भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 503

ॐ द्वितीय अध्याय प्रथम गार्ग्य और अजातशत्रुका संवाद, अजातशत्रुका गार्ग्यको आत्माका स्वरूप समझाना

ॐ गार्ग्य-गोत्रोत्पन्न बालाकि नामक एक पुरुष बड़ा घमंडी और बहुत बोलनेवाला था । उसने काशिराज अजातशत्रुके पास जाकर कहा—'मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूँ ।' अजातशत्रु- ने कहा, 'इस वचनके लिये मैं आपको सहस्र [गौएँ] देता हूँ, लोग 'जनक, जनक' यों कहकर दौड़ते हैं। (अर्थात् सब लोग यही कहते हैं कि 'जनक बड़ा दानी है, जनक बड़ा श्रोता है।' ये दोनों बातें आपने अपने वचनसे मेरे लिये सुलभ कर दी हैं । इसलिये मैं आपको सहस्र गौएँ देता हूँ )' ॥१॥ गार्ग्यने कहा, 'यह जो आदित्यमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' अजातशत्रुने कहा, 'नहीं-नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । यह सबका अतिक्रमण करके स्थित है, समस्त भूतोंका मस्तक है और राजा (दीप्तिमान् ) है—इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ । जो पुरुष इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह सबका अतिक्रमण करके स्थित, समस्त भूतोंका मस्तक और राजा होता है।' गार्ग्य बोला, 'यह जो चन्द्रमामें पुरुष है, इसी- की मै ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' अजातशत्रुने कहा, 'नहीं-नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । यह महान्, शुक्ल- वस्त्रधारी, सोम राजा है—इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ । जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसके लिये नित्यप्रति सोम सुत और प्रसूत होता है, अर्थात् प्रकृति- विकृतिमय दोनों-प्रकारके यज्ञानुष्ठानमें वह समर्थ हो जाता है । तथा उसका अन्न क्षीण नही होता ।' वह गार्ग्य बोला, 'यह जो विद्युत्में पुरुष है, इसीकी मै ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं-नहीं, इसकी चर्चा मत करो, इसकी तो मै तेजस्त्रीरूपसे उपासना करता हूँ । जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह तेजस्वी होता है तथा उसकी सन्तान भी तेजस्विनी होती है।' वह गार्ग्य बोला, 'यह जो आकाशमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं-नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । मैं उसकी पूर्ण और अप्रवर्त्तिरूपसे उपासना करता हूँ जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह सन्तान और

पशुओंसे पूर्ण होता है और इस लोकमे उसकी सन्ततिका उच्छेद नहीं होता ।' वह गार्ग्य बोला, 'यह जो वायुमें पुरुष है, इसकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । इसकी तो मै इन्द्र, वैकुण्ठ और अपराजिता सेना—इस रूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह विजयी, कभी न हारनेवाला और शत्रुविजेता होता है।' वह गार्ग्य बोला, 'यह जो अग्निमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं- नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । इसकी तो मैं विषासहिरूप- से उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह निश्चय सहन करनेवाला होता है और उसकी सन्तति भी सहन करनेवाली होती है।' वह गार्ग्य बोला, 'यह जो जलमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं-नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । इसकी मैं 'प्रतिरूप' रूपसे उपासना करता हूँ । जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसके पास प्रतिरूप ही आता है, अप्रतिरूप नहीं आता और उससे प्रतिरूप [पुत्र] उत्पन्न होता है' ॥ २-८ ॥ गार्ग्य बोला, 'यह जो दर्पणमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं- नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । इसकी तो मैं रोचिष्णु (दीप्तिमान्) रूपसे उपासना करता हूँ । जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह निश्चय दीप्तिमान् होता है, उसकी सन्तान भी दीप्तिमान् होती है और उसका जिनसे सगम होता है, उन सबसे बढकर वह दीप्तिमान् होता है।' वह गार्ग्य बोला, 'जानेवालेके पीछे जो यह शब्द उत्पन्न होता है, इसी- की मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं-नहीं, इसके विषयमें बात मत करो । इसकी तो मैं प्राण- रूपसे उपासना करता हूँ । जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना

१ अग्निमें जो हविष्य डाला जाता है उसे वह भस्म करके सहन कर लेता है, इसलिये अग्नि विषासहि—सहन करनेवाला है ।