भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 543, कुल 832 में से

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पृष्ठ 543

३] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५०५ तृतीय ब्राह्मण मन्थविद्या और उसकी परम्परा

जो ऐसा चाहता हो कि मैं महत्त्व प्राप्त करूँ, वह उत्तरायणमें शुक्लपक्षकी पुण्य तिथिपर बारह दिन उपसद्व्रती (पयोव्रती) होकर गूलरकी लकड़ीके कस (कटोरे) या चमस- में सर्वौषध, फल तथा अन्य सामग्रियोंको एकत्रितकर, [जहाँ हवन करना हो, उस स्थानका] परिसमूहन* एव परिलेपन† करके अग्निस्थापन करता है और फिर अग्निके चारों ओर कुशा बिछाकर शास्त्रोक्त विधिसे घृतका शोधन करके, जिसका नाम पुँल्लिङ्ग हो उस [हस्त आदि] नक्षत्रमें मन्थको (औषध-फल आदिके पिण्डको) [अपने और अग्निके] बीचमें रखकर हवन करता है। [ 'यावन्तो' इत्यादि प्रथम मन्त्रका अर्थ—] हे जातवेदः ! तेरे वशवर्ती जितने देवता वक्रमति होकर पुरुषकी कामनाओंका प्रतिबन्ध करते हैं, उनके उद्देश्यसे यह आज्यभाग मैं तुझमें हवन करता हूँ। वे तृप्त होकर मुझे समस्त कामनाओंसे तृप्त करें—स्वाहा‡ । [ 'या तिरश्ची' इत्यादि द्वितीय मन्त्रका अर्थ—] 'मैं संवकी मृत्युको धारण करनेवाला हूँ' ऐसा समझकर जो कुटिलमति देवता तेरा आश्रय करके रहता है, सब साधनों- की पूर्ति करनेवाले उस देवताके लिये मे घृतकी धारासे यजन करता हूँ—स्वाहा ॥ १ ॥ 'ज्येष्ठाय स्वाहा, श्रेष्ठाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निर्म हवन करके सस्रवको (स्रुवामे बचे हुए घृतको) मन्थम डाल देता है। 'प्राणाय स्वाहा, वसिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थम डाल देता है। 'वाचे स्वाहा, प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें टाल देता है। 'चक्षुषे स्वाहा, सम्मदे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थमं डाल देता है। 'श्रोत्राय स्वाहा, आयतनाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थम डाल देता है। 'मनसे स्वाहा, प्रजात्यै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'रेतसे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थर्म डाल देता है ॥ २ ॥ 'अग्नये स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमे डाल देता है। 'सोमाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें

हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भूः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें टाल देता है। 'भुवः स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें टाल देता है। 'स्वः स्वाहा' इम मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमे डाल देता है। 'भूर्भुवः स्वः म्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थमे टाल देता है। 'ब्रह्मणे स्वाहा' इम मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमे डाल देता है। 'क्षत्राय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भूताय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'भविष्यते स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें टाल देता है। 'विश्वाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'सर्वाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है। 'प्रजापतये स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें हवन करके सस्रवको मन्थमें डाल देता है ॥ ३ ॥ इसके पश्चात् उस मन्थको 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रद्वारा स्पर्श करता है। [मन्थद्रव्यका अधिष्ठातृदेव प्राण है, इसलिये प्राणसे एकरूप होनेके कारण वह सर्वात्मक है। 'भ्रमदसि' इत्यादि मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है—] तू [ प्राण- रूपसे सम्पूर्ण देहोंमें ] घूमनेवाला है, [ अग्निरूपसे सर्वत्र ] प्रज्वलित होनेवाला है, [ ब्रह्मरूपसे ] पूर्ण है, [ आकाश- रूपसे ] अत्यन्त स्तब्ध ( निष्कम्प ) है, [ सबसे अविरोधी होनेके कारण ] तू यह जगद्रूप एक सभाके समान है, तू ही [ यज्ञके आरम्भमे प्रस्तोताके द्वारा ] हिङ्कृत है, तथा [ उच्चै प्रस्तोताद्वारा यज्ञमे ] तू ही हिङ्क्रियमाण है, [ यज्ञारम्भमें उद्गाताद्वारा ] तू ही उच्च स्वरसे गाया जानेवाला उद्गीथ है और [ यज्ञके मध्यमें उसके द्वारा ] तू ही उद्गीयमान है। तू ही [ अध्वर्युद्वारा ] श्रावित और [ आग्नीध्रद्वारा ] प्रत्याश्रावित हे; आर्द्र (अर्थात् मेघ) में सम्यक् प्रकारसे दीप्त है, तू विभु (विविधरूप होनेवाला) है और प्रभु (समर्थ) है; तू [भोक्ता अग्निरूपसे] ज्योति है, [कारणरूपसे ] सबका प्रलयस्थान है तथा [ सबका सहार करनेवाला होनेसे ] सर्वगं है ॥ ४ ॥ फिर 'आम५सि आमन्धि' इत्यादि मन्त्रसे इसे ऊपर उठाता हे । [ इस मन्त्रका अर्थ—] 'आमंसि'—तू मब जानता है,

  • कुशोसे बुहारना । † गोबर और जलसे वेदीको लीपना । ‡ जहाँ-जहाँ 'स्वाहा' आये, वहाँ आहुति देनी चाहिये । उ० अ० ६४—