भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 544, कुल 832 में से

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पृष्ठ 544

५०६ * बृहदारण्यकोपनिषद् * [ ६ 'आर्माहि ते महि'—मैं तेरी महिमाको अच्छी तरह जानता उस इस मन्थका उद्दालक आरुणिने अपने शिष्य हूँ । वह प्राण राजा, ईशान ( ईश्वर ) और अधिपति है । वाजसनेय याज्ञवल्क्यको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई वह मुझे राजा, ईशान और अधिपति करे ॥ ५ ॥ इस मन्थको सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न इसके पश्चात् 'तत्सवितुर्वरेण्यम्' इत्यादि मन्त्रसे इस हो जायँगी और पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका मन्थको भक्षण करता है । [ 'तत्सवितुः' इत्यादि मन्त्रका वाजसनेय याज्ञवल्क्यने अपने शिष्य मधुक पैङ्ग्यको उपदेश अर्थ—] 'तत्सवितुर्वरेण्यम्'—सूर्यके उस वरेण्य-श्रेष्ठ पदका करके कहा था, यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें मैं ध्यान करता हूँ । 'वाता मधु ऋतायते'—पवन मधुर, शाखाएँ उत्पन्न हो जायेंगी और पत्ते निकल आवेंगे।' उस मन्द गतिसे बह रहा है। 'सिन्धवः मधु क्षरन्ति'—नदियों इस मन्थका मधुक पैङ्ग्यने अपने शिष्य चूल भागवित्ति को मधु-रसका स्राव कर रही हैं। 'नः ओषधीः माध्वीः सन्तु'— उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा हमारे लिये ओषधियाँ मधुर हों । 'भूः स्वाहा' [ यहाँतक- तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायेंगी और पत्ते निकल आवेंगे।' के मन्त्रसे मन्थका पहला ग्रास भक्षण करे । ] 'देवस्य भर्गः धीमहि'—हम सवितादेवके तेजका ध्यान करते हैं। 'नक्तमुत उस इस मन्थका चूल भागवित्तिने अपने शिष्य जानकि उषसः मधु'—रात और दिन सुखकर हों। 'पार्थिव रजः आयस्थूणको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई इसे सूखे मधुमत्'—पृथिवीके धूलिकण उद्वेग न करनेवाले हों । 'द्यौः ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायेंगी और पिता नः मधु अस्तु'—पिता द्युलोक हमारे लिये सुखकर हो । पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका जानकि आयस्थूणने 'भुवः स्वाहा' [ यहाँतकके मन्त्रसे दूसरा ग्रास भक्षण अपने शिष्य सत्यकाम जाबालको उपदेश करके कहा था, 'यदि करे ] । 'धियः नः प्रचोदयात्'—जो सवितादेव कोई इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो हमारी बुद्धियोंको प्रेरित करता है। 'नः वनस्पतिः मधुमान्'— जायँगी और पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका सत्यकाम हमारे लिये वनस्पति ( सोम ) मधुर रसमय हो । 'सूर्यः जाबालने अपने शिष्योंको उपदेश करके कहा था, 'यदि कोई मधुमान् अस्तु'—सूर्य हमारे लिये मधुमान् हो । 'गावः नः इसे सूखे ठूँठपर डाल देगा तो उसमें शाखाएँ उत्पन्न हो जायँगी माध्वीः भवन्तु'—किरणें अथवा दिशाएँ हमारे लिये सुखकर और पत्ते निकल आवेंगे।' उस इस मन्थका, जो पुत्र या हों । 'स्वः स्वाहा' [ यहाँतकके मन्त्रसे तृतीय ग्रास शिष्य न हो, उसे उपदेश न करे ॥ ७-१२ ॥ भक्षण करे ] । इसके पश्चात् सम्पूर्ण सावित्री ( गायत्रीमन्त्र ), यह मन्थकर्म चतुरौदुम्बर ( चार औदुम्बरकाष्ठके बने 'मधु वाता ऋतायते' इत्यादि समस्त मधुमती ऋचा और पदार्थोंवाला ) है । इसमे औदुम्बरकाष्ठ ( गूलरकी लकड़ी ) 'अहमेवेद सर्वं भूयासम्' (यह सब मैं ही हो जाऊँ) 'भूर्भुवः का स्रुव, औदुम्बरकाष्ठका चमस, औदुम्बरकाष्ठका इध्म और स्वाहा'—इस प्रकार कहकर अन्तमें समस्त मन्थको भक्षण- औदुम्बरकाष्ठकी दो उपमन्थनी होती हैं। इसमें व्रीहि ( धान ), कर, दोनों हाथ धो, अग्निके पश्चिम भागमे पूर्वकी ओर सिर यव (जौ ), तिल, माष (उड़द ), अणु (सावाँ ), प्रियङ्गु करके बैठता है। प्रातःकालमें 'दिशामेकपुण्डरीकमस्यहं ..... ( काँगनी ), गोधूम (गेहूँ ), मसूर, खल्व (वाल ) और भूयासम्' इस मन्त्रद्वारा आदित्यका उपस्थान ( नमस्कार ) खलकुल (कुलथी)—ये दस ग्रामीण अन्न उपयुक्त होते करता है । फिर जिस मार्गसे गया होता है, उसीसे लौटकर हैं। उन्हें पीसकर दही, मधु और घृतमे मिलाकर घृतसे हवन अग्निके पश्चिम भागमें बैठकर [ आगे कहे जानेवाले ] वंशको करता है ॥ १३ ॥ जपता है ॥ ६ ॥ चतुर्थ सन्तानोत्पत्ति-विज्ञान ( इच्छानुसार सद्गुणयुक्त सन्तान उत्पन्न करने, सर्वथा चराचर समस्त भूतोंका रस-सार अथवा आधार पृथिवी है, न उत्पन्न करने तथा संयमयुक्त जीवन-निर्माण करनेकी युक्ति पृथिवीका रस जल है, जलका रस—उसपर निर्भर करनेवाली बतलानेके लिये इस ब्राह्मणका आरम्भ किया जाता है, मन्थाख्य ओषधियाँ हैं, ओषधियोंका रस—सार पुष्प है, पुष्पका रस कर्मकर्ता प्राणदर्शी पुरुषका ही इसमें अधिकार है।) फल है, फलका रस—आधार पुरुष है, पुरुषका रस—सार १. दिशाओंका एक पुण्डरीक ( अर्थात् अखण्ड श्रेष्ठ ) है, मैं मनुष्योंमें एक पुण्डरीक होऊँ ।