुलै. कामिनी ॥ ईशं कर्तुं निजनाथमीश्वरवचस्तथ्य हरिसाऽस्मरत् ।२६। काम से विमोहित हुए उन राजाओ ने जैसेही उस राजकन्या को वासनामय नेत्रो से देखा वैसे ही वे जिस रूप पर लालायित हुए थे, वैसे

Page 40Permalink

पचम अध्याय ] [ २६३ ही रूप वाली कमनीय नारी का रूप उन्हे प्राप्त होगया ।२५। इस प्रकार नारी सुलभ हास, विलास, व्यसन, चातुर्य, सुन्दर मुख और कमल जैसे नेत्रो को प्राप्त हुए वे राजागण अपने को स्त्री हुए देख कर पद्मा के पीछे पीछे उसकी सहेली बनकर चलने लगे ।२६। उस समय पद्मा के विवाह का वह उत्सव देखने के निमित्त मैं पास ही के एक वृक्ष पर बैठ गया था । जब वे राजागण स्त्री रूप हो गये, तब तो पद्मा अत्यन्त शोकित ही उठी । मैं उसके विलाप को सुनता रहा । हे लोक स्वामिन् ! उस मगलमय उत्सव के इस प्रकार समाप्त हो जाने पर पद्मा ने भगवान् शकर का ध्यान कर जो विलाप किया था, उस करुण विलाप को आप श्रवण कीजिये । पद्मा ने देखा कि सभी राजागण मुझे देखते ही अपने हाथी, अश्व, रथ आदि से विलग होकर स्त्री रूप मे मेरी सहेली होकर साथ-साथ चल रहे हैं, तो वह अत्यन्त दीनतापूर्वक अपने आभूषणो को त्याग कर धरती को कुरेदने लगी । फिर वह शिवजी के वर- दान की सफलता के हेतु भगवान् विष्णु का पति भाव से ध्यान करने लगी ।२७-२६।

Page 41Permalink

षष्ठ अध्याय तत. सा विस्मितमुखी पद्मा निजजनैर्वृता। हरिं पतिं चिन्तयन्तो प्रोवाच विमला स्थिताम् ॥१॥ विमले किं कृतं धात्रां ललाटे लिखनं मम । दर्शनादपि लोकानां पुंसां स्त्रीभावकारकम् ॥२॥ ममापि मन्दभाग्याया पापित्या. शिवमेवनम् । विफलत्वं मनुप्राप्त बीजमुप्त यथोपरे ॥३॥ हरिर्लक्ष्मीपति सर्वजगतामधिप प्रभु । मत्कृतेऽप्यभिलाष किं करिष्यति जगत्पति, ॥४॥ यदि शम्भोर्वचो मिथ्या यदि विष्णुर्न मां स्मरेत् । तदाहमनले देहं त्यक्ष्यामि करिभाविता ॥५॥ शुकदेव जी बोले—तदनन्तर विस्मित मुख वाली पद्मा अपनी सहेलियो के मध्य स्थित हुई, भगवान् विष्णु को पतिरूप मे विचार करती हुई, अपने निकट स्थित विमला नाम की सहेली से कहने लगी ।१। पद्मा बोली — हे विमले ! क्या ब्रह्मा ने मेरे भाग्य मे यही लिख दिया है कि जो पुरुष मुझे देखे, वह तुरन्त स्त्रीत्व को प्राप्त हो जाय ।२। हे सखी ! जैसे मरुभूमि मे बोया गया बीज निष्फल होता है, वैसे ही मुझ अभागिनी एव पापिनी द्वारा भगवान् शकर की, की गई उपासना व्यर्थ होगई ।३। भगवान् रमापति विष्णु सम्पूर्ण विश्व के अधीश्वर और प्रभु हैं मैं उन्हे पति रूप मे प्राप्त करने की कामना करूँ तो क्या वे मुझे स्वी- कार करेगे ? ।४। यदि भगवान् शम्भु का वचन मिथ्या हो गया और भगवान विष्णु ने मेरी कामना नही की तो मैं उन्ही भगवान् श्री हरि का ध्यान करती हुई अपने देह को अग्नि कुण्ड मे डाल कर भस्म कर दूँगी ।५। २६४

Page 42Permalink

षष्ठ अध्याय ] [ २६५ क्व चाह मानुषी दीना क्वाते देवो जनार्दनः । निगृहीता विधात्राह शिवेन परिवञ्चिता ।६। विष्णौ च परित्यक्ता मदन्या नात्र जीवति ।७। इति नाना विलपिन्या वचन शोचनाश्रयम् । पद्मायाश्चरुचेष्टाया। श्रुत्वायातस्तवान्तिके ।८। शुकस्य वचनं श्रुत्वा कल्किः परमविस्मितः । त जगाद् पुनर्याहि पद्मा बोधयितु प्रियाम् ।६। मत्सन्देशहरो भूत्वा यद्रूपगुणकीर्तनम् । श्रावयित्वा पुन कीर ! समायास्यासि बांधव ।१०। कहाँ तो मैं दीन मानुषी और कहाँ वे जनार्दन प्रभु-इन दोनो मे विवाह की कल्पना करने से ही मैं तो यह समझती हूँ कि विधाता मुझ से विमुख है, तभी तो शिवजी ने मुझे वैसा वर देकर ठग लिया है- ।६। भगवान श्री हरि के द्वारा परित्यक्ता होकर मेरे अतिरिक्त और कौन जीवित रह सकता है ।७। सुन्दर चरित्र वाली पद्मावती इस प्रकार से विलाप करती थी । उसके शोकाकुल वचनो को सुनकर ही मैं आपके निकट उपस्थित हुआ हूँ ।८। शुक के यह वचन सुनकर अत्यन्त विस्मय को प्राप्त हुए कल्कि जी ने शुक के प्रति कहा—हे शुक मेरी प्रिया पद्मा को आश्वासन देने के निमित्त तुम पुनः सिंहल देश को प्रस्थान करो ।६। हे शुक ! तुम हमारे संदेश वाहक होकर पद्मा को हमारे रूप गुण का वृत्तान्त सुनाना और फिर हे खग ! तुम शीघ्र ही यहाँ लौट आना ।१०। सा मे पतिरह तस्या दैवविनिर्मितः । मध्यस्थेन त्वया योगमावयोश्च भविष्यति ।११। सर्वज्ञसि विधिज्ञोऽसि कालज्ञोऽसि कथामृते । तामाश्वास्य ममाश्वासकथास्तस्याः समाहरः ।१२। इति कल्केर्वचः श्रुत्वा शुक परमहर्षितः । प्रणम्य त प्रोतमनाःप्रययौ सिंहलं त्वरन् ।१३।

Page 43Permalink

२६६ ] [ कल्कि पुराण खगः समुद्रपारेण स्नात्वा पीत्वामृतं पय । बीजपूरफलाहारो ययौ नाजदिनिवेशमम् ।१४। तत्र कन्यापुर गत्वावृक्षे नागेश्वरे वसन् । पद्मालोक्य तां प्राह मुको मानुष भाषया ।१५। अवश्य ही पद्मा मेरी पत्नी और मैं उसका पति हूँ । विधाता ने ही यह संयोग नियत किया है और यह कार्य तुम्हारी मध्यस्थता मे ही सम्पन्न होना है । ११। तुम सर्वज्ञ हो, नियम और काल के भी ज्ञाता हो । तुम अपने वचनामृत से समझा कर और मेरे द्वारा ग्रहण किये जाने का आश्वासन देकर यहाँ लौट आओ । ।१२। कल्किजी का ऐसा आदेश पाकर मुदित हुए शुक ने उन्हें प्रणाम किया और शीघ्रतापूर्वक सिंहल- देश को प्रस्थान किया ।१३। मार्ग मे, समुद्र के पार जाकर शुक ने स्नान करके उस मृतोपम जल का पान और बिजौरे के फलको भक्षण किया और फिर राजभवन मे प्रविष्ट होगया ।१४। वह अन्त पुर मे पहुंच कर राजकन्या के निवास स्थान पर जाकर नागकेशर के एक वृक्ष पर चढ गया और पद्मा को देख कर मनुष्यो की भाषा मे उससे बोला ।१५। कुशलं ते वरारोहे ! रूप यौवन शालिनी । त्वा लोलनयनां मन्ये लक्ष्मी रूपमिवापराम् ।१६। पद्मानना पद्मगन्धां पद्मनेत्रा कराम्बुजे । कमल कालयन्तीं त्वां लक्षयामि परां श्रियम् ।१७। किं धात्रा सर्वजगतां रूपलावण्यसम्पदाम् । निर्मितासि वरारोहे ! जीवानां मोहकारिणि ! ।१८। इति भाषितमाकर्ण्य कीरस्यामितमद्भुतम् । हसन्ती प्राह सा देवी त पद्मा पद्ममालिनी ।१६। कस्त्वं कस्मादागतोऽसि कथ मा शुकरूपधृक् । देवो वा दानवो वा त्वमागतोऽसि दयापरः ।२०।

Page 44Permalink

षष्ठ अध्याय ] [ २६७ शुक ने कहा—हे वरारोहे ! हे रूप यौवन सम्पने तुम कुशल पूर्वक तो हो ? तुम अपने चंचल नेत्रो से सुशोभित द्वितीय लक्ष्मी ही प्रतीत होती हैं ।१६। तुम कमल जैसे मुख वाली, कमलगंधा, कमलाक्ष तथा कमल के समान हाथो वाली हो । अपने हाथ मे तुमने कमल धारण किया हुआ है, यह लक्षण तुम्हारा लक्ष्मी होना सूचित करता है- ।१७। हे वरारोहे ! विधाता ने क्या सम्पूर्ण विश्व का रूप लावण्य तुम्ही मे भर कर तुम्हे ही सब जीवो को मोहित करने वाली बना दियो है ।१८। शुक के यह अद्भुत वचन सुनकर पद्ममालधारिणी पद्मा ने हँस- कर कहा ।१६। तुम कौन हो ? कहाँ से आगमन हुआ है ? तुम इस शुक वेश मे देवता हो अथवा दानव ? तुम यहाँ आकर किसलिए ऐसी दया प्रदर्शित कर रहे हो ।२०। सर्वज्ञोऽह कामगामी सर्वशास्त्रार्थतत्ववित् । देवगन्धर्वभूपानां सभासु परिपूजित ।२१। चरामि स्वेच्छाया खे त्वामीक्षणार्थमिहागतः । त्वामह हृदि सतप्तं त्यक्तभोग मनस्विनीम् ।२२। हास्यालाप-सखी-सङ्ग देहाभरण-वर्जिताम् । विलोक्याह दोनचेता पृच्छामि श्रोतुमोरितम् । कोकिलालाप-सन्ताप-जनक मधुर मृदु ।२३। तव दन्तौष्ठजिह्वाग्रलुलिताक्षरपक्तय यत्कर्णकुहरे मग्नास्तेषा किं वर्ण्यते तत ।२४। सौकुमार्यं शिरीषस्य क्व कान्तिर्वा निशाकरे । पीयूष क्व वदन्त्येवानन्द ब्रह्मणि ते बुधा, ।२५। शुक ने कहा— देवी ! मैं सब कुछ जानने वाला तथा सब शास्त्रो का तत्वज्ञानी हूँ । मैं स्वेच्छापूर्वक सर्वत्र गमन क'ने मे समथ हूँ । देवता, गधर्व अथवा राजाओ की सभा मे मेरा पूर्ण सम्मान होता है ।२१। मैं गगन मडल मे अपनी इच्छा के अनुसार विचरण करता हूँ । तुम हृदय

Page 45Permalink

२६८ ] [ कल्कि पुराण मे सन्तप्त तथा भोग सुख से परे एवं मनस्विनो के दर्शनार्थ ही यहाँ आ पहुँचा हूँ ।२२। तुमने हास्यालाप, सखियोका सग और आभरणको त्याग रखा है । तुमको उस स्थिति मे देखकर दीन-हृदय हुआ मै तुम्हारी कोकिल जैसी मधुर वाणी मे तुम्हारे सन्तप्त रहने कारण जानना चाहता हूँ । २३। तुम्हारे, ओष्ठ और जिह्वा के अग्र भाग मे निसृत अक्षर पक्तियाँ जिसके कानो को सुनाई पड जाय, उसकी तपस्या का प्रभाव कहाँ तक कहा जा सकता है ? ।२४। तुम्हारे समक्ष शिरस के पुष्पो की कमनीयता भी क्या है ? तथा चन्द्रकान्ति भी क्या वस्तु है ? ज्ञानीजन जिस ब्रह्म रूपी पीयूष का वर्णन करते है, वह आनन्द भी तुम्हारी क्या समता करेगा ? ।२५। तिलकालकसमिश्र लोलकुण्डलमण्डितम् ।२६। लोलेक्षणोल्लसद्वक्नेत्र पश्यताम् न पुनर्भव. ।२७। बृहद्रथसुते ! स्वाधि वद भामिनि यत्कृते । तप क्षीणामिव तनू लक्षयामि रुज विना । कनकप्रतिमा यद्वत मासुभिर्मलिनीकृता ।२८। कि रूपेण कुलेनापि धनेनाभिजनेन वा । सर्व निष्फलतामेति यस्यदैवमदक्षिणम् ।।२६।। शृणु कीर समाख्यान यदि वा विदित तव । बाल्य-पौगण्ड-केंशोरे हरसेवा करोम्यहम् ।३०।। तुम्हारे तिलक, अलक से युक्त चचल कुण्डलो से मण्डित तथा चंचल नेत्रो से सुशोभित सुन्दर मुख का दर्शन करने वाले को पुनर्जन्म धारण नही करना होता । २६ २७। हे बृहद्रथसुते ! अपने मान- सिक दुख का कारण मुझे बताओ । हे भामिनि ! तुम्हारी देह बिना रोग के ही, तप से क्षीण दिखाई दे रही है । जैसे मैल के कारण कचन की प्रतिमा मैली हो जाती है, वैसे ही तुम्हारा देह भी मलीन होगया है ।२८। पद्मा ने कहा—धन अथवा उच्च कुल मे उत्पन्न होने से ही

प्रथम अंश: अध्याय ४-७ (सिंहल द्वीप यात्रा व पद्मावती विवाह)

Page 46Permalink

षष्ठ अध्याय ] [ २६६ क्या प्रयोजन सिद्ध होता है, अर्थात् दैव की प्रतिकूलता हो तो यह सभी निष्फल हैं ।२६। हे कीर ! यदि तुम्हे हमारा वृत्तान्तज्ञात न हो तो सुनो— मैने अपनी बाल और किशोर अवस्था मे भगवान शकर की आराधना की थी ।३०। तेन पूजाविधानेन तुष्टो भूत्वा महेश्वर । वर वरय पद्मे ! त्वमित्याह प्रियया सह ।।३१।। लज्जयेधोमुखीमग्रे स्थिता मा वीक्ष्य शङ्कर. । प्राह ते भविता स्वामी हरिनारायण प्रभु ।।३२।। देवो वा दानवो वान्यौ गन्धर्वो वा तवेक्षणात् । कामेन मनसा नारी भविष्यन्ति न सशय ।।३३।। इति दत्वा वर सोम प्राह विष्ण्वर्च्चनं यथा । तथाह ते प्रवक्ष्यामि समाहितमना शृणु ।३४। एता. सख्यो नृपा पूर्वमाहता ये स्वयम्बरे । पित्रा धर्मार्थिना दृष्ट्वा रम्या मा यौवनान्विताम् ।३५। मेरे द्वारा किये गये उम पूजन से प्रसन्न हुए शिवजी ने पार्वतीजी के सहित प्रकट होकर मुझवे कहा कि हे पद्मे ! वर माँगो ।३१। फिर मुझे लज्जा पूर्वक सिर झुकाये देख कर उन्होने कहा कि तुम्हारे पति भगवान् नारायण होगे ।३२। देवता, दानव, गन्धर्व अथवा जो कोई भी हो, यदि तुम्हे काम-भाव से देखेगा तो तुरन्त स्त्री-रूप हो जायगा, इममे सन्देह नही है ।३३। यह वर देने के पश्चात् शिवजी ने भगवान् विष्णु की जो पूजन विधि बताई थी, वह कहती हूँ, समाहित चित्त से सुनो।३४। यह जितनी भी सखियाँ हैं, सभी पहिले राजा थे । मेरे पिता ने मेरी यौवनावस्था देख कर धर्म की रक्षा के निमित्त इन सब राजाओ को मेरे स्वयम्बर मे बुलाया था ।३५। स्वागतास्ते सुखासीना विवाहकृतनिश्चय । युवानो गुणवन्तश्चरूपद्रविणसम्मता• ।३६।

Page 47Permalink

३०० ] [ कल्कि पुराण स्वयंवरगता मा ते विलोक्य रुचिरप्रभाम् । रत्नमालाश्रितकरा निपेतु काममोहिता ।३७। तत उत्थाय सभ्रान्ता सप्रेक्ष्य स्त्रीत्वमात्मन । स्तनभार नतम्बेन गुरुणा परिणामिता ।३८। ह्रिया भिया च शत्रूणा मित्राणामतिदु खदम् । स्त्रीभाव मनसा ध्यात्वा मामेवानगता शुक ! पारिचर्य्या हररता सख्य स्वगुणान्विता । मया सम तपोध्यान पूजा, कुर्व्वन्ति सम्मता ॥४०॥ तदुदितमिति सनिशम्य कीर श्रवणमुख निजमानसप्रकाशम्। समुचितवचनैःप्रतोष्य पद्मा मुरहरयजन पुन प्रचष्टे ॥४१॥ यह सभी युवावस्था वाले, रूप, गुण एव ऐश्वर्य से सम्पन्न थे । यह सभी मेरे साथ विवाह करने की इच्छा से आकर स्वयवर-स्थल मे सुखपूर्वक बैठ गये ।३६। मुझ सुन्दर प्रभा वाली को हाथ मे रत्नमाला लेकर स्वयवर-स्थल मे घूमती देखकर यह सभी काम मोहित राजागण पृथिवी पर गिर गये ।३७। फिर जब सचेत होकर उठे तो अपने को स्त्रीत्व के सभी लक्षणो से युक्त अर्थात् स्त्री रूप मे पाया ।३८। तब तो यह अपने को स्त्री हुआ जान कर बडे दुःखी हुए और शत्रु मित्र आदि की लज्जा छोड कर मेरे ही साथ चल पडे ।३६। अब यह सर्वगुण सम्पन्न नारी रूपी राजागण मेरी सखी होकर मेरे साथ ही भगवान् विष्णुका तप, ध्यान एव पूजन करते है ।४०। अपनी इच्छा के अनुकूल, सुनने मे सुख- दायक इस वार्ता को सुन कर शुक ने समुचित वाणी से पद्मा को प्रसन्न किया और फिर भगवान् विष्णु के पूजन के प्रसङ्ग मे प्रश्न किया ।४१।

Page 48Permalink

सप्तम अध्याय विष्ण्वर्चनं शिवेनोक्तं श्रोतुमिच्छाम्यहं शुभे । धन्यासि कृतपुण्यासि शिवशिष्यत्वमागता ॥१॥ अह भाग्यवशादत्र समागम्य तवान्तिकम् । शृणोमि परमाश्चर्यं कीराकारनिवारणम् ॥२॥ भगवद्भक्तियोगञ्च जपध्यानविधि मुदा। परमानन्द-सन्दोह-दान-दक्षं श्रुतिप्रियम् ॥३॥ श्रीविष्णोरर्चनं पुण्यं शिवेन परिभाषितम् । यच्छ्रद्धयानुष्ठितस्य श्रुतस्य गदितस्य च ॥४॥ सद्य पापहरं पुंसां गुरुगोब्रह्मघातिनाम् । समाहितेन मनसा शृणु कीर यथोदितम् ॥५॥ शुक बोला—हे शुभे ! शिवजी ने भगवान् विष्णु की जो पूजा- विधि तुम्हे बताई थी, उसे मैं सुनना चाहता हूँ। तुम धन्य हो, तुम अपने पुण्य कर्म द्वारा भगवान् शिव की शिष्या हो गई हो ।१। मैं भाग्य- वशात् ही यहाँ आ पहुँचा हूँ । अब मैं अपने शुक-शरीर का निवारण करने वाली आश्चर्यमयी पूजन विधि का श्रवण करूँगा ।२। भगवान् विष्णु का जप-ध्यान एवं पूजन की यह विधि भगवद्भक्ति के देने वाली, श्रवण मे सुखद एवं परमानन्ददायिनी है ।३। पद्मा ने कहा—शिव-वर्णित विष्णु के पूजन की विधि अत्यन्त पुण्यमयी है । इसके श्रद्धापूर्वक सुनने, अध्ययन करने या कहने से गोहत्या, गुरुहत्या और ब्रह्महत्या के पाप भी नष्ट हो जाते हैं । हे कीर ! इसका वर्णन शिवजी ने जिस प्रकार किया था, उसे समाहित चित्त से सुनो ।४-५। ( ३०१ )

Page 49Permalink

३०२ ] ] कल्कि पुराण कृत्वा यथोक्तकर्माणि पूर्वाह्ने स्नानकृच्छुचिः । प्रक्षाल्य पाणी पादौ च स्पृष्ट्वापः स्वासने वसेत् ।६। प्राचोमुखः संयतात्मा साङ्गन्यास प्रकल्पयेत् । भूतशुद्धिं ततोऽर्घ्यस्य स्थापनं विधिवच्चरेत् ॥७॥ ततः केशवकृत्यादिन्यासेन तन्मयो भवेत् । आत्मानं तन्मयं ध्यात्वा हृदिस्थं स्वासने न्यसेत् ॥८॥ पाद्यार्घ्याचमनीयाद्यैः स्नानवासोविभूषणैः । यथोपचारैः संपूज्य मूलमन्त्रेण देशिकः ॥६॥ ध्यायेदापादमकेशान्तं हृदयाम्बुजमध्यगम् । प्रसन्नवदनं देवं भक्ताभीष्टफलप्रदम् ॥१० प्रातः काल स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर हाथ-पांवों का प्रक्षालन कर, जल स्पर्श करके अपने आसन पर बैठ जाय ।६। फिर संयतात्मा होकर पूर्वाभिमुख हो और अङ्गन्यास भूतशुद्धि तथा विधिवत् अर्घ्य स्थापन करे ।७। फिर केशव कृत्यादि न्यास युक्त होकर हृदय में विष्णु का ध्यान करता हुआ, उन्हें कल्पित आसन पर प्रतिष्ठित करे ।८। फिर पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नानार्थ जल, वस्त्राभूषण आदि भेंट करे और यथोपचार देशिक मूलमंत्र से पूजन करे ।६। तदुपरान्त भक्तों को इच्छित फलदायक, हृदयाम्बुज में रमण करने वाले, प्रसन्न मुख भगवान् विष्णु का चरणकमलों से केश पर्यन्त ध्यान करे ।१०। योगेन सिद्धिविबुधैः परिभाव्यमानं लक्ष्म्यालयं तुलसिकाञ्चितभक्तभृङ्गम् । प्रोत्तुङ्गरक्तनखराङ्ग- लिपत्रचित्रं गङ्गारसं हरिपदाम्बुजमाश्रयेऽहम् ॥११ गुल्फन्मर्माणप्रचयघटितराजहंससिञ्चत्सुनूपुरयुतं पदपद्मवृत्तम् । पीताम्बराञ्चलविलाललवलत्पता- कं स्वर्णान्त्रिकक्वलयञ्च हरेः स्मरामि ।१२ जंघे सुपर्णगलनीलमणिप्रवृद्धे शोभास्पदारुण- मणिद्युतिचंचुमंध्ये । आरक्तपादतललम्बनशो-

Page 50Permalink

सप्तम अध्याय ] [ ३०३ भभाने लोकेक्षणोत्सवकरे च हरे स्मरामि। १३ ते जानुनी मखपतेर्भजमूलसङ्गरङ्गोत्सवावृतत- डिद्वसने विचित्रे। चञ्चत्पतत्रमुखनिर्गतसामगीन विस्तारितात्मयशसी च हरे स्मरामि॥ १४ विष्णो कटिं विधिकृतान्तमनोजभूमि जीवाण्ड- कोषणरासङ्गदुकूलमध्याम्। मानागुणप्रकृतिपी- तविचित्रवस्त्राध्यायेन्निबद्धवसना खगपृष्ठसंस्थाम्। १५ ध्यान के पश्चात् "ॐ नमो नारायणाय स्वाहा" कहे और इस स्तोत्र का उच्चारण करे-योग के द्वारा सिद्ध हुए ज्ञानीजन जिनके ध्यान में सदा रत रहते हैं, जो लक्ष्मी के आश्रय हैं, जिनके भक्तगण भृङ्ग रूपी तुलसी का सदा सेवन करते हैं, जिनके लोहित वर्ण कमलो- पम नखयुक्त अँगुलिपद्मों से गङ्गाजल निकल रहा है, उन कमल जैसे चरणों वाले नारायण की शरण लेता हूँ ॥ १॥ जिनके चरणों में विभू- षित मणिमान् युक्त नूपुर हंस के कलरव जैसा शब्द करते हैं, जिन चरणों में पीताम्बर का छोर उड़ती हुई ध्वजा जैसा लगता है, जिन चरणों में स्वर्णिम त्रिवक्र नामक कड़ा शोभित है, उन कमल के समान चरणाम्बुजों का मैं स्मरण करता हूँ ॥२॥ गरुड के कण्ठ भूषण रूप नीलकान्त मणि की प्रभा से समुज्ज्वल जिन जंघाओं के मध्य में गरुड की अरुण- मणि के समान लाल चोंच सुशोभित है, जिन जंघाओं के नीचे लाल पादतल स्थिर हैं, उन विश्व-लोचन के परमानन्द रूप भगवान् की जंघाओं का मैं स्मरण करता हूँ ॥३॥ सामगान के द्वारा गरुड जिनका यशोगान करते हैं, उत्सव के अवसर पर चित्र विचित्र रंगों से युक्त वस्त्रों की विद्युत् आभा से विभूषित भगवान् की उन जंघाओं का स्मरण करता हूँ ॥४॥ ब्रह्मा, काल और कन्दर्प की आश्रयभूता जो कटि है तथा जो कटि दुकूल से सुशोभित रहती है, गरुड की पीठ पर स्थित विष्णु की उस कटि का मैं ध्यान करता हूँ ॥५॥

Page 51Permalink

३०४ ] [ कल्कि पुराण शातोदरं भगवतस्त्रिवलिप्रकाशभावर्त्तनाभि- विकनद्विधिजन्मपद्मम् । नाडीनदीगणरसोत्थ- सितन्त्रसिन्धु ध्यायेऽण्डकोषनिलय तनुरोमरेखम् । १६ वक्षः पयोधितनयाकुङ्कुमेन धारेण कौस्तु- भमणिप्रभयां विभातम् । श्रीवत्सलक्ष्म हरि च- न्दनप्रसूममालोचित भगवतः सुभग स्मरामि । १७ जो उदर त्रिवाली से सुशोभित हैं, जिस उदर के नाभि कमल से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए हैं, जिस उदर मे नाडी रूपी सरिताओ के रथ से अन्त्र रूप समुद्र तरगित हो रहा है, ब्रह्माण्ड के आश्रय रूप जिस उदर मे लोभ रेखाएं सुशोभित है, भगवान् के उस उदर का मैं स्मरण करता हूँ ।१६। जिस हृदय मे समुद्रजा लक्ष्मी के वक्षस्थल की केसर लगी हुई है, जो हृदय कठहार ओर कौस्तुभ मणि से दमक रहा है, जो हृदय श्रीवत्स के चिह्न से युक्त है और जिस पर हरिचन्दन फूलो की माला विभूषित है उस प्रभु-हृदय का मैं स्मरण करता हूँ ।१७। बाहू सुवेशसदनौ वलयाङ्गदादिशोभास्पदौ दुग्ति दैत्यविनाशदक्षौ । तौ दक्षिणौ भगवतश्च गदासु- नाभतेजोजितौ सुललितौ मनसा स्मरामि । १८ वामौ भुजौ मुररिपोर्धृतपद्मशंखौ श्यामौ करीन्द्रकर वन्मणिभूषणाढ्यौ । रक्ताङ्गुलिप्चयचुम्बितजानु मध्यौ पद्नालयाप्यिकरौ रुचिरौ स्मरामि । १६ कण्ठ मृणालममलं मुखपङ्कजस्य लेखाययेणावन मालिकया निवत्तम् । किंवा मुक्तिरसमन्त्रकस त्फलस्य वृन्ते चिरं भगवत सुभग स्मरामि । २० जिन श्रेष्ठ भुजाओ मे वलय अ गद आदि सुन्दर आभूषण सुशो- भित है, जो भुजाएँ असख्य दानवो का संहार कर चुकी है, जिन भुजाओ की प्रभा के समक्ष गदा और चक्र आदि अस्त्रो का तेज भी नगण्य है, मैं

Page 52Permalink

सप्तम अध्याय-१ ] ३ उन्हीं भुजाओ का मन मे स्मरण करता हूँ ।१८। हाथी की सूँड जैसी जिन भुजाओ मे मणिमय आभूषण और शङ्ख पद्म आदि विभूषित हैं, जिन भुजाओ की लाल वर्ण वाली अङ्गुलियाँ जानु स्पर्श कर रही हैं, उन कमलासना पद्मा को प्रसन्न करने वाली भुजाओ का मैं स्मरण करता हूँ ।१९। मृणाल के समान जिस कठ मे मुखारविन्द की तीन रेखाये और वनमाला सुशोभित है तथा जो कठ मोक्ष-मन्त्र के शुभफल का गुच्छा- स्वरूप हैं, उस श्रीहरि-कठ का मैं स्मरण करता हूँ ।२०। रक्ताम्बुज दशनहासविकाशरम्य रक्ताधरोष्ठधर कोमलवाक्सुधाढ्यम् । सनमानसीद्भवचलेक्षणपत्रचित्रं लोकाभिरामममलञ्च हरे. स्मरामि ।२१ शूरात्मजावसथगन्धविदसुनाश भ्रूपल्लव स्थितिल- यादयकर्मदक्षम् । कामोत्सवञ्च कमलाहृदयप्रका- श सञ्चिन्तयामि हरिवक्रविलासकक्षम् ।२२ कर्णौ लसनमकरकुण्डलगण्डलोलौ नानादिशाश्च नभसश्च विकासगेहौ । लोलालकप्रचयचुम्बनकु- ञ्चिताग्रौ लग्नौ हरेर्मणिकिरीटटे स्मरामि ।२३ भाल विचित्रतिलक प्रियचारुगन्धगग्रोचनारचतया ललनाक्षिसौख्यम् । ब्रह्मैकधाममणिदान्तिकिरीट जुष्ट ध्यायेन्मनोनयनहारकमोश्वरस्य ।२४। लाल कमल के समान लाल अधरो के मध्य मुसकराते हुए दाँत, शोभामय कोमल वचन, मन को प्रसन्नता प्रदान करने वाले चचल नेत्र, जिस मुखमडल मे सुशोभित हैं, प्रभु के उस मुखारविन्द का मैं स्मरण करता हूँ ।२१। जिन भृकुटि पत्रों की कृपा से यम सदन की गध भी नही आती जिनके समीप ही नासिका सुशोभित रहती है, जिनके संकेतमें सृष्टि, स्थिति एव प्रलय निहित हैं, जो मदनोत्सव को प्रकट करने वाले एवं

Page 53Permalink

३०६ ] [ कल्कि पुराण

लक्ष्मीजी के हृदय को प्रफुल्लित करने वाले हैं, हरि के उन भृकुटि-पत्रो का मैं स्मरण करता हूँ ।२२। जिनमें मकराकार कुण्डल शोभा पाते हुए दिशाओं और आकाशको प्रकाशित करते हैं, जो अग्रभाग में चंचल अलकों के स्पर्श से कुछ संकुचित हुए प्रतीत होते हैं, जो मणिमय किरीट के तीर पर स्थित हैं, भगवान के उन कानों का मैं स्मरण करता हूँ ।२३। जिस ललाट में सुगन्धित अद्भुत गोरोचन तिलक नेत्रों में मैत्री भाव प्रकट करता है, जो ललाट रूपी ब्रह्मधाम मणिमय मुकुट से दीप्तिमान् है, उस नेत्रों को आनन्द देने वाले हरि के ललाट का मैं स्मरण करता हूँ ।२४। श्रीवासुदेवचिकुरं कुटिलं निबद्धम् नानासुगन्धिकुसुमैः स्वजनादरेण । दीर्घं रमाहृदयगाशमने धुनन्तं ध्यायेऽम्बुवाहरुचिरं हृदयाब्जमध्ये ।२५। मेघाकारं सोमसूर्यप्रकाशं सुभ्रूनसं चक्रचापेक मानम् । लोकातीतं पुण्डरीकायताक्षं विद्युच्चैल- च्छाश्रयेऽहं त्वपूर्वम् २६। दीनं हीनं सेवया वेदवत्त्या पास्तपैः पूरितं मे शरीरम् । लोभाक्रान्तं शोकमोहाधिविद्धं कृपा दृष्ट्या पाहि मा वासुदेव ।२७ जिन कुटिल केशों में सुगन्धित पुष्प गूंथ कर स्वजनों ने वेणी बनाई तथा जिन चंचल केशों के दर्शन से लक्ष्मीजी का मन शान्त होता है, उन नील मेघ जैसे दीर्घ एवं मनोहर केशों का मैं हृदय में ध्यान करता हूँ ।२५। मेघवर्ण वाले चन्द्रमा और सूर्य के समान प्रकाशित, इन्द्र-धनुष के समान भौंह वाले, विद्युत् जैसे समुज्ज्वल वस्त्र धारण करने वाले, लोका- तीत, पुण्डरीकाक्ष भगवान् विष्णु की मैं शरण लेता हूँ ।२६। मैं अत्य- न्त दीन, वेदोक्त सेवा से हीन और पाप-ताप युक्त देह वाला हूँ। मैं लोभ, शोक, मोह और मानसिक व्यथा से व्यथित हूँ । हे वासुदेव ! अपनी कृपा दृष्टि द्वारा मेरी रक्षा कीजिये ।२७। ये भक्त्याद्या ध्यायमाना मनोज्ञां व्यक्तिं विष्णोः

Page 54Permalink

सप्तम अध्याय-२ ] [ ३०५ षोडशश्लोकपुष्पैः । स्तुत्वा नत्वा पूजयित्वा विधिज्ञाः शुद्धा मुक्ता ब्रह्मसौख्यं प्रयान्ति ।२८। पद्मोदितमिदं पुण्यं शिवेन परिभाषितम् । धन्यं यशस्यमायुष्यं स्वर्ग्यं स्वस्त्यन दरम् ।२६। पठन्ति ये महाभागास्ते मुच्यन्तेऽहसोऽखिलात् धर्म्मार्थकाममोक्षाणां परत्रेह फलप्रदम् ।३०। इस विधि को जानकर जो मनुष्य भक्ति भाव से भगवान् विष्णु के इस रूप का ध्यान करके षोडश श्लोक रूपी पुष्पो से स्तुति और नमन करके पूजा करते हैं, वह शुद्ध और मुक्त होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त होते हैं ।२८। शिवोक्त यह स्तोत्र, जिसे पद्मा ने कहा है, अत्यन्त पुण्य- मय है तथा धन, यश, आयुष्य, स्वर्ग एवं मगल का देने वाला है ।२६। यह स्तोत्र इहलोक और परलोक मे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप चारों पदार्थों का दाता है । इसका पाठ करने वाले महाभाग पुरुष सभी पापो से मुक्त हो जाते हैं । —*—

Page 55Permalink

द्वितीयांश— प्रथम अध्याय इति पद्मावचः श्रुत्वा कीरो धीर सता मतः कल्किदूतः सखीमध्ये स्थिता पद्मामथाब्रवीत् ।१। वद पद्मे साङ्गपूजा हरेरद्भुतकर्मणः । यामास्थाय विधानेन चरामि भुवनत्रयम् ।२। एव पादादि केशान्तं ध्यात्वा त जगदीशवरम् । पूर्णात्मा देशिको मूल मन्त्र जपति मन्त्रवित् ।३। जपादनन्तर दण्ड-प्रणति मतिमाश्ररेत् । विष्वक्सेनादि कानान्तु दत्वा विष्णुनिवेदितम् ।४। तत्त उद्वास्य हृदये स्नापयेन्मनसा सह । नृत्यन्गायन्हरेर्नाम त पश्यन्सर्वत स्थितम् ।५। सूत जी बोले—पद्मा के वचन सुन कर सत्य मत वाले धीर एव कल्कि-दूत शुक ने सखियो के मध्य बैठी हुई पद्मा से कहा ।१। हे पद्मे ! अद्भुत कर्म वाले भगवान विष्णु की पूजा का सांगोपाग वर्णन करो । क्योकि मैं उसका विधिवत् अनुष्ठान करके तीनो लोको मे विचरण करूंगा ।२। पद्मा बोली—इस प्रकार चरणो से केश पर्यन्त भगवान् विष्णु का ध्यान करके मत्र के ज्ञाता को मूल मन्त्र का जप करना चाहिए ।३। जप के पश्चात् भगवान् को दण्डवत् प्रणाम करे । फिर विष्वसेन आदि को पाद्य, अर्घ्य नैवेद्य आदि समर्पित करके भगवान् को निवेदन किये गये वस्त्र को धारणा कर विष्णु का स्मरण करता हुआ नृत्य-गान और हरिनाम का कीर्तन करे ।४-५। ३०८

Page 56Permalink

प्रथम अध्याय-२ ] [ ३०६ ततः शेषं मस्तकेन कृत्वा नैवेद्यभुग्भवेत् । इत्येतत्कथितं कीर ! कमलानाथसेवनम् ।६। सका मना कामपूरणाकामृतदायकम् । श्रोत्रानन्दकरं देव-गन्धर्व्व-नर-हृत्प्रियम् ।७। समीरिमं श्रुतसाध्वि भगवद्भक्तिलक्षणम् । त्वत्प्रसादात्पापिनो मे कीरस्य भुवि मुक्तिदम् ।८। किन्तु त्वा काञ्चनमयी प्रतिमां रत्नभूषिताम् । सजीवामिव पश्यामि दुर्लभा रूपिणी श्रियम् ।६। नान्या पश्यामि सदृशी रूपशीलगुणैस्तव । नान्यो योग्यो गुणी भर्त्ता भुवनेऽपि न दृश्यते ।१०। फिर भगवान् का निर्माल्य शेष मस्तक पर धारण करे और नैवेद्य ग्रहण करे । हे शुक ! कमलानाथ की सेवा का यह विधान मैने तुमसे कह दिया ।६। इस प्रकार की पूजा से कामना वालो की कामना पूर्ण होती और कामना न करने वाले को मोक्ष मिलता है । यह कथा देवता, गन्धर्व और मनुष्य सभी के श्रोत्रो को आनन्द देने वाली है ।७। शुक बोला—हे साध्वी ! तुमने मुझ पापिष्ठ तोते को भी मोक्ष देने वाली हरि- भक्ति की विधि कही है, उसे तुम्हारी कृपा से मैंने भली प्रकार सुना है ।८। परन्तु मैं तुम्हे रत्नालकारो से विभूषिता, स्वर्णमयी प्रतिमा के समान तीनो लोको मे दुर्लभ साक्षात् लक्ष्मी रूप मे देख रहा हूँ ।६। ससार मे तुम्हारे समान रूप शील और गुणमयी अन्य नारी मुझे दिखाई नही देती तथा तुम्हारे योग्य कोई अन्य गुणवान् भर्त्ता भी मुझे लोक मे दिखाई नही देता ।१०। किन्तु पारे समुद्रस्य परमाश्चर्यरूपवान् । गुणवानीश्वर साक्षात्कश्चिदृष्टोऽतिमानुषः ।११। न हि धातुकृतं मन्ये शरीर सर्व्व सौभगम् । यस्य श्रीवासुदेवस्य नान्तर ध्यानयोगतः ।१२।

Page 57Permalink

३१० ] [ कल्कि पुराण त्वया ध्यातं तु यद्रूपं विष्णोरमिततेजसः । तत्साक्षात्कृतमित्येव न तत्र कियदन्तरम् ।१३। ब्रूहि तन्मम किं कुत्र जातः कीर परावरम् । जानासि तत्कृतं कर्म्म विस्तरेणात्रवर्णय ।१४। वृक्षादागच्छ पूजां ते करोमि विधिबोधिताम् । बोजपूरफनाहार कुरु साधु पयः पिब ।१५। किन्तु, समुद्र के उस पार एक परम आश्चर्यमय रूप वाला, गुणी, अलौकिक एवं साक्षात् ईश्वर स्वरूप मनुष्य मुझे दिखाई दिया है ।११। उसका सर्व सौन्दर्यमय देह ब्रह्मा द्वारा रचित प्रतीत नही होता । ध्यान-योग से देखे तो उसमे और भगवान् वासुदेव मे कुछ भी अन्तर नही मिलेगा ।१२। हे पद्मे ! तुम भगवान् विष्णु के जिस अमित तेजोमय स्वरूप का ध्यान करती हो, उस रूप मे और उस मनुष्य के रूप मे कोई अन्तर दिखाई नही देता ।१३। पद्मा ने कहा—हे शुक ! तुमने अभी क्या कहा है ? उस बात को पुनः कहो । उन्होने अवतार लिया है ? यदि तुम उनका पूर्ण वृतान्त जानते हो तो मुझे विस्तार पूर्वक सुनाओ ।१४। तुम वृक्ष से उतर आओ, मैं विधिवत् तुम्हारा सत्कार करूंगी । तुम बीजपूर फलो का भक्षण और दुग्ध का पान करो ।१५। तव चंचुयुगं पद्मरागादरुणामुज्ज्वलम् । रत्नसंघट्टितमहं करोमि मनसः प्रियम् ।१६। कन्धरं सूर्यकान्तेन मणिना स्वर्णघट्टिना । करोम्याच्छादनं चारु-मुक्ताभिः पक्षतिं तव ।१७। पतत्रं कुंकुमेनांगं सौरभैणातिचित्रितम् । करोमि नयनानन्ददायकं रूपमीदृशम् ।१८। पुच्छमच्छमणिव्रात-घंघरेणातिशब्दितम् । पादयोनूपुरालाप-लापिनं त्वा करोम्यहम् ।१९। तवामृतकथाव्रातत्यक्ताधि-शाधि मामिह ।

Page 58Permalink

प्रथम अध्याय-२ ] [ ३११ सखीभि संगीताभिस्ते किं करिष्यामि तद्वद ।२०। मैं तुम्हारी चोंच को पद्मरागमणि और रत्नों से मंडित करा कर उन्हें मनोमोहक अरुण वर्ण की और दीप्तिमयी करादूँगी ।१६। तुम्हारे कंठ में सूर्यकान्त मणि जटित स्वर्ण पट्टिका बाँध कर दोनों पक्षों को मोतियों से सजाऊँगी ।१७। तुम्हारे पंख और शरीर को कुंकुम से चर्चित करके ऐसा सुशोभित करूँगी कि सब तुम्हे देखते ही अत्यन्त आन- न्दित हो जाँय ।१८। तुम्हारी पूँछ को स्वच्छ मरिण से गूँथ दूँगी, जिससे तुम्हारे चलने पर सुन्दर घर्घर शब्द सुनाई देगा । तुम्हारे पाँवों में नूपुर बाँध दूँगी, जिनसे सुमधुर ध्वनि निकलेगी ।१९। तुम्हारा कथा- मृत सुनकर ही मेरे मन की व्यथा मिट गई । मुझे बताओ कि मुझे क्या करना है ? सखियों के सहित मैं तुम्हारी परिचर्या करूँगी ।२०। इति पद्मावचः श्रुत्वा तदन्तिकमुपागत । कीरो धारः प्रसन्नात्मा प्रवक्तुमुपचक्रमे ।२१। ब्रह्मणा प्रार्थितः श्रीशो महाकारुणिको वभौ । शंभले विष्णुयशसो गृहे धर्म-रिरक्षुषुः ।२२। चतुर्भिभ्रातृभिर्ज्ञाति-गात्रजैः परिवारितः । कृतोपनयनो वेदमधीत्य रामसन्निधौ ।२३। धनुर्वेदञ्च गान्धर्वं शिवादश्वमपि शुकम् कवचंञ्च वर लब्धा शम्भल पुनरागतः ।२४। विशाखयूपभूषाल प्राप्य शिक्षांविशेषतः । धर्मानारुयाय मतिमान् अधर्मांश्च निराकरोत् ।२५। पद्मा के वचन सुन कर हर्षित हुआ शुक पद्मा के पास जा पहुँचा और श्रेष्ठ प्रसग करने लगा ।२१। शुक बोला-भगवान् लक्ष्मीपति ने धर्म संस्थापन-हेतु ब्रह्माजी द्वारा प्रार्थना करने पर शभल ग्राम निवासी विष्णुयश के यहाँ अवतार लिया है ।२२। वे चार भाई अपने गोत्र एवं परिवार वालो के साथ स्थित हैं, उपनयन सस्कार होने