कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 564, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५२६ | * कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् * | [ अध्याय ३ |
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अन्न रसका अनुभव नहीं करा सकती । उस दशामें मनुष्य यह कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिये मैं इस अन्न-रसका अनुभव न कर सका।' प्रज्ञासे पृथक् होकर हाथ किसी भी कर्मका ज्ञान नहीं करा सकते । उस दशामें मनुष्य यह कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिये मैं इस कर्मको नहीं जान सका।' प्रज्ञासे पृथक् होकर शरीर किसी सुख दुःखका ज्ञान नहीं करा सकता । उस दशामें मनुष्य कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिये मैं इन सुख दुःखोंको नहीं जान सका ।' प्रज्ञासे पृथक् हो उपस्थ किसी भी आनन्द, रति और प्रजोत्पत्तिका ज्ञान नहीं करा सकता; उस दशामें मनुष्य कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिये मैं इस आनन्द, रति और प्रजोत्पत्तिका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सका ।' प्रज्ञासे पृथक् रहकर दोनों पैर किसी भी गमन-क्रियाका बोध नहीं करा सकते; उस दशामें मनुष्य यह कहता है कि 'मेरा मन अन्यत्र चला गया था, इसलिये मैं इस गमन क्रियाका अनुभव नहीं कर सका।' कोई भी बुद्धिवृत्ति प्रज्ञासे पृथक होनेपर नहीं सिद्ध हो सकती, उसके द्वारा ज्ञातव्य वस्तुका बोध नहीं हो सकता ॥ ७ ॥
वाणीको जाननेकी इच्छा न करे; वक्तारको—वाणीके प्रेरक आत्माको जाने । गन्धको जाननेकी इच्छा न करे; जो गन्धको ग्रहण करनेवाला आत्मा है, उसको जाने । रूपको जाननेकी इच्छा न करे; रूपके ज्ञाता साक्षी आत्माको जाने । शब्दको जाननेकी इच्छा न करे; उसे सुननेवाले आत्माको जाने । अन्नके रसको जाननेकी इच्छा न करे; उस अन्नरसके ज्ञाता आत्माको जाने । कर्मको जाननेकी इच्छा न करे; कर्ता (आत्मा) को जाने । सुख-दुःखको जाननेकी इच्छा न करे; सुख-दुःखके विज्ञाता (साक्षी आत्मा) को जाने । आनन्द, रति और प्रजोत्पत्तिको जाननेकी इच्छा न करे; आनन्द, रति और प्रजोत्पत्तिके ज्ञाता (आत्मा) को जाने । गमन-क्रियाको जाननेकी इच्छा न करे; गमन करनेवाले (साक्षी आत्मा) को जाने । मनको जाननेकी इच्छा न करे; मनन करनेवाले (आत्मा) को जाने ।
वे ये दस ही भूतमात्राएँ (नाम आदि विषय) हैं, जो प्रज्ञामें स्थित हैं तथा प्रज्ञाकी भी दस ही मात्राएँ (वाक् आदि इन्द्रियरूप) हैं, जो भूतोंमें स्थित हैं। यदि वे प्रसिद्ध भूतमात्राएँ न हों तो प्रज्ञाकी मात्राएँ भी नहीं रह सकतीं और प्रज्ञाकी मात्राएँ न हों तो भूतमात्राएँ भी नहीं रह सकतीं । इन दोमेसे किसी भी एकके द्वारा किसी भी रूप (विषय अथवा इन्द्रिय) की सिद्धि नहीं हो सकती । (तात्पर्य यह कि इन्द्रियसे विषयकी और विषयसे इन्द्रियकी सत्ता जानी जाती है; यदि केवल विषय हो तो विषयसे विषयका ज्ञान नहीं हो सकता अथवा यदि केवल इन्द्रिय रहे तो उससे भी इन्द्रियका ज्ञान होना सम्भव नहीं है; अतः दोनोंका—भूतमात्रा और प्रज्ञामात्राका (विषय तथा इन्द्रियका) होना आवश्यक है।
(विषय और इन्द्रियोमे जो परस्पर भेद है, वैसा प्रज्ञामात्रा और भूतमात्रामें भेद नहीं है—इस आशयसे कहते हैं—) इनमें नानात्व नहीं है। अर्थात् प्रज्ञामात्रा और भूतमात्राका जो स्वरूप है, उसमें भेद नहीं है। वह इस प्रकार समझना चाहिये । जैसे रथकी नेमि अरोंमें और अरे रथकी नाभिमे आश्रित हैं, इसी प्रकार ये भूतमात्राएँ प्रज्ञामात्राओंमें स्थित हैं और प्रज्ञामात्राएँ प्राणमें प्रतिष्ठित हैं। वह यह प्राण ही प्रज्ञात्मा, आनन्दमय, अजर और अमृतरूप है। वह न तो अच्छे कर्मसे बढता है और न खोटे कर्मसे छोटा ही होता है । यह प्राण एव प्रज्ञारूप चेतन परमात्मा ही इस देहाभिमानी पुरुषसे साधु कर्म करवाता है। वह भी उसीसे करवाता है, जिसे इन प्रत्यक्ष लोकोंसे ऊपर ले जाना चाहता है; तथा जिसे वह इन लोकोंकी अपेक्षा नीचे ले जाना चाहता है, उससे असाधु कर्म करवाता है। यह लोकपाल है, यह लोकोंका अधिपति है और यह सर्वेश्वर है। इन सब गुणोंसे युक्त वह प्राण ही मेरा आत्मा है—इस प्रकार जाने । वह मेरा आत्मा है, इस प्रकार जाने ॥ ८ ॥
॥ तृतीय अध्याय समाप्त ॥ ३ ॥