कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 573, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंखण्ड ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५३३ वे तेजमें प्रज्वलित अग्निके सदृश हैं। (अथवा राम्-मन्त्र अनन्त—'आ' और तेजोमय अग्नि 'र्' के साथ एक ही समय उच्चारित होता है। 'र' और 'आ' का एक साथ उच्चारण होनेसे 'रा' बनता है।) वे श्रीराम जब शीतल किरणोंवाली अर्थात् सौम्य कान्तिमती श्रीसीताजीके साथ संयुक्त होते हैं, तब उनसे अग्नीषोमात्मक (पुरुष और स्त्रीरूप) जगत्की उत्पत्ति होती है। (अथवा अनुष्णगु-शब्दका अर्थ है चन्द्रमा (म्) और विश्वका अर्थ है वैश्वानर-अग्नि (रा), अतः वैश्वानर-बीज 'रा' जब चन्द्र-बीज 'म्' से व्याप्त होता है, तब अग्नीषोमात्मक जगत्का वाचक 'राम्' यह मन्त्र बनता है।) श्रीराम सीताके साथ उसी प्रकार शोभा पाते हैं, जैसे चन्द्रमा चन्द्रिकाके साथ सुशोभित होते हैं ॥ १—६ ॥ ध्यान कौसल्यानन्दन श्रीराम अपनी प्रकृति—ह्लादिनीशक्ति श्रीसीताजीके साथ विराजमान हैं। उनका वर्ण श्याम है। वे पीताम्बर धारण किये हुए हैं। उनके सिरपर जटाभार सुशोभित है। उनके दो भुजाएँ हैं। कानोंमें कुण्डल शोभा पा रहे हैं। गलेमें रत्नोंकी माला चमक रही है। वे स्वभावतः धीर (निर्भय एव गम्भीर) हैं। धनुष धारण किये हुए हैं। उनके मुखपर सदा प्रसन्नता छायी रहती है। वे सङ्ग्राममें सदा ही विजयी होते हैं। अणिमा आदि आठ ऐश्वर्य- शक्तियाँ उनकी शोभा बढाती हैं। इस जगत्की कारणभूता मूल प्रकृतिरूपा परमेश्वरी सीता उनके वाम अङ्गको विभूषित कर रही हैं। सीताजीके श्री-अङ्गोंकी कान्ति सुवर्णके सदृश गौर है। उनके भी दो भुजाएँ हैं। वे समस्त दिव्य आभूषणों- से विभूषित हैं तथा हाथमें कमल धारण किये हुए हैं। उन चिदानन्दमयी सीतासे सटकर बैठे हुए भगवान् श्रीराम बड़े हृष्ट-पुष्ट दिखायी देते हैं। दक्षिण भागमें श्रीरघुनाथजीके छोटे भाई सुवर्ण-गौर कान्तिवाले श्रीलक्ष्मणजी हाथमें धनुष- बाण लिये खड़े हैं। उस समय श्रीराम, लक्ष्मण और श्रीसीताजीका एक त्रिकोण बन जाता है ॥ ७-९ ॥ चतुर्थ खण्ड षडक्षर मन्त्रका स्वरूप; भगवान् श्रीरामका स्तवन जैसे श्रीराम-मन्त्रका 'राम्' यह बीज बताया गया है, उसी प्रकार उसका शेष अंश भी बताया जाता है। स्व अर्थात् 'राम' शब्दके चतुर्थ्यन्त रूपके साथ जीव—अर्थात् 'नमः' पद हो तो 'रां रामाय नमः' यह षडक्षर मन्त्र बनता है। इस प्रकार षडक्षर मन्त्र सिद्ध होनेपर दो त्रिकोणरूप बनता है। (अर्थात् छहों अक्षरोंके न्यासके लिये छः कोण बनते हैं।) एक बार जब देवता भगवान्का दर्शन करनेके लिये आये, तब उन्होंने कल्पवृक्षके नीचे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान जगदीश्वर श्रीरघुनाथजीका इस प्रकार स्तवन किया— 'कामरूपधारी तथा मायामय स्वरूप ग्रहण करनेवाले श्रीरामको नमस्कार है। (अथवा कामबीज 'क्लीं' और मायामय बीज 'ह्रीं' से युक्त श्रीराम-मन्त्रको नमस्कार है—क्लीं रामाय नमः ह्रीं रामाय नमः ।) वेदके आदिकारण ॐकारस्वरूप श्रीरामको नमस्कार है। (इससे 'ॐ रामाय नम' इस मन्त्रकी सूचना मिलती है।) रमा श्रीसीताजीको धारण करनेवाले अथवा रमणीय अधरोंवाले, आत्मरूप, नयनाभिराम श्रीरामको नमस्कार है। श्रीजानकीजीका शरीर ही जिनका आभूषण अथवा जो श्रीजनकनन्दिनीके श्रीविग्रहको स्वय ही शृङ्गार आदिसे विभूषित करते हैं, जो राक्षसोंके संहारक तथा कल्याणमये विग्रहवाले हैं तथा जो दशमुख रावणका अन्त करनेके लिये यमराजस्वरूप हैं, उन मङ्गलमय रघुवीरको नमस्कार है। हे रामभद्र ! हे महाधनुर्धर ! हे रघुवीर ! हे नृपश्रेष्ठ ! हे दशवदन-विनाशक ! हमारी रक्षा कीजिये तथा हमें ऐसी श्री—ऐश्वर्य-सम्पदा दीजिये, जिसका सम्बन्ध आपसे हो, अर्थात् जो भगवत्प्रीत्यर्थ ही उपयोगमे लायी जा सके'* ॥ १-६ ॥
- कामरूपाय रामाय नमो मायामयाय च ॥ नमो वेदादिरूपाय ॐकाराय नमो नमः। रमाधाराय रामाय श्रीरामायात्ममूर्तये ॥ जानकीदेहभूषाय रक्षोघ्नाय शुभाङ्गिने। भद्राय रघुवीराय दशस्यान्तकरूपिणे ॥ रामभद्र महेष्वास रघुवीर नृपोत्तम। भो दशास्यान्तकास्माक रक्षां देहि श्रियं च ते ॥ (२-५)