कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 514, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें४७८ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ अध्याय ३ तृतीय ब्राह्मण याज्ञवल्क्य और लाह्यायनि भुज्युका संवाद फिर इस याज्ञवल्क्यसे लाह्यायनि भुज्युने पूछा, वह [ याज्ञवल्क्य--] 'यह लोक बत्तीस देवरथाह्न्य* है। उसे बोला; 'याज्ञवल्क्य ! हम व्रताचरण करते हुए मद्रदेशमें विचर चारों ओरसे दूनी पृथिवी घेरे हुए है। उस पृथिवीको सब रहे थे कि कपिगोत्रोत्पन्न पतञ्चलके घर पहुंचे। उसकी पुत्री ओरसे दूना समुद्र घेरे हुए है। सो जितनी पतली छुरेकी धार गन्धर्वसे गृहीत थी। (अर्थात् उसपर गन्धर्वका आवेश होती है, अथवा जितना सूक्ष्म मक्खीका पख होता है, उतना था ) हमने उससे पूछा, 'तू कौन है ?' वह बोला, 'आङ्गिरस उन अण्डकपालोंके मध्यमें आकाश है। इन्द्र (चित्य अग्नि ) सुधन्वा हूँ।' जब उससे लोकोंके अन्तके विषयमें पूछा तो ने पक्षी होकर उन पारिक्षितोंको वायुको दिया। उन्हें वायु हमने उससे यो कहा, 'पारिक्षित कहाँ रहे ? पारिक्षित कहाँ अपने स्वरूपमें स्थापितकर वहाँ ले गया, जहाँ अश्वमेधयाजी रहे ? सो हम तुमसे पूछते हैं कि 'पारिक्षित कहाँ रहे ?' ॥१॥ रहते हैं; इस प्रकार उस गन्धर्वने वायुकी ही प्रशंसा की थी। उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'उस गन्धर्वने निश्चय यह कहा अतः वायु ही व्यष्टि है और वायु ही समष्टि है। जो ऐसा था कि वे वहाँ चले गये, जहाँ अश्वमेध यज्ञ करनेवाले जाते जानता है, वह पुनर्मृत्युको जीत लेता है।' तब लाह्यायनि हैं। [भुज्यु--] 'अच्छा तो, अश्वमेधयाजी कहो जाते हैं ?' भुज्यु चुप हो गया ॥ २ ॥ चतुर्थ ब्राह्मण याज्ञवल्क्य और चाक्रायण उपस्तका संवाद फिर उस याज्ञवल्क्यसे चाक्रायण उपस्तने पूछा; वह और दौड़ना दिखाकर ] कहे कि यह (चलनेवाला) बैल बोला, 'याज्ञवल्क्य ! जो साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर है, यह (दौड़नेवाला) घोड़ा है, उसी प्रकार तुम्हारा यह आत्मा है, उसकी मेरे प्रति व्याख्या करो।' [ याज्ञवल्क्य--] कथन है; अतः जो भी साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर 'यह तेरा आत्मा ही सर्वान्तर है।' [ उपस्त-] 'याज्ञवल्क्य ! आत्मा है, उसे तुम स्पष्टतया बतलाओ।' [ याज्ञवल्क्य--] वह सर्वान्तर कौन-सा है ?' [ याज्ञवल्क्य--] 'जो प्राणसे 'यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है।' [उपस्त-] 'हे याज्ञवल्क्य ! प्राणक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है; जो अपानसे वह सर्वान्तर कौन सा है ?' [ याज्ञवल्क्य--] 'तुम दृष्टिके अपान क्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है, जो द्रष्टाको नहीं देख सकते, श्रुतिके श्रोताको नहीं सुन सकते, व्यानसे व्यानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर है, मतिके मन्ताका मनन नहीं कर सकते, विज्ञातिके विज्ञाताको जो उदानसे उदानक्रिया करता है, वह तेरा आत्मा सर्वान्तर नहीं जान सकते । तुम्हारा यह आत्मा सर्वान्तर है, इससे है। यह तेरा आत्मा सर्वान्तर है' ॥ १ ॥ भिन्न आर्त (नाशवान् ) है।' इसके पश्चात् चाक्रायण उपस्त उस चाक्रायण उपस्तने कहा, 'जिस प्रकार कोई [चलना चुप हो गया ॥ २ ॥ पञ्चम ब्राह्मण याज्ञवल्क्य और कहोलका संवाद; ब्रह्म और आत्माकी व्याख्या फिर उस याज्ञवल्क्यसे कौषीतकेय कहोलने पूछा; उसने पिपासा, शोक, मोह, जरा और मृत्युसे परे है, उस पूर्वोक्त 'याज्ञवल्क्य !' इस प्रकार सम्बोधित करके कहा--'जो भी आत्माको ही जानकर ब्राह्मण पुत्रैषणा, वित्तैषणा और साक्षात् अपरोक्ष ब्रह्म और सर्वान्तर आत्मा है, उसकी तुम लोकैषणासे अलग हटकर भिक्षाचर्यासे विचरते हैं। जो भी मेरे प्रति व्याख्या करो।' [यह सुनकर याज्ञवल्क्यने कहा-] पुत्रैषणा है, वही वित्तैषणा है और जो वित्तैषणा है, वही 'यह तुम्हारा आत्मा सर्वान्तर है।' [ कहोल--] 'याज्ञवल्क्य ! लोकैषणा है। ये दोनों ही [साध्य-साधनेच्छाएँ] एषणाएँ वह सर्वान्तर कौन-सा है ?' [ याज्ञवल्क्य-] 'जो क्षुधा, ही हे। अतः ब्राह्मण पाण्डित्य (आत्मज्ञान) का पूर्णतया सम्पादन करके आत्मज्ञानरूप बलसे स्थित रहनेकी इच्छा करे।
- सूर्यके रथकी गतिने एक दिनमें ससारका जितना भाग नापा जाय उसे 'देवरथाह्न्य' कहते हैं।