कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 517, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ८ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४८१ अष्टम ब्राह्मण याज्ञवल्क्य-गार्गीका संवाद, अक्षरके नामसे आत्मस्वरूपका वर्णन [बायाँ स्तम्भ] फिर वाचक्नवीने कहा, 'पूजनीय ब्राह्मणगण ! अब मै इनमे दो प्रश्न पूछूँगी । यदि ये मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे देंगे तो फिर आपमेंसे कोई भी इन्हें ब्रह्मसम्बन्धी वादमे नहीं जीत सकेगा ।' [ ब्राह्मण—] 'अच्छा गार्गि ! पूछ' ॥ १ ॥ वह बोली, 'याज्ञवल्क्य ! जिस प्रकार काशी या विदेह- का रहनेवाला कोई वीर-वशज पुरुष प्रत्यञ्चाहीन धनुषपर प्रत्यञ्चा चढाकर शत्रुओंको अत्यन्त पीडा देनेवाले दो फलवाले शर हाथमें लेकर खड़ा होता है, उसी प्रकार मैं दो प्रश्न लेकर तुम्हारे सामने उपस्थित होती हूँ, तुम मुझे उनका उत्तर दो ।' इसपर याज्ञवल्क्यने कहा, 'गार्गि ! पूछ' ॥ २ ॥ वह बोली, 'याज्ञवल्क्य ! जो द्युलोकसे ऊपर है, जो पृथिवीके नीचे है और जो द्युलोक और पृथिवीके मध्यमे है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य—इस प्रकार कहते हैं, वे किसमें ओतप्रोत हैं ?' ॥ ३ ॥ उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'गार्गि ! जो द्युलोकसे ऊपर, पृथिवीसे नीचे और जो द्युलोक एव पृथिवीके मध्यमे है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान एव भविष्य—इस प्रकार कहते हैं, वे सब आकाशमें ओतप्रोत हैं' ॥ ४ ॥ वह बोली, 'याज्ञवल्क्य ! आपको नमस्कार है, जिन्होंने मुझे इस प्रश्नका उत्तर दे दिया; अब आप दूसरे प्रश्नके लिये तैयार हो जाइये ।' [ याज्ञवल्क्य—] 'गार्गि ! पूछ' ॥ ५ ॥ वह बोली, 'याज्ञवल्क्य ! जो द्युलोकसे ऊपर है, जो पृथिवीसे नीचे है और जो द्युलोक और पृथिवीके मध्यमे है और स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं तथा जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य—इस प्रकार कहते हैं, वे किसमें ओतप्रोत हैं ?' ॥ ६ ॥ उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'गार्गि ! जो द्युलोकसे ऊपर, पृथिवीसे नीचे और जो द्युलोक एव पृथिवीके मध्यमें है तथा स्वयं भी जो ये द्युलोक और पृथिवी हैं और जिन्हें भूत, वर्तमान और भविष्य—इस प्रकार कहते हैं, वे सब आकाशमे ही ओतप्रोत हैं।' [ गार्गी—] 'किंतु आकाश किसमें ओतप्रोत है ?' ॥ ७ ॥ [दायाँ स्तम्भ] उस याज्ञवल्क्यने कहा, 'गार्गि ! उस इस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्ता अक्षर कहते हैं, वह न मोटा है, न पतला है, न छोटा है, न बड़ा है, न लाल है, न द्रव है, न छाया है, न तम (अन्धकार ) है, न वायु है, न आकाश है, न सगवान् है, न रस है, न गन्ध है, न नेत्र है, न कान है, न वाणी है, न मन है, न तेज है, न प्राण है, न मुख है, न माप है, उसमे न भीतर है, न बाहर है; वह कुछ भी नहीं खाता, उसे कोई भी नहीं खाता' ॥ ८ ॥ 'गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमे सूर्य और चन्द्रमा विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं । हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमें द्युलोक और पृथिवी विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं । हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमे निमेष, मुहूर्त, दिन-रात, अर्धमास (पक्ष ), मास, ऋतु और संवत्सर विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित रहते हैं। हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमे पूर्ववाहिनी एव अन्य नदियाँ श्वेत पर्वतोंसे बहती हैं तथा अन्य पश्चिमवाहिनी नदियाँ जिस-जिस दिशाको बहने लगती हैं, उसीका अनुसरण करती रहती हैं । हे गार्गि ! इस अक्षरके ही प्रशासनमे मनुष्य दाताकी प्रशंसा करते हैं तथा देवगण यजमानका और पितृगण दर्वीहोमका अनुवर्तन करते हैं। गार्गि ! जो कोई इस लोकमे इस अक्षरको न जानकर हवन करता, यज्ञ करता और अनेकों सहस्र वर्षपर्यन्त तप करता है, उसका वह सब कर्म अन्तवाला ही होता है । जो कोई भी इस अक्षरको बिना जाने इस लोकसे मरकर जाता है, वह कृपण (दीन ) है और हे गार्गि ! जो इस अक्षरको जानकर इस लोकसे मरकर जाता है, वह ब्राह्मण है। हे गार्गि ! यह अक्षर स्वयं दृष्टिका विषय नहीं, किन्तु द्रष्टा है, श्रवणका विषय नहीं, किन्तु श्रोता है, मननका विषय नहीं, किन्तु मन्ता है, स्वयं अविज्ञात रहकर दूसरोंका विज्ञाता है । इससे भिन्न कोई द्रष्टा नहीं है, इससे भिन्न कोई श्रोता नहीं है, इससे भिन्न कोई मन्ता नहीं है और इससे भिन्न कोई विज्ञाता नहीं है। हे गार्गि ! निश्चय इस अक्षरमे ही आकाश ओत- प्रोत है' ॥ ९–११ ॥ उस गार्गीने कहा, 'पूज्य ब्राह्मणगण ! आपलोग इसीको