कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 551, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५१३ नामोंसे भी उसका प्रतिपादन होता है।) वह अत्यन्त विलक्षण है। जिसके बलका कोई माप नहीं है, वह 'अमितौजाः' प्राण ही ब्रह्माजीका सिंहासन-पलँग है। मानसी (प्रकृति) उनकी प्रिया है। वह मनकी कारणभूता अथवा मनको आनन्दित करनेवाली होनेसे ही मानसी कहलाती है। उसके आभूषण भी उसीके स्वरूपभूत हैं। उसकी छायामूर्ति 'चाक्षुषी' नामसे प्रसिद्ध है। वह तैजस नेत्रोंकी प्रकृति होनेके कारण अत्यन्त तेजोमयी है। उसके आभूषणादि भी उसीके समान तेजोमय हैं। जरायुज, स्वेदज, अण्डज और उद्भिज-इन चतुर्विध प्राणियोंका नाम जगत् है। यह सम्पूर्ण जगत्- जड-चेतन-समुदाय ब्रह्माजीकी वाटिकाके पुष्प तथा उनके धौत एवं उत्तरीयसूप युगल वस्त्र हैं। वहाँकी अप्सराएँ- साधारण युवतियाँ 'अम्बा' और 'आम्बायवी' नामसे प्रसिद्ध हैं। जगज्जननी श्रुतिरूपा होनेसे वे 'अम्बा' कहलाती हैं। तथा 'अम्ब' (अधिक) और अयव (न्यून) भावसे रहित बुद्धि- रूपा होनेसे उनका नाम 'आम्बायवी' है। इसके सिवा वहाँ 'अम्बया' नामकी नदियाँ बहती हैं। अम्बक (नेत्र) रूप ब्रह्मज्ञानकी ओर ले जानेके कारण उनकी 'अम्बया' (अम्बम्- अम्बकम् लक्षीकृत्य यान्ति) संज्ञा है। उस ब्रह्मलोकको जो इस प्रकार जानता है, वह उसीको प्राप्त होता है। उसे जब कोई अमानव पुरुष आदित्यलोकसे ले आता है, उस समय ब्रह्माजी अपने परिचारकों और अप्सराओंसे कहते हैं- 'दौड़ो, उस महात्मा पुरुषका मेरे यशके-मेरी प्रतिष्ठाके अनुकूल स्वागत करो, मेरे लोकमें ले आनेवाली उपासना आदिसे निश्चय ही यह उस विजरा नदीके समीपतक आ पहुँचा है, अवश्य ही अब यह कभी जरावस्थाको नहीं प्राप्त होगा' ॥ ३ ॥ ब्रह्माजीका यह आदेश मिलनेपर उसके पास स्वागतके लिये पाँच सौ अप्सराएँ जाती हैं। उनमेंसे सौ अप्सराएँ तो हाथोंमें हल्दी, केसर और रोली आदिके चूर्ण लिये रहती हैं। सौके हाथोंमें भाँति भाँतिके दिव्य वस्त्र एव अलङ्कार होते हैं। सौ अप्सराएँ हाथोंमें फल लिये होती हैं। सौके हाथोंमें नाना प्रकारके दिव्य अङ्गराग होते हैं। तथा सौ अप्सराएँ अपने हाथोंमें भाँति-भाँतिकी मालाएँ लिये होती हैं। वे उस महात्माको ब्रह्मोचित अलङ्कारोंसे अलङ्कृत करती हैं। वह ब्रह्मवेत्ता पुरुष ब्रह्माजीके योग्य अलङ्कारोंसे अलङ्कृत हो ब्रह्माजीके स्वरूपको ही प्राप्त कर लेता है। फिर वह 'आर' नामक जलाशयके पास आता है और उसे मनके द्वारा- सङ्कल्पसे ही लाँघ जाता है। उस जलाशयतक पहुँचनेपर भी अज्ञानी मनुष्य उसमें डूब जाते हैं। फिर वह ब्रह्मवेत्ता मुहूर्ताभिमानी 'येष्टिह' नामक देवताओंके पास आता है, किंतु वे विघ्नकारी देवता उसके पाससे भाग खड़े होते हैं। तत्पश्चात् वह विजरा नदीके तटपर आता है और उसे भी सङ्कल्पसे ही पार कर लेता है। वहाँ वह पुण्य और पापोंको झाड़ देता है। जो उसके प्रिय कुटुम्बी होते हैं, वे तो उसका पुण्य पाते हैं, और जो उससे द्वेष करनेवाले होते हैं, उन्हें उसका पाप मिलता है। उस विषयमें यह दृष्टान्त है। रथसे यात्रा करने- वाला पुरुष रथको दौड़ाता हुआ रथके दोनों चक्कोंको देखता है; उस समय रथचक्रोंका जो भूमिसे संयोग-वियोग होता है, वह उस द्रष्टाको नहीं प्राप्त होता। इसी प्रकार वह ब्रह्मवेत्ता रात और दिनको देखता है, पुण्य और पापको देखता है, तथा अन्य समस्त द्वन्द्वोंको देखता है; द्रष्टा होनेके कारण ही उसका इनसे सम्बन्ध नहीं होता। अतएव यह पुण्य और पापसे रहित होता है। फलतः वह ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मको ही प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ तब वह इल्य वृक्षके पास आता है, उसकी नासिकामें ब्रह्मगन्धका प्रवेश होता है। (वह गन्ध इतनी दिव्य है कि उसके सामने अन्य लोकोंकी सुगन्ध दुर्गन्धवत् प्रतीत होती है।) फिर वह सालज्य नगरके समीप आता है, वहाँ उसकी रसनामें उस दिव्यातिदिव्य ब्रह्मरसका प्रवेश (अनुभव) होता है, जिसका उसे पहले कभी अनुभव नहीं हुआ रहता। फिर वह 'अपराजित' नामक ब्रह्म-मन्दिरके समीप आता है, वहाँ उसमें ब्रह्मतेज प्रवेश करता है। तत्पश्चात् वह द्वार-रक्षक इन्द्र और प्रजापतिके पास आता है; वे उसके सामनेसे मार्ग छोड़कर हट जाते हैं। तदनन्तर वह 'विभुप्रमित' नामक सभा-मण्डपमें आता है; वहाँ उसमें ब्रह्मयश प्रवेश करता है। फिर वह 'विचक्षणा' नामक वेदीके पास आता है। 'वृहत्' और 'रथन्तर'-ये दो साम उसके दोनों अगले पाये हैं और 'श्यैत' एव 'नौधस' नामक साम उसके दोनों पिछले पाये हैं। 'वैरूप' और 'वैराज' नामक साम उसके दक्षिण और उत्तर पार्श्व हैं तथा 'शाक्कर' और 'रैवत' साम उसके पूर्व एव पश्चिम पार्श्व हैं। वह समष्टि-बुद्धिरूपा है। वह ब्रह्मवेत्ता उस बुद्धिके द्वारा विशेष दृष्टि प्राप्त कर लेता है। फिर वह 'अमितौजाः' नामक पलँग (या सिंहासन) के पास आता है, वह पर्यङ्क प्राणस्वरूप है। भूत और भविष्य-ये दोनों काल उसके अगले पाये हैं और श्रीदेवी एव भूदेवी-ये दोनों उसके पिछले पाये हैं। उसके दक्षिण-उत्तर भागमें जो 'अनूच्य' नामके दीर्घ खटवाङ्ग हैं, वे 'बृहत्' और 'रथन्तर' नामक साम हैं और पूर्व- उ० अं० ६५-