कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 549, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कौषी कि णोपनिषद्
शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणिस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान्सन्दधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! इसका अर्थ ऐतरेयोपनिषद्के आरम्भमें छप चुका है ।
प्रथम अध्याय पर्यङ्क-विद्या
गर्गके प्रपौत्र सुप्रसिद्ध महात्मा चित्र यज्ञ करानेवाले थे । इसके लिये उन्होंने अरुणके पुत्र उद्दालकको प्रधान ऋत्विक्के रूपमें वरण किया । परंतु उन प्रसिद्ध उद्दालक मुनिने स्वयं न पधारकर अपने पुत्र श्वेतकेतुको भेजा और कहा—'वत्स ! तुम जाकर चित्रका यज्ञ कराओ।' श्वेतकेतु यज्ञमें पधारकर एक ऊँचे आसनपर विराजमान हुए । उन्हें आसनपर बैठे देख चित्रने पूछा—'गौतम-कुमार ! इस लोकमें कोई ऐसा आवृत्त (आवरणयुक्त) स्थान है, जिसमें मुझे ले जाकर रक्खोगे ? अथवा कोई उससे भिन्न—सर्वथा विलक्षण आवरण- शून्य पद है, जिसे जानकर तुम उसी लोकमें मुझे स्थापित करोगे ?' श्वेतकेतुने कहा—'मैं यह सब नहीं जानता । किंतु यह प्रश्न सुनकर मुझे प्रसन्नता हुई है । मेरे पिता आचार्य हैं— वे शास्त्रके गूढ अर्थका ज्ञान रखते, दूसरे लोगोंको शास्त्रीय आचारमें लगाते और स्वय भी शास्त्रके अनुकूल ही आचरण करते हैं; अतः उन्हींसे यह बात पूछूँगा।' यों कहकर वे अपने पिता आरुणि (उद्दालक) के पास गये और प्रश्नको सामने रखते हुए बोले—'पिताजी ! चित्रने इस इस प्रकारसे मुझसे प्रश्न किया है । सो इसके सम्बन्धमें मैं किस प्रकार उत्तर दूँ ?' उद्दालकने कहा—'वत्स ! मैं भी इस प्रश्नका उत्तर नहीं जानता । अब हमलोग महाभाग चित्रकी यज्ञशालामें ही इस तत्त्वका अध्ययन करके इस विद्याको प्राप्त करेंगे । जब दूसरे लोग हमें विद्या और धन देते हैं तो चित्र भी देंगे ही । इसलिये आओ, हम दोनों चित्रके पास चलें।' वे प्रसिद्ध आरुणि मुनि हाथमें समिधा ले जिज्ञासुके वेषमें गर्गके प्रपौत्र चित्रके यहाँ गये । 'मैं विद्या ग्रहण करनेके लिये तुम्हारे पास आया हूँ' इस भावनाको व्यक्त करते हुए उन्होंने चित्रके समीप गमन किया । उन्हें इस प्रकार आया देख चित्रने कहा—'गौतम ! तुम ब्राह्मणोंमें पूजनीय एव ब्रह्मविद्याके अधिकारी हो; क्योंकि मेरे-जैसे लघु व्यक्तिके पास आते समय तुम्हारे मनमें अपने बड़प्पनका अभिमान नहीं हुआ है । इसलिये आओ, तुम्हें निश्चय ही इस पूछे हुए विषयका स्पष्ट ज्ञान कराऊँगा' ॥ १ ॥ सुप्रसिद्ध यज्ञकर्ता चित्रने इस प्रकार उपदेश आरम्भ किया—ब्रह्मन् ! जो कोई भी अग्निहोत्रादि सत्कर्मोंका अनुष्ठान करनेवाले लोग हैं, वे सब के सब जब इस लोकसे प्रयाण करते हैं तो (क्रमशः धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष और दक्षिणायन आदिके अभिमानी देवताओंके अधिकारमें होते हुए अन्ततोगत्वा) चन्द्रलोक अर्थात् स्वर्गमें ही जाते हैं । उनके प्राणों (इन्द्रियों और प्राणों) से चन्द्रमा शुक्लपक्षमें पुष्टिको प्राप्त होते हैं । वे (चन्द्रमा) कृष्णपक्षमें उन स्वर्गवासी जीवोंकी तृप्ति नहीं कर पाते ।