कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 541, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण २ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०३ मुझे बलि ( भेंट ) दिया करो।' [इन्द्रियोंने कहा—] 'बहुत अच्छा' ॥ ८–१३ ॥ उस वागिन्द्रियने कहा, 'मैं जो वसिष्ठा हूँ, सो तुम ही उस वसिष्ठगुणसे युक्त हो।' 'मैं जो प्रतिष्ठा हूँ, सो तुम ही उस प्रतिष्ठासे युक्त हो' ऐसा नेत्रने कहा। 'मैं जो समृद्ध हूँ, सो तुम ही उस समृद्धिसे युक्त हो' ऐसा श्रोत्रने कहा। 'मैं जो आयतन हूँ, सो तुम्हीं वह आयतन हो' ऐसा मनने कहा। 'मैं जो प्रजाति हूँ, सो तुम ही उस प्रजातिसे युक्त हो' ऐसा रेतस्ने कहा। [ प्राणने कहा-] 'किंतु ऐसे गुणोंसे युक्त मेरा अन्न क्या है और वस्त्र क्या है ?' [ वागादि बोले-] 'कुत्ते, कृमि और कीट-पतङ्गोंसे लेकर यह जो कुछ भी है, वह सब तुम्हारा अन्न है और जल ही वस्त्र है।' [ उपासनाका फल-] 'जो इस प्रकार प्राणके अन्नको जानता है, उसके द्वारा अभक्ष्य-भक्षण नहीं होता और अभक्ष्यका प्रतिग्रह (संग्रह) भी नहीं होता। ऐसा जाननेवाले श्रोत्रिय भोजन करनेसे पूर्व आचमन करते हैं तथा भोजन करके आचमन करते हैं। इसीको वे उस प्राणको अनग्न (वस्त्रयुक्त) करना मानते हैं' ॥ १४ ॥ द्वितीय ब्राह्मण पञ्चाग्निविद्या और उसे जाननेका फल; त्रिविध गतिका वर्णन प्रसिद्ध है कि आरुणिका पुत्र श्वेतकेतु पञ्चालोंकी सभामें आया । वह जीवलके पुत्र प्रवाहणके पास पहुँचा, जो [ सेवकोंसे] परिचर्या करा रहा था। उसे देखकर प्रवाहणने कहा, 'ओ कुमार !' वह बोला, 'जी !' [ प्रवाहण-] 'क्या पिताने तुझे शिक्षा दी है ?' तब श्वेतकेतुने 'हाँ !' ऐसा उत्तर दिया ॥ १ ॥ 'जिस प्रकार मरनेपर यह प्रजा विभिन्न मागोंसे जाती है— सो क्या तू जानता है ?' श्वेतकेतु बोला, 'नहीं !' [राजा-] 'जिस प्रकार वह पुनः इस लोकमें आती है—सो क्या तुझे मालूम है ?' 'नहीं,' ऐसा श्वेतकेतुने उत्तर दिया। [राजा-] 'इस प्रकार पुनः-पुनः बहुतोंके मरकर जानेपर भी जिस प्रकार वह लोक भरता नहीं है—सो क्या तू जानता है ?' 'नहीं,' ऐसा उसने कहा । [ राजा-] 'क्या तू जानता है कि कितने बारकी आहुतिके हवन करनेपर आप (जल) पुरुष-शब्दवाच्य हो उठकर बोलने लगता है ?' 'नहीं,' ऐसा श्वेतकेतुने कहा। 'क्या तू देवयानमार्गका कर्मरूप साधन अथवा पितृयानका कर्मरूप साधन जानता है, जिसे करके लोग देवयानमार्गको प्राप्त होते हैं अथवा पितृयानमार्गको ? हमने तो मन्त्रका यह वचन सुना है—मैंने पितरोंका और देवोंका, इस प्रकार दो मार्ग सुने हैं, ये दोनों मनुष्योंसे सम्बन्ध रखनेवाले मार्ग हैं। इन दोनों मागोंसे जानेवाला जगत् सम्यक् प्रकारसे जाता है। तथा ये मार्ग [ द्युलोक और पृथिवीरूप ] पिता और माताके मध्यमें हैं।' इसपर श्वेतकेतुने 'मैं इनमेंसे एक भी नहीं जानता,' ऐसा उत्तर दिया ॥ २ ॥ फिर राजाने श्वेतकेतुसे ठहरनेके लिये प्रार्थना की। किंतु वह कुमार ठहरनेकी परवा न करके चल दिया। वह सीधा अपने पिताके पास आया और उससे बोला, 'आपने यही कहा था न कि मुझे सब विषयोंकी शिक्षा दे दी गयी है ?' [ पिता-] 'हे सुन्दर धारणाशक्तिवाले ! क्या हुआ ?' [ पुत्र-] 'मुझसे एक क्षत्रियबन्धुने पाँच प्रश्न पूछे थे, उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता।' [ पिता-] 'वे कौन-से थे ?' [ पुत्र-] 'ये ये' ऐसा कहकर उसने उन प्रश्नोंके प्रतीक बतलाये ॥ ३ ॥ पिताने कहा, 'हे तात ! तू हमारे कथनानुसार ऐसा समझ कि हम जो कुछ जानते थे, वह सब हमने तुझसे कह दिया था। अब हम दोनों वहीं चलें और ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक उसके यहाँ निवास करेंगे।' [ पुत्र-] 'आप ही जाइये।' तब वह गौतम जहाँ जैवलि प्रवाहणकी बैठक थी, वहाँ आया। उसके लिये आसन लाकर राजाने जल मँगवाया और उसे अर्घ्यदान किया। फिर बोला, 'मैं पूज्य गौतमको वर देता हूँ।' (आप जिस उद्देश्यसे यहाँ पधारे हैं, वह बतलाइये। मैं उसकी पूर्ति करूँगा।) उसने कहा, 'आपने मुझे जो वर देनेके लिये प्रतिज्ञा की है, उसके अनुसार आपने कुमारसे जो बात पूछी थी, वह मुझसे कहिये।' उसने कहा, 'गौतम ! वह वर तो दैव वरोंमेंसे है, तुम मनुष्यसम्बन्धी वरोंमेंसे कोई वर माँगो' ॥ ४-६ ॥ गौतमने कहा, 'आप जानते हैं, वह तो मेरे पास है। मुझे सुवर्ण तथा गौ, अश्व, दासी, परिवार और वस्त्र भी प्राप्त है । आप महान्, अनन्त और निःसीम धनके दाता होकर मेरे लिये अदाता न हों।' [ राजा-]