भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 566

५२८ * कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् * [ अध्याय ४

इस रूपमे उपासना करता है, प्रजा और पशुसे पूर्ण होता है। इसके सिवा, न तो स्वय वह उपासक और न उसकी सतान ही समयसे (मनुष्यके लिये नियत सामान्य आयुसे) पहले मृत्युको प्राप्त होती है' ॥ ७॥

वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो वायु- मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा— 'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप संवाद न करें। यह इन्द्र (परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न), वैकुण्ठ (कहीं भी कुण्ठित न होने- वाला) और कभी परास्त न होनेवाली सेना है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध वायुमण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, अवश्य ही विजयशील, दूसरोंसे पराजित न होनेवाला और शत्रुओंपर विजय पानेवाला होता है' ॥ ८ ॥

वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो अग्नि- मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह विषासहि (दूसरोंके आक्रमणको सह सकनेवाला) है— निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह उपासक भी, जो इस प्रसिद्ध अग्निमण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, यह उपासनाके पश्चात् विषासहि (दूसरोंका वेग सह सकनेवाला) होता है' ॥ ९ ॥

वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो जल- मण्डलमें अन्तर्यामी पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह नामका आत्मा है (अर्थात् जितने भी नामधारी जीव हैं, उन सबका आत्मा—जीवनरूप है)—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रसिद्ध जलमण्डलान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, नामधारी जीवमात्रका आत्मा होता है। यह अधिदैवत उपासना बतायी गयी । अब अध्यात्म-उपासना बतायी जाती है ॥ १० ॥

वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो दर्पणमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं-नहीं, इसके विषयमे आप संवाद न करें। यह प्रतिरूप है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस दर्पणान्तर्गत पुरुषकी इस रूपमे उपासना करता है, उस प्रतिरूपगुणसे विभूषित होता है। उसकी संततिमें सब उसके अनुरूप ही जन्म लेते हैं, प्रतिकूल रूप और स्वभाव- वाले नहीं ॥ ११ ॥

वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो प्रति- ध्वनिमे पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं- नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह द्वितीय और अनपग है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इस प्रतिध्वनिगत पुरुषकी इस रूपमें उपासना करता है, अपने सिवा द्वितीय (स्त्री-पुत्रादि) को प्राप्त करता है तथा सदा द्वितीयवान् बना रहता है (अर्थात् उन स्त्री-पुत्र आदिसे उसका वियोग नहीं होता)' ॥ १२ ॥

वे सुप्रसिद्ध बलाकानन्दन गार्ग्य बोले—'यह जो जाते हुए पुरुषके पीछे ध्वन्यात्मक शब्द उसका अनुसरण करता है, उसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उनसे प्रसिद्ध राजा अजातशत्रुने कहा—'नहीं-नहीं, इसके विषयमें आप सवाद न करें। यह प्राणरूप है—निश्चय ही इसी भावसे मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी प्रकार वह भी, जो इसकी इस रूपमे उपासना करता है, न तो स्वय पूरी आयुके पहले मृत्युको प्राप्त होता है और न उसकी सतान ही पूर्ण आयुके पहले निधनको प्राप्त होती है' ॥ १३ ॥


१. विषका अर्थ यहाँ हविष्य है। अग्निमें जो हविष्य डाला जाता है, उसे वह भस्म करके सहन कर लेता है, इसलिये अग्नि विषासहि अर्थात् सहन करनेवाला है। २ जलके बिना जीवन-रक्षा असम्भव है, अत उसे नामधारी जीवमात्रका आत्मा कहा गया है।

१. रूपका ठीक वैसा ही प्रतिबिम्ब उपस्थित करनेके कारण उसे 'प्रतिरूप' कहा गया है। २ प्रतिध्वनि एक ध्वनिकी ही पुनरावृत्ति है, अतएव यह द्वितीय है। प्रतिध्वनिमें गतिका अभाव है, इसलिये वह 'अनपग' है। ३. चलते या दौड़ते समय श्वासकी गति कुछ तीव्र हो जाती है, उससे जो अव्यक्त शब्द होता है, उसीको यहाँ 'प्राण' रूप बताया गया प्रतीत होता है।