कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 784, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७२८ * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् [ अध्याय ७
[बायाँ स्तम्भ]
महायन्त्रमय परम वैकुण्ठका यह नारायणयन्त्र विजयी होता है ॥ २१–२९ ॥
‘उसका स्वरूप कैसा है १' शिष्यके इस प्रकार पूछनेपर गुरु 'वह ऐसा है' कहकर (यन्त्रका स्वरूप) बतलाते हैं— “पहले षट्कोण चक्र बनाना चाहिये। उसके मध्यमे छः दलोका कमल अङ्कित करे। उस कमलकी कर्णिकापर प्रणव (ॐ) लिखे। प्रणवके बीचमे नारायणका बीज मन्त्र (अ) लिखे। वह बीज मन्त्र साध्यगर्भित होना चाहिये। अर्थात् उसके साथ जिस उद्देश्यसे यन्त्र पूजा करनी हो, उसका सूचक 'मम सर्वाभीष्टसिद्धिं कुरु कुरु स्वाहा' यह वाक्य लिखना चाहिये। कमलके दलोंपर विष्णु एव नृसिंहके षडक्षर मन्त्रोको लिखना चाहिये। * विष्णु षडक्षर मन्त्र 'ॐ विष्णवे नम' और नृसिंह षडक्षर मन्त्र 'ऐं ह्रीं श्रीं ह्रीं क्ष्रौं फट्' है। दल-कपोलोंमें (दो दलोंके मध्यमे) श्रीराम तथा श्रीकृष्णके षडक्षर मन्त्रोको लिखे। राम-षडक्षर मन्त्र 'रा रामाय नम' और कृष्ण षडक्षर मन्त्र 'क्लीं कृष्णाय नम.' है। षट्कोण चक्रके छः कोणोमे 'सहस्रार हुं फट्' यह सुदर्शन षडक्षर मन्त्र लिखे। छहों कोण कपोलोंमें (दो कोनोंके मध्य अर्थात् रेखाओके सामने बाहर) 'ॐ नम. शिवाय' यह प्रणव युक्त शिव-पञ्चाक्षर मन्त्र लिखे ॥ ३० ॥
“उस (षट्कोण चक्र) के बाहर प्रणवको इस प्रकार मालाकी भाँति लिखे कि वृत्त बन जाय। वृत्तके बाहर अष्टदल कमल बनाये। उसके दलोंपर 'ॐ नमो नारायणाय' यह नारायण-अष्टाक्षर मन्त्र और 'जय जय नरसिंह' यह नृसिंह अष्टाक्षर मन्त्र लिखे। दलोंके बीचके स्थानोंपर राम, कृष्ण तथा श्रीकरके
१ 'मम' यह पद अथवा साधकका षष्ठयन्त नाम बीज-मन्त्रके ऊपर होगा 'सर्वाभीष्टसिद्धिम्' यह पद बीज-मन्त्रके नीचे होगा। बीजके वामपार्श्वमें 'कुरु कुरु' लिखा जायगा और दक्षिण पार्श्वमें 'स्वाहा' रहेगा।
* इस प्रकार जहाँ भी मन्त्र लिखनेका वर्णन आता है, वहाँ मन्त्रका एक-एक अक्षर एक-एक दलपर, दलोंके मध्यमें या कोणपर—जहाँ लिखे हैं—क्रमश लिखने चाहिये। एक मन्त्रको लिखकर उसके अक्षरोके नीचे दूसरे मन्त्रके अक्षरोंको उसी प्रकार लिखना चाहिये। इस प्रकार जितने मन्त्र लिखने हों, उनके अक्षरोंको क्रमश एकके नीचे एक लिखता जाय। सयुक्ताक्षरोंको एक ही अक्षर मानकर लिखे।
[दायाँ स्तम्भ]
अष्टाक्षर मन्त्र लिखे। मन्त्र क्रमशः ये हैं—'ॐ रामाय हु फट् स्वाहा' 'क्लीं दामोदराय नम.' 'उत्तिष्ठ श्रीकर स्वाहा' ॥ ३१ ॥
“उस (अष्टदल कमल) के बाहर प्रणवके मालाकी तरह लिखते हुए वृत्ताकार बना दे। वृत्तके बाहर नौ दलोंका कमल बनाये। कमलके दलोंगे (क्रमशः) राम, कृष्ण एव हयग्रीवके नवाक्षर मन्त्र लिखे। मन्त्र क्रमशः ये हे—'ॐ रामचन्द्राय नम. ॐ', 'क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय ह्रीं', 'हम्भो हयग्रीवाय नम हम्भोँ।' दलोंके मध्यमें 'ॐ दक्षिणा-मूर्तितीरेश्वरोम्' यह दक्षिणामूर्ति नवाक्षर मन्त्र लिखे ॥३२॥
"उसके बाहर नारायण बीज (अं) से युक्त (अर्थात् अ अं लिखते हुए) वृत्त बनाये। वृत्तसे बाहर दस दलोंका कमल बनाये। उन दलोंपर राम तथा कृष्णके दशाक्षर मन्त्र लिखे। वे मन्त्र ये ह—'हु जानकीवल्लभाय स्वाहा' 'गोपीजन-वल्लभाय स्वाहा'। दलोंके संधिस्थानोंमें 'ॐ नमो भगवते श्रीमहानृसिंहाय कालदंष्ट्रवदनाय मम विघ्नान् पच पच स्वाहा' यह नृसिंह-माला-मन्त्र लिखे ॥३३॥
“दशदल कमलके बाहर नृसिंहके एकाक्षर मन्त्र 'क्ष्रौं'के द्वारा वृत्त बनाये। वृत्तके बाहर बारह दलोंका कमल बनाये। दलोंपर नारायण तथा वासुदेवके द्वादशाक्षर मन्त्र लिखे। मन्त्र क्रमश. ये हैं—'ॐ नमो भगवते नारायणाय', 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।' दलोंके कपोलोमे (क्रमशः) महाविष्णु, श्रीराम तथा श्रीकृष्णके द्वादशाक्षर मन्त्र लिखे। मन्त्र इस प्रकार हे—'ॐ नमो भगवते महाविष्णवे', 'ॐ ह्रीं भरताग्रज राम ह्रीं स्वाहा', 'श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय नम' ॥३४॥
“उसके बाहर जगन्मोहन बीज-मन्त्र 'क्लीं' से वृत्त बनाये। वृत्तसे बाहर चौदह दलोंका कमल बनाये। उन दलोंपर (क्रमशः) लक्ष्मीनारायण, हयग्रीव, गोपाल तथा दधिवामनके मन्त्रोको लिखे। मन्त्र ये हैं—'ॐ ह्रीं ह्रूं श्रीं श्रीं लक्ष्मीवासुदेवाय नम', 'ॐ नम सर्वकोटिसर्वविद्या-राजाय', 'क्लीं कृष्णाय गोपालचूडामणये स्वाहा', 'ॐ नमो भगवते दधिवामनाय ॐ।' दो दलोंके सन्धि-स्थानोंपर 'ह्रीं पद्मावत्यन्नपूर्णा माहेश्वरि स्वाहा' यह अन्नपूर्णेश्वरी-मन्त्र लिखे ॥३५॥
'उसके बाहर केवल प्रणवसे एक वृत्त बनाये। वृत्तसे बाहर सोलह दलोंका कमल बनाये। उसके दलोंपर श्रीकृष्ण तथा सुदर्शनके षोडशाक्षर मन्त्रोंको लिखे। मन्त्र क्रमशः इस प्रकार हे—'ॐ नमो भगवते रुक्मिणीवल्लभाय स्वाहा', 'ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय हु फट्।' उसके दलोंके सन्धि भागोंमें