कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 429, कुल 832 में से
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ॐ श्वेताश्वतरोपनिषद् ॐ ४०१ **व्याख्या—**वे एक ही परमदेव परमेश्वर समस्त प्राणियोके हृदयरूप गुहामे छिपे हुए हैं, वे सर्वव्यापी और समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी परमात्मा है। वे ही सबके कर्मोंके अधिष्ठाता—उनको कर्मानुसार फल देनेवाले और समस्त प्राणियोंके निवासस्थान—आश्रय हैं, तथा वे ही सबके साक्षी—शुभाशुभ कर्मको देखनेवाले, परम चेतनस्वरूप तथा सबको चेतना प्रदान करनेवाले, सर्वथा विशुद्ध अर्थात् निर्लेप और प्रकृतिके गुणोंसे अतीत है ॥ ११ ॥ एको वशी निष्क्रियाणां बहूनामेकं बीजं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम् ॥१२॥ यः= जो; एकः= अकेला ही; बहूनाम्= बहुत-से; निष्क्रियाणाम्= वास्तवमें अक्रिय जीवोंका; वशी= शासक है; ( और ) एकम्= एक; बीजम् = प्रकृतिरूप बीजको; बहुधा = अनेक रूपोंमें परिणत; करोति = कर देता है; तम् = उस; आत्मस्थम् = हृदयस्थित परमेश्वरको; ये = जो; धीराः = धीर पुरुष; अनुपश्यन्ति = निरन्तर देखते रहते हैं; तेषाम् = उन्हींको; शाश्वतम् = सदा रहनेवाला; सुखम् = परमानन्द प्राप्त होता है; इतरेषाम् = दूसरोको; न = नहीं ॥ १२ ॥ **व्याख्या—**जो विशुद्ध चेतनस्वरूप परमेश्वरके ही अंग होनेके कारण वास्तवमे कुछ नहीं करते, ऐसे अनन्त जीवात्माओंके जो अकेले ही नियन्ता—कर्मफल देनेवाले है, जो एक प्रकृतिरूप बीजको बहुत प्रकारसे रचना करके इस विचित्र जगत्के रूपमे बनाते है; उन हृदयस्थित सर्वशक्तिमान् परम सुहृद् परमेश्वरको जो धीर पुरुष निरन्तर देखते रहते हैं, निरन्तर उन्हींमे तन्मय हुए रहते हैं; उन्हींको सदा रहनेवाला परम आनन्द प्राप्त होता है दूसरोको, जो इस प्रकार उनका निरन्तर चिन्तन नहीं करते, वह परमानन्द नहीं मिलता—वे उसमे वञ्चित रह जाते हैं ॥ १२ ॥ नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्यं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशैः ॥१३॥ यः = जो; एकः = एक; नित्यः = नित्य; चेतनः = चेतन ( परमात्मा ); बहूनाम् = बहुत से; नित्यानाम् = नित्य; चेतनानाम् = चेतन आत्माओंके; कामान् विदधाति = कर्मफलभोगोंका विधान करता है; तत् = उस; सांख्ययोगाधि- गम्यम् = ज्ञानयोग और कर्मयोगसे प्राप्त करनेयोग्य- कारणम् = सबके कारणरूप; देवम् = परमदेव परमात्माको; ज्ञात्वा = जानकर, ( मनुष्य ) सर्वपाशैः = समस्त बन्धनोसे; मुच्यते = मुक्त हो जाता है ॥ १३ ॥ **व्याख्या—**जो नित्य चेतन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्मा अकेले ही बहुत से नित्य चेतन जीवात्माओंके कर्मफल- भोगोका विधान करते है; जिन्होंने इस विचित्र जगत्की रचना करके समस्त जीवसमुदायके लिये उनके कर्मानुसार फलभोगकी व्यवस्था कर रक्खी है, उनको प्राप्त करनेके दो साधन हैं—एक ज्ञानयोग; दूसरा कर्मयोग; भक्ति दोनोंमें ही अनुस्यूत है; इस कारण उसका अलग वर्णन नहीं किया गया। उन ज्ञानयोग और कर्मयोगद्वारा प्राप्त किये जाने योग्य सबके कारणरूप परमदेव परमेश्वरको जानकर मनुष्य समस्त बन्धनोसे सर्वथा मुक्त हो जाता है। जो उन्हें जान लेता है और प्राप्त कर लेता है, वह कभी किसी भी कारणसे जन्म-मरणके बन्धनमे नहीं पड़ता। अतः मनुष्यको उन सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमात्माको प्राप्त करनेके लिये अपनी योग्यता और रुचिके अनुसार ज्ञानयोग या कर्मयोग—किसी एक साधनमें तत्परतापूर्वक लग जाना चाहिये ॥ १३ ॥ न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१४॥ तत्र = वहाँ; न = न तो; सूर्यः = सूर्य; भाति = प्रकाश फैला सकता है; न = न; चन्द्रतारकम् = चन्द्रमा और तारागणका समुदाय ही; ( और ) न = न; इमाः = ये; विद्युतः = बिजलियाँ ही; भान्ति = वहाँ प्रकाशित हो सकती हैं; अयम् = (फिर) यह; अग्निः = लौकिक अग्नि तो; कुतः = कैसे प्रकाशित हो सकता है, (क्योकि) तम् भान्तम् एव = उसके प्रकाशित होनेपर ही ( उसीके प्रकाशसे ), सर्वम् = बतलाये हुए सूर्य आदि सब; अनुभाति = उसके पीछे प्रकाशित होते हैं; तस्य = उसके; भासा = प्रकाशसे; इदम् = यह; सर्वम् = सम्पूर्ण जगत्; विभाति = प्रकाशित होता है ॥ १४ ॥ उ० सं० ५१—