भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 550, कुल 832 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 550

निश्चय ही यह स्वर्गलोकका द्वार है, जो कि चन्द्रमाके नामसे प्रसिद्ध है । जो अधिकारी ( दैवी- सम्पत्तिसे युक्त होनेके कारण ) उस स्वर्गरूपी चन्द्रमाका प्रत्याख्यान कर देता है अर्थात् जहाँसे पुनः नीचे गिरना पड़ता है, ऐसा स्वर्गलोक मुझे नहीं चाहिये—इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके जो निष्काम धर्मका अनुष्ठान करते हुए चन्द्रलोकको त्याग देता है, उस पुरुषको उसका वह शुभ संकल्प चन्द्रलोकसे भी ऊपर नित्य ब्रह्मलोकमे पहुँचा देता है । परंतु जो स्वर्गीय सुखके प्रति ही आसक्त होनेके कारण उस चन्द्रलोकको अस्वीकार नहीं करता, उस सकामकर्मी स्वर्गवासी- को, उसके पुण्य भोगकी समाप्ति होनेपर, देववर्ग वृष्टिके रूपमें परिणत करके इस लोकमें ही पुनः बरसा देता है।

वह वर्षाके रूपमें यहाँ आया हुआ अनुशयी जीव अपनी पूर्व-वासनाके अनुसार कीट अथवा पतङ्ग या पक्षी, अथवा व्याघ्र या सिंह अथवा मछली, या साँप-बिच्छू अथवा मनुष्य या दूसरा कोई जीव होकर इनके अनुकूल शरीरोंमें अपने कर्म और विद्या—उपासनाके अनुसार जहाँ-कहाँ उत्पन्न होता है।

( इस प्रकार संसारकी स्वर्ग-नरकरूपा दुर्गतिको समझ- कर जो उससे विरक्त हो चुका है और ज्ञानोपदेशके लिये गुरुदेवकी शरणमें आया है ) उस अपने समीप आये हुए शिष्यसे दयालु एवं तत्त्वज्ञ गुरु इस प्रकार पूछे—'वत्स ! तुम कौन हो ?' गुरुके इस प्रकार प्रश्न करनेपर शिष्य ( अपनेको देहादि-सङ्घातरूप मानकर ) यों उत्तर दे—'हे देवगण ! जो पञ्चदशकलात्मक—शुक्ल और कृष्णपक्षके हेतुभूत, श्रद्धाद्वारा प्रकट, पितृलोकरूप स्वरूप एवं नाना प्रकारके भोग प्रदान करनेमें समर्थ है, उन चन्द्रमाके निकटसे प्रादुर्भूत होकर पुरुषरूप अग्निमें स्थापित हुआ जो श्रद्धा, सोम, वृष्टि और अन्नका परिणाम- भूत वीर्य है, उस वीर्यके ही रूपमें स्थित हुए मुझ अनुशयी जीवको तुमने वीर्याधान करनेवाले पुरुषमें प्रेरित किया । तत्पश्चात् गर्भाधान करनेवाले पुरुष (पिता) के द्वारा तुमने मुझे माताके गर्भमें भी स्थापित करवाया । कुछ सम्वत्सरोंतक जीवन धारण करनेवाले पिताके साथ मैं एकताको प्राप्त हुआ था । मैं स्वयं भी कुछ सम्वत्सरोंतक ही जीवन धारण करनेवाला होकर ब्रह्मज्ञान अथवा उसके विपरीत मिथ्याज्ञानके निमित्त योनिविशेष- में शरीर धारण करके स्थित हूँ। इसलिये अब मुझे अमृतत्वकी प्राप्तिके साधनभूत ब्रह्मज्ञानके लिये अनेक ऋतुओं ( वर्षों ) तक अक्षय रहनेवाली दीर्घ आयु प्रदान करें—ब्रह्मसाक्षात्कार- पर्यन्त मेरे दीर्घजीवनके लिये चिरस्थायिनी आयुकी पुष्टि करें।

क्योंकि यह जानकर मैं देवताओंसे प्रार्थना करता हूँ, अतः उसी सत्यसे, उसी तपस्यासे, जिनका मैं अभी उल्लेख कर आया हूँ, मैं ऋतु हूँ—संवत्सरादिरूप मरणधर्मा मनुष्य हूँ । आर्तव हूँ—ऋतु अर्थात् रज-वीर्यसे उत्पन्न देह हूँ। यदि ऐसी बात नहीं है तो आप ही कृपापूर्वक बतायें, मैं कौन हूँ ? क्या जो आप हैं, वही मैं भी हूँ ?' उसके इस प्रकार कहनेपर संसार-भयसे डरे हुए उस शिष्यको गुरु ब्रह्मविद्याके उपदेश- द्वारा भवसागरसे पार करके बन्धनमुक्त कर देता है ॥ २ ॥

वह परब्रह्मका उपासक पूर्वोक्त देवयान-मार्गपर पहुँचकर पहले अग्निलोकमें आता है, फिर वायुलोकमें आता है; वहाँसे वह सूर्यलोकमें आता है, तदनन्तर वरुणलोकमें आता है; तत्पश्चात् वह इन्द्रलोकमें आता है, इन्द्रलोकसे प्रजापति- लोकमें आता है तथा प्रजापतिलोकसे ब्रह्मलोकमें आता है। इस प्रसिद्ध ब्रह्मलोकके प्रवेश-पथपर पहले 'आर' नामसे प्रसिद्ध एक महान् जलाशय है। (यह उस मार्गका विघ्न है, काम- क्रोधादि अरियों—शत्रुओं द्वारा निर्मित होनेसे ही उसका नाम 'आर' पड़ा है ।) उस जलाशयसे आगे मुहूर्ताभिमानी* देवता हैं, जो काम-क्रोध आदिकी प्रवृत्ति उत्पन्न करके ब्रह्म- लोक-प्राप्तिके अनुकूल की हुई उपासना और यज्ञ-यागादिके पुण्यको नष्ट करनेके कारण 'येष्टिहा' कहलाते हैं। उससे आगे विजरा नदी है, जिसके दर्शनमात्रसे जराव्यवस्था दूर हो जाती है। (यह नदी उपासनारूपा ही है ।) उससे आगे 'इल्य' नामक वृक्ष है। 'इला' पृथिवीका नाम है, उसका ही स्वरूप होनेसे उसका नाम 'इल्य' है। उससे आगे अनेक देवताओं- द्वारा सेव्यमान उद्यान, बावली, कुएँ, तालाब और नदी आदि भाँति-भाँतिके जलाशयोंसे युक्त एक नगर है, जिसके एक ओर तो विरजा नदी है और दूसरी ओर प्रत्यञ्चाके आकारका ( अर्द्धचन्द्राकार ) एक परकोटा है। उसके आगे ब्रह्माजीका निवासभूत विशाल मन्दिर है, जो 'अपराजित' नामसे प्रसिद्ध है। सूर्यके समान तेजोमय होनेके कारण वह कभी किसीके द्वारा पराजित नहीं होता । मेघ और यज्ञरूपसे उपलक्षित वायु और आकाशरूप इन्द्र और प्रजापति उस ब्रह्म-मन्दिरके द्वाररक्षक हैं।

वहाँ 'विभुप्रमित' नामक सभामण्डप है ( जो अहङ्कार- स्वरूप है )। उसके मध्यभागमें जो वेदी ( चबूतरा ) है, वह 'विचक्षणा' नामसे प्रसिद्ध है। (बुद्धि और महत्तत्त्व आदि

  • दो घड़ी ( ४८ मिनट) के कालको मुहूर्त कहते हैं। † य ईष्टं घ्नन्ति ( जो इष्ट वस्तुकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचाते हैं।