भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 565, कुल 832 में से

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पृष्ठ 565

ॐ चतुर्थ अध्याय अजातशत्रु और गार्ग्यका संवाद


[बायाँ स्तम्भ]

गर्गगोत्रमें उत्पन्न एव गार्ग्य नामसे प्रसिद्ध एक ब्राह्मण थे, जो बलाकाके पुत्र थे। उन्होंने सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन तो किया ही था, वे वेदोंके अच्छे वक्ता भी थे। उन दिनों संसारमे सब ओर उनकी बड़ी ख्याति थी। वे उशीनर देशके निवासी थे, परन्तु सदा विचरण करते रहनेके कारण कभी मत्स्यदेशमें, कभी कुरु पाञ्चालमें और कभी काशी तथा मिथिला प्रान्तमें रहते थे। इस प्रकार वे सुप्रसिद्ध गार्ग्य एक दिन काशीके विद्वान् राजा अजातशत्रुके पास गये और अभिमानपूर्वक बोले—'राजन् ! मैं तुम्हारे लिये ब्रह्मतत्त्वका उपदेश करूँगा।' गार्ग्यके यों कहनेपर उन प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'ब्रह्मन् ! आपकी इस बातपर हम आपको एक हजार गौएँ देते हैं। निश्चय ही आजकल लोग जनक- जनक कहते हुए ही उनके समीप दौड़े जाते हैं (अर्थात् राजा जनक ही ब्रह्मविद्याके श्रोता और दानी हैं, ऐसा कहकर प्रायः लोग उन्हींके निकट जाते हैं; आज आपने हमारे पास इसी उद्देश्यसे आकर राजा जनकके समान ही हमारा गौरव बढाया है। अतः हम आपको एक हजार गौएँ देते हैं) ॥ १ ॥

तब वे प्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य बोले—'राजन् ! यह जो सूर्यमण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मबुद्धिसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। निश्चय ही यह सबसे महान् और शुक्ल वस्त्र धारण करनेवाला है। * यह सबका अतिक्रमण करके-सबसे ऊँची स्थितिमें स्थित है तथा यह मनका मस्तक हे। इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह मनुष्य भी, जो इस प्रसिद्ध सूर्यमण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, सबका अतिक्रमण


[दायाँ स्तम्भ]

करके—सबसे ऊँची स्थितिमें स्थित होता है तथा समस्त भूतोंका मस्तक माना जाता है' ॥ २-३ ॥

वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो चन्द्र- मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा— 'नहीं नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह सोम राजा है और अन्नका आत्मा है। निश्चय ही इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध चन्द्रमण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, अन्नका आत्मा होता है (अन्न-राशिसे सम्पन्न होता है)' ॥४॥

वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो विद्युन्मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजात- शत्रुने कहा—'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह तेजका आत्मा है—निश्चय ही इस भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध विद्युन्मण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, तेजका आत्मा (महान् तेजस्वी) होता है' ॥ ५ ॥

वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो मेघ- मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह शब्दका आत्मा है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध मेघ मण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, शब्दका आत्मा (समस्त वाङ्मयके चरम तात्पर्यका ज्ञाता) हो जाता है' ॥ ६ ॥

वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो आकाश- मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह पूर्ण, प्रवृत्तिशून्य (निष्क्रिय) और ब्रह्म (सबसे बृहत्) है— निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध आकाशमण्डलान्तर्गत पुरुषकी


[पाद-टिप्पणी]

  • सूर्यकी तेजोमयी किरणें भास्वर शुक्लवर्णकी मानी गयी हैं, अत उनमें आवृत्त होनेके कारण सूर्यमण्डलके अधिष्ठाता पुरुषको 'पाण्डरवासा' कहा गया। अथवा 'पाण्डरवासा' पद चन्द्रमाका विशेषण है। चन्द्रमा स्वभावत शुक्ल रश्मियोंसे आच्छादित है तथा सूर्यकी जो सुषुम्ना नामकी किरण है, वह चन्द्रमारूप ही मानी गयी है। बृहदारण्यक उपनिषद्में द्वितीय अध्यायके प्रथम ब्राह्मणमें भी यह प्रसङ्ग आया है, वहाँ 'पाण्डरवासा' यह विशेषण चन्द्रमाके लिये ही आया है।