भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 504, कुल 832 में से

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पृष्ठ 504

४७० * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय २ करता है वह इस लोकमें पूर्ण आयु प्राप्त करता है, इसे प्राण समयसे पहले नहीं छोड़ता' ॥ ९-१० ॥ गार्ग्य बोला, 'यह जो दिशाओंमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं नहीं, इसके विषयमें बात मत करो, मैं इसकी द्वितीय और वियुक्तरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह द्वितीयवान् (साथीवाला) होता है और उससे गणका (पुत्रादि समूहका) विच्छेद नहीं होता' ।११। गार्ग्य बोला, 'यह जो छायामय पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं- नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। इसकी तो मैं मृत्युरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह इस लोकमें पूर्ण आयु प्राप्त करता है और इसके पास समयसे पहले मृत्यु नहीं आती' ॥ १२ ॥ गार्ग्य बोला, 'यह जो आत्मामें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो, इसकी तो मैं आत्मवान्रूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह निश्चय आत्मवान् होता है और उसकी सन्तान भी आत्मवान् होती है।' तब वह गार्ग्य चुप हो गया ॥१३॥ [उसे मौन देखकर] वह अजातशत्रु बोला, 'बस, क्या इतना ही है ?' [ गार्ग्य—] 'हाँ, इतना ही है।' [ अजातशत्रु—] 'इतनेसे तो ब्रह्म नहीं जाना जाता।' वह गार्ग्य बोला, 'मैं आपकी शिष्यभावसे शरण लेता हूँ' ॥ १४ ॥ अजातशत्रुने कहा, 'ब्राह्मण क्षत्रियके प्रति, इस उद्देश्यसे कि यह मुझे ब्रह्मका उपदेश करेगा, शिष्यभावसे शरण हो—यह तो विपरीत है। तो भी मैं आपको उसका ज्ञान कराऊँगा ही।' तब अजातशत्रु उसके हाथ पकड़कर उठा और वे दोनों एक सोये हुए पुरुषके पास गये । अजातशत्रुने उसे 'हे ब्रह्म ! हे पाण्डरवास ! हे सोम राजन् !' इन नामोंसे पुकारा । परन्तु वह न उठा । तब उसे हाथसे दबा-दबाकर जगाया तो वह उठ बैठा ॥ १५ ॥ अजातशत्रुने कहा, 'यह जो विज्ञानमय पुरुष है, जब सोया हुआ था, तब कहाँ था ? और यह कहाँसे आया ?' किंतु गार्ग्य यह न जान सका ॥ १६ ॥ उस अजातशत्रुने कहा, 'यह जो विज्ञानमय पुरुष है, जब यह सोया हुआ था, उस समय यह विज्ञानके द्वारा इन इन्द्रियोंकी ज्ञानशक्तिको ग्रहणकर यह जो हृदयके भीतर आकाश है उसमें शयन करता है। जिस समय यह उन ज्ञानशक्तियोंको ग्रहण कर लेता है, उस समय इस पुरुषका 'स्वपिति' नाम होता है। उस समय घ्राणेन्द्रिय लीन रहती है, वाणी लीन रहती है, चक्षु लीन रहता है, श्रोत्र लीन रहता है और मन भी लीन रहता है । जिस समय यह आत्मा स्वप्नवृत्तिसे वर्तता है, उस समय इसके वे लोक (दृश्य) उत्पन्न होते हैं। वहाँ कभी यह महाराज होता है, कभी महाब्राह्मण होता है अथवा ऊँची नीची [ गतियों ] को प्राप्त होता है। जिस प्रकार कोई महाराज अपने प्रजाजनोंको लेकर (अधीन कर) अपने देशमें यथेच्छ विचरता है, उसी प्रकार यह प्राणोंको ग्रहणकर अपने शरीरमे यथेच्छ विचरता है। इसके पश्चात् जब वह गाढ निद्रामें होता है, जिस समय कि वह किसीके विषयमें कुछ भी नहीं जानता, उस समय हिता नामकी जो बहत्तर हजार नाडियाँ हृदयसे सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त होकर स्थित हैं, उनके द्वारा बुद्धिके साथ जाकर वह शरीरमें व्याप्त होकर शयन करता है। जिस प्रकार कोई बालक अथवा महाराज किंवा महाब्राह्मण आनन्दकी दुःखनाशिनी अवस्थाको प्राप्त होकर शयन करे, उसी प्रकार यह शयन करता है ॥१७-१९॥ जिस प्रकार वह ऊर्णनाभि (मकड़ा) तन्तुओंपर ऊपरकी ओर जाता है तथा जैसे अग्निसे अनेकों क्षुद्र चिनगारियाँ उड़ती हैं, उसी प्रकार इस आत्मासे समस्त प्राण, समस्त लोक, समस्त देवगण और समस्त भूत विविध रूपसे उत्पन्न होते हैं। 'सत्यका सत्य' यह उस आत्माका नाम है। प्राण ही सत्य हैं। उन्हींका यह सत्य है ॥ २० ॥ द्वितीय ब्राह्मण शिशु नामसे मध्यम प्राणकी उपासना जो कोई आधान, प्रत्याधान, स्थूणा और दाम (बन्धन- रज्जु) के सहित शिशुको जानता है, वह अपनेसे द्वेष करने- वाले सात भ्रातृव्योंका अवरोध करता है। यह जो मध्यम प्राण है, वही शिशु है, उसका यह (शरीर) ही आधान (अधिष्ठान) है, यह (सिर) ही प्रत्याधान है, प्राण स्थूणा (अन्न-पानजनित शक्ति) है और अन्न दाम है ॥ १ ॥

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