कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 441, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ११] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४१३ दशम खण्ड उपस्तिका आख्यान एक बार ओले गिरनेसे कुरुदेशकी खेती चौपट हो गयी थी। उन दिनों चक्र मुनिके पुत्र उपस्ति ऋषि अपनी धर्मपत्नी आटिकीके साथ (जिसने अभी युवावस्था में प्रवेश नहीं किया था) बड़ी दीन अवस्थामें-पराश्रित होकर किसी हाथीवालोंके गाँवमें रहते थे। एक दिन अन्नके लिये भीख माँगते हुए उपस्तिने अत्यन्त निकृष्ट कोटिके उड़द खाते हुए एक महावतसे याचना की। उन प्रसिद्ध मुनिसे हाथीवान् इस प्रकार बोला कि 'जितने और जो उड़द मेरे इस पात्रमें रक्खे हैं, उनके सिवा ओर उड़द मेरे पास नहीं हैं।' ऋषिने कहा-'इन्हींमेंसे मुझे दे दे।' महावतने अपने पात्रमें बचे हुए सारे उड़द उन्हें दे दिये। महावत बोला- 'उड़द खाकर जल भी पी लीजिये।' इसपर ऋषिने उत्तर दिया- 'नहीं, ऐसा करनेपर मेरेद्वारा तुम्हारा जूठा जल पिया जायगा।' 'क्या ये उड़द भी जूठे नहीं हैं?' महावतके यों पूछनेपर उन प्रसिद्ध ऋषिने उत्तर दिया-'अवश्य ही इन उड़दोंको न खानेपर मैं जीवित न रहता। पर पीनेका जल तो मुझे यथेष्ट मिल जाता है' ॥ १-४ ॥ उपस्ति ऋषि खानेसे बचे हुए उड़दोंको अपनी पत्नीके लिये ले आये। उसने पहले ही अच्छी भिक्षा पा ली थी, इसलिये उसने उन उड़दोंको अपने पतिसे लेकर रख दिया। दूसरे दिन प्रातः काल शय्यात्याग करते समय उपस्तिने कहा- 'हाय, यदि हमें थोड़ा-सा भी अन्न मिल जाता तो हम कुछ धन कमा लाते। अमुक राजा यज्ञ करनेवाला है। वह मुझे ऋत्विजोंके सभी प्रकारके कार्योंके लिये वरण कर लेगा।' ऋषिसे उनकी पत्नीने कहा- 'स्वामिन् ! लीजिये, कल जो उड़द आप मुझे दे गये थे, वे ही मेरे पास बचे हुए हैं।' बस, उन्हें खाकर उपस्ति उस विशाल यज्ञमें चले गये ॥ ५-७ ॥ उस यज्ञमें पहुँचकर जहाँ उद्गातालोग स्तुति करते हैं, उस स्थानपर स्तुति करनेके लिये उद्यत उद्गाता आदि ऋत्विजों- के समीप वे बैठ गये। फिर उन्होंने स्तुति करनेवाले प्रस्तोता ऋत्विक्से कहा- 'प्रस्तोता ! जिस देवताका प्रस्तावसे सम्बन्ध है, अर्थात् जिनकी तुम स्तुति करने जा रहे हो, उसे बिना जाने यदि तुम स्तुति करोगे तो याद रखना, तुम्हारा मस्तक गिर जायगा।' इसी प्रकार उन्होंने उद्गातासे कहा-'उद्गाता ! जिस देवताका उद्गीथसे सम्बन्ध है, अर्थात् जिसका तुम उद्गीथ- द्वारा गान करने जा रहे हो, उसे बिना जाने यदि तुम उद्गान करोगे तो निश्चय समझो, तुम्हारा मस्तक गिर पड़ेगा।' तदनन्तर उन्होंने प्रतिहर्तासे कहा- 'प्रतिहर्ता ! जिस देवताका प्रतिहारसे सम्बन्ध है, उसे न जानते हुए यदि तुम प्रतिहार- क्रिया करोगे तो समझ लो कि तुम्हारा सिर तुम्हारी गर्दनपर नहीं रहेगा।' इसपर वे सब ऋत्विक् अपने-अपने कार्यसे उपरत होकर चुपचाप बैठ गये ॥ ८-११ ॥ एकादश खण्ड प्रस्ताव आदि कर्मोंसे सम्बद्ध देवताओंका वर्णन तब इन उपस्ति ऋषिसे यज्ञ करानेवाले राजाने कहा- 'मैं श्रीमान्का ठीक-ठीक परिचय प्राप्त करना चाहता हूँ।' इसपर ऋषिने उत्तर दिया- 'मैं चक्रका पुत्र उपस्ति नामका ऋषि हूँ।' राजाने कहा- 'सच मानिये, मैंने इन समस्त ऋत्विज् सम्बन्धी कर्मोंके लिये श्रीमान्की सब जगह खोज की थी। श्रीमान्के न मिलनेपर ही मैंने दूसरे ऋत्विजोंको चुना है। परन्तु अब मेरे सम्पूर्ण ऋत्विज्-सम्बन्धी कर्मोंपर श्रीमान् ही रहें।' ऋषिने 'बहुत अच्छा' कहकर राजाके प्रस्तावका अनुमोदन किया और फिर कहा- 'तब मेरी आज्ञा पाकर ये पहलेवाले ऋत्विज् ही स्तुति आरम्भ करें। परन्तु एक बात है-जितना धन आप इन लोगोंको दें, उतना ही मुझे भी दें।' राजाने 'यही होगा' कहकर अपनी स्वीकृति दे दी ॥१-३॥ तदनन्तर प्रस्तोता उन प्रसिद्ध ऋषिके पास आकर बोला- “श्रीमान्ने मुझे यह कहा था कि 'प्रस्तोता ! जिस देवताकी तुम स्तुति करने जा रहे हो, उसे बिना जाने यदि तुम स्तुति- पाठ करोगे तो तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जायगा।' सो वह देवता कौन है-मैं यह जानना चाहता हूँ।" इसपर ऋषि बोले-“वह देवता प्राण है। निःसन्देह ये समस्त प्राणी प्रलय- के समय प्राणमे ही प्राणरूप होकर विलीन हो जाते हैं और पुनः सृष्टिकालमें प्राणसे ही प्रकट होते हैं। वही यह प्राण प्रस्ताव अर्थात् स्तुतिमें अनुगत देवता है, उसको बिना जाने यदि तुम स्तुति आरम्भ कर देते तो मेरे यह कहनेपर कि 'तुम्हारा सिर धड़से अलग हो जाय,' वैसा अवश्य हो जाता” ॥ ४५ ॥ तदनन्तर उद्गाता उपस्तिके पास आकर बोला- “श्रीमान्ने मुझसे यह कहा था कि 'उद्गाता ! जो उद्गीथसे