कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 443, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ द्वितीय अध्याय प्रथम खण्ड साधु-दृष्टिसे समस्त सामकी उपासना ॐ समस्त सामकी उपासना निश्चय ही साधु है। जो ऐसा भी कहते हैं कि हमारा साम ( शुभ ) हुआ। अर्थात् साधु होता है, उसको साम कहते हैं और जो असाधु होता है, जब शुभ होता है तो 'अहा ! बड़ा अच्छा हुआ' ऐसा कहते वह असाम कहलाता है। इसी विषयमे कहते हैं—[ जब कहा हैं, और ऐसा भी कहते हैं—'हमारा असाम हुआ' अर्थात् जाय कि अमुक पुरुष ] इस [ राजा आदि ] के पास साम- जब अशुभ होता है तो 'अरे ! बुरा हुआ !' ऐसा कहते हैं। द्वारा गया तो [ ऐसा कहकर ] लोग यही कहते हैं कि वह इसे इस प्रकार जाननेवाला जो पुरुष 'साम साधु है' ऐसी इसके पास साधुभावसे गया और [ जब यों कहा जाय कि ] उपासना करता है, उसके समीप साधु धर्म शीघ्र ही आ वह इसके पास असामद्वारा गया तो [इससे] लोग यही कहते जाते हैं और उसके प्रति विनम्र हो जाते हैं ॥ १-४॥ हैं कि वह इसके यहाँ असाधुभावसे प्राप्त हुआ। इसके अनन्तर द्वितीय खण्ड पञ्चविध सामोपासना लोकोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करनी चाहिये । आदित्य प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, अग्नि प्रतिहार है पृथिवी हिंकार है, अग्नि प्रस्ताव है, अन्तरिक्ष उद्गीथ है, और पृथ्वी निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष आदित्य प्रतिहार है और द्युलोक निधन है—इस प्रकार लोकोंमें पञ्चविध सामकी उपासना करता है, उसके प्रति ऊर्ध्व ऊपरके लोकोंमें सामदृष्टि करे । अब अधोगत लोकोंमें और अधोमुख लोक भोग्यरूपसे उपस्थित होते हैं ॥ १-३ ॥ सामोपासनाका निरूपण किया जाता है—द्युलोक हिंकार है, तृतीय खण्ड वृष्टिमें सामोपासना वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे। पूर्ववायु जल ग्रहण करता है यह निधन है। जो इसे ( इस उपासनाको ) हिंकार है, मेघ उत्पन्न होता है यह प्रस्ताव है, बरसता है यह इस प्रकार जाननेवाला पुरुष वृष्टिमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है उसके लिये वर्षा होती है और वह स्वयं भी उद्गीथ है, चमकता और गर्जन करता है यह प्रतिहार है, वर्षा करा लेता है ॥ १-२ ॥ चतुर्थ खण्ड जलमें सामोपासना सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे । प्रतिहार है और समुद्र निधन है। जो इसे इस प्रकार मेघ जो घनीभावको प्राप्त होता है यह हिंकार है, वह जो जाननेवाला पुरुष सब प्रकारके जलोंमें पाँच प्रकारके सामकी बरसता है यह प्रस्ताव है, [ नदियाँ ] जो पूर्वकी ओर बहती उपासना करता है वह जलमें नहीं मरता और जलवान् हैं वह उद्गीथ है तथा जो पश्चिमकी ओर बहती है वह होता है ॥ १-२ ॥ पञ्चम खण्ड ऋतुओंमें सामोपासना ऋतुओंमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करे। वसन्त पुरुष ऋतुओमें पाँच प्रकारके सामकी उपासना करता है उसे हिंकार है, ग्रीष्म प्रस्ताव है, वर्षा उद्गीथ है, शरत् प्रतिहार ऋतुएँ अपने अनुरूप भोग देती हैं और वह ऋतुमान् है और हेमन्त निधन है। जो इसे इस प्रकार जाननेवाला (ऋतुसम्बन्धी भोगोंसे सम्पन्न) होता है ॥ १-२ ॥