भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 666, कुल 832 में से

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पृष्ठ 666

६१८ * महोपनिषद् * [ अध्याय ५

उपायका विचार करते हुए, इस रोगके घर अर्थात् अविद्याकी चिकित्साके लिये पूरा प्रयत्न करो, जिससे यह जन्म अर्थात् आवागमनके कष्टोंमें तुम्हें बारवार न डाले, और चित्‌रूपी समुद्र अपने-आपमें स्वच्छ आत्मपरिस्पन्दनके द्वारा विभासित हो उठे। 'वह चित्-सत्ता एक अखण्ड स्वरूपवाली है'— इस प्रकार अपने भीतर दृढ भावना करनी चाहिये। वह चित्-शक्ति चिन्मय समुद्रमें किञ्चित् क्षुभित हो रही है। समुद्रमें लहरोंके समान वहाँ स्वच्छ चिन्मय तरङ्ग ही उठ रहे हैं। अपने-आप आकाश-सरोवरमें जैसे वायु लहराता है, उसी प्रकार स्वात्मामें ही आत्मशक्तिसे आत्मा तरङ्गायमान होता है। सर्व-शक्तिमत्ताके कारण इस प्रकारकी दैवी स्फुरणा क्षणमात्रके लिये होती है। देश, काल और क्रियाकी शक्ति जिसको चलायमान करनेमें समर्थ नहीं होती, वह आत्मशक्ति अपने स्वभावको जानकर उच्च अनन्त पदमें स्थित है । यह चित् शक्ति जाननेमें न आनेके कारण परिमित-सी होकर रूपकी भावना करती है। उस परम आकर्षक-शक्तिके द्वारा जब इस प्रकार रूपकी भावना होती है, उसी समय उसके पीछे नाम और सख्या आदि दृष्टियाँ लग जाती हैं । ब्रह्मन् ! विकल्पके रूपको धारण करनेवाला तथा देश, काल और क्रियाका आधारभूत जो चित्-शक्तिका रूप है, वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है । पुन वह भी वासनाओंकी कल्पना करता हुआ अहङ्कारका रूप धारण करता है। अहङ्कार जब निश्चयात्मक एव दोपयुक्त हो जाता है, तब वह बुद्धि कहलाता है। और बुद्धि जब सङ्कल्पका रूप ग्रहण करती है, तब मननास्पद मन बनती है । मन जब घने विकल्पमें पडता है, तब शनै-शनै इन्द्रियरूप ग्रहण करता है। हाथ-पैरयुक्त शरीरको बुद्धिमान् पुरुष इन्द्रिय कहते हैं । इस प्रकार जीव सङ्कल्प और वासनाकी रज्जुओंसे बँधकर दुःखजालमे फँसा हुआ क्रमशः अधोगतिको प्राप्त होता है । इस तरह शक्तिमय चित् घने अहङ्कारको प्राप्त होकर रेशम बनानेवाले कीड़ेके समान स्वेच्छासे बन्धनमें पडता है। अपने ही द्वारा कल्पित तन्मात्रारूपी जालके भीतर रहकर, शृङ्खलामें बँधे हुए सिंहके समान, चित् शक्ति अत्यन्त विवशताको प्राप्त हो जाती है । आत्मा ही कहीं मन, कहीं बुद्धि, कहीं ज्ञान, कहीं क्रिया, कहीं अहङ्कार और कहीं चित्तके नामसे जाना जाता है। कहीं इसे प्रकृति कहते हे, और कहीं 'माया है' ऐसी कल्पना करते ह । कहीं यह बन्धनके नामसे प्रसिद्ध है और कहीं पुर्यष्टक कहलाता है। कहीं इसे अविद्या कहते हैं और कहाँ 'इच्छा' माना जाता है । यह आशा- पाशका निर्माण करनेवाले अखिल विश्वको उसी प्रकार धारण करता है, जैसे भीतर फलविहीन वटबीज वटको धारण करता है ॥ ११४-१३३ ॥

'चिन्तारूपी अग्निशिखासे दग्ध, क्रोधरूपी अजगरके द्वारा चबाये हुए, कामरूपी समुद्रके कल्लोलमें स्थित तथा अपने पिता- मह आत्माको भूले हुए इस मनका, ब्रह्मन् ! कीचड़से फँसे हाथीके समान उद्धार करो । प्रपञ्चकी भावनासे व्याप्त इस प्रकारके जीवाश्रित भाव ब्रह्मके द्वारा लाखों, करोड़ों तथा असख्य रूपोंमें कल्पित होकर पहले उत्पन्न हो चुके हैं, और आज भी चारों ओर उत्पन्न हो रहे हैं, तथा निर्झरसे उत्पन्न जलकणोंके समान और भी उत्पन्न होते रहेंगे । कुछ तो प्रथम ही उत्पन्न हो रहे हैं और कुछ भाव सौसे अधिक बार उत्पन्न हो चुके हैं, कोई असख्य जन्म ग्रहण कर चुके हैं और किन्हींके दो ही तीन जन्म हुए हैं। कोई किन्नर, गन्धर्व, विद्याधर एव नागरूपमें प्रकट हे, कोई सूर्य, चन्द्र, वरुण, शिव, हरि एव ब्रह्मारूप बन रहे हैं। कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्ररूपमे स्थित हैं। कोई तृण, ओषधि, वृक्ष, फल, मूल एवं पत्रके रूपमे हैं। कोई कदम्ब, नीबू, आम, ताड़ तथा तमाल वृक्ष बन रहे हैं । कोई महेन्द्र, मलय, सह्य, मन्दर, मेरु आदि पर्वतोंका आकार धारण किये हुए हैं। कोई खारे समुद्र, तथा कोई दूध, घृत, ईखके रस तथा जलकी राशिके रूपमें अवस्थित हैं। कोई विशाल दिशाओंका -रूप धारण किये हुए हैं। कोई महान् वेगशाली नदियोंके रूपमें है। कोई हाथसे फेंके जानेवाले गेंदके समान मृत्युके द्वारा बारवार ताडित होकर आकाशमें ऊपर उठते और नीचे गिरते रहते हैं। कोई-कोई मूर्ख मनुष्य विवेकको प्राप्त करके भी सहस्रों जन्म भोगकर पुन संसाररूपी सङ्कटमें पड़ते हैं। दिशा और कालके द्वारा अनवच्छिन्न आत्मतत्त्व अपनी शक्तिसे सहज ही दिशा और कालके द्वारा आकलित जो शरीर ग्रहण करता है, वही जीवके पर्यायभूत वासनाके आवेगसे सङ्कल्पोन्मुख चञ्चल मनका रूप धारण करता है । वह सङ्कल्पात्मिका मन-शक्ति क्षणमात्रमे निर्मल आकाशकी भावना करती है, उसमे शब्दबीज अङ्कुरोन्मुख रहता है । तत्पश्चात् वही मन और भी घनीभूत होनेपर घने स्पन्दनके क्रमसे वायुके स्पन्दनकी भावना करता है। उसमें स्पर्श-बीज अङ्कुरोन्मुख रहता है । उसके बाद दृढ अभ्यासके द्वारा शब्द और स्पर्श्वरूप आकाश और वायुके सङ्घर्षसे अग्नि उत्पन्न होती है । वह रूप- तन्मात्राके साथ मिलकर तीन गुणोंसे युक्त होती है । उन तीनों गुणोंके साथ सयुक्त हुआ मन रस-तन्मात्राका अनुभव करता हुआ क्षणमात्रमें जलकी शीतलताका चिन्तन करता है। इससे उसे जलका अनुभव होता है । पश्चात् उन चार गुणोंसे युक्त होकर मन दूसरे ही क्षण गन्ध तन्मात्राकी भावना करता है, इससे उसे पृथ्वीका अनुभव होता है। इस प्रकार पाँचों तन्मात्राओंसे घिरकर सूक्ष्मताका त्याग करता हुआ वह आकाशमें अभ्रकणोंके आकारमें स्फुरित शरीरको देखता है।