कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 785, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७२९
[ बायाँ स्तम्भ ]
सब स्वर तथा सुदर्शन माला मन्त्र लिखे । पूरा मन्त्र यह है—'सुदर्शनमहाचक्राय दीप्तरूपाय सर्वतो मां रक्ष रक्ष सहस्रार हु फट् स्वाहा ।' ( पहले एक एक स्वर लिखा जायगा, फिर स्वरोंके नीचे क्रमशः प्रत्येक दलपर मन्त्रके दो-दो अक्षर जैसे प्रथम दलपर 'सुद' दूसरेपर 'र्शन' इस प्रकार लिखे जायेंगे ) ॥३६॥
"उसके बाहर वराह-बीजसे युक्त वृत्त रहेगा। वह बीज 'हुं' है। वृत्तसे बाहर अठारह दलोंका कमल बनाये । उन दलोंपर श्रीकृष्ण तथा वामनके अष्टादशाक्षर मन्त्र लिखे । मन्त्र क्रमशः इस प्रकार हैं—'हीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा', 'ॐ नमो विष्णवे सुरपतये महाबलाय स्वाहा ।' दलके सन्धि-स्थानोंपर गरुड-पञ्चाक्षर मन्त्र और गरुड-माला मन्त्र लिखे । मन्त्र क्रमशः ये हैं—'क्षिप ॐ स्वाहा', 'ॐ नम पक्षिराजाय सर्वविषभूतरक्षःकृत्यादिभेदनाय सर्वैश्वर्यप्रदाय स्वाहा।' ( इसमें पहले दलपर 'क्षिप', दूसरेपर 'ॐ', तीसरेपर 'स्वाहा', चौथेपर 'ॐ नम', पाँचवेंपर 'पक्षि', छठेपर 'राजाय' और शेषपर शेष मन्त्रभागके दो दो अक्षर लिखे जायेंगे ) ॥३७॥
"उसके बाहर 'ह्रीं' इस माया-बीजसे वृत्त बनाये । उसके बाहर फिर अष्टदल कमल बनाये। उन दलोंपर श्रीकृष्ण तथा वामनके अष्टाक्षर मन्त्र 'ॐ नमो दामोदराय' और 'ॐ वामनाय नम ॐ' इनको ( क्रमशः ) लिखे । दलोके सन्धि-स्थलोंपर नीलकण्ठके त्र्यक्षर तथा गरुडके पञ्चाक्षर मन्त्रोंको (पहले तीन दलोंपर पहलेका एक एक अक्षर, फिर शेषपर दूसरेका एक-एक अक्षर—इस प्रकार ) लिखे । मन्त्र ये हैं—'प्रैं रीं ठ, नमोऽण्डजाय' ॥ ३८ ॥
"उसके बाहर कामदेवके बीज मन्त्र ( क्लीं ) से वृत्त बनाये । वृत्तसे बाहर चौबीस दलोंका कमल निर्मित करे । उन दलोंपर शरणागत मन्त्र एव नारायण मन्त्र ( पहले एक एक अक्षरके क्रमसे शरणागत मन्त्र और शेष दलोपर नारायण मन्त्रके अक्षर ) तथा नारायण एव हयग्रीवके गायत्री-मन्त्र (क्रमशः ) लिखे । मन्त्र इस प्रकार है—'श्रीमन्नारायणचरणौ शरणं प्रपद्ये', 'श्रीमते नारायणाय नम', 'नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात्' 'वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हंस प्रचोदयात् ।' उसके दलोंके सन्धि भागोंमें नृसिंह-गायत्री, सुदर्शन-गायत्री तथा ब्रह्मगायत्री-मन्त्र (क्रमशः) लिखे । मन्त्र ये हैं—'वज्रनखाय विद्महे तीक्ष्णदंष्ट्राय धीमहि तन्न सिंह प्रचोदयात्', 'सुदर्शनाय विद्महे हेतिराजाय धीमहि तन्नश्चक्र प्रचोदयात्' 'तत्सवितुर्वरेण्य भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्' ॥३९॥
उ० अं० ९२—
[ दायाँ स्तम्भ ]
"उसके बाहर 'ह्सौं' इस हयग्रीवके एकाक्षर बीज मन्त्रसे वृत्त बनाये । उसके बाहर बत्तीस दलोंका कमल बनाये । उसके दलोंपर ( क्रमशः ) नृसिंह एव हयग्रीवके अनुष्टुप् मन्त्रोको लिखे । मन्त्र ये हैं—
उग्रं वीरं महाविष्णु ज्वलन्त सर्वतोमुखम् । नृसिह भीषण भद्र मृत्युमृत्युं नमाम्यहम् ॥ ऋग्यजुःसामरूपाय वेदाहरणकर्मणे । प्रणवोद्गीथवपुषे महाश्वशिरसे नमः ॥
"दलोंके सन्धि-भागोंमे ( क्रमशः ) राम तथा कृष्णके अनुष्टुप्-मन्त्र लिखें—
रामभद्र महेष्वास रघुवीर नृपोत्तम । भो दशास्यान्तकास्माक रक्षा देहि श्रिय च ते ॥ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते । देहि मे तनय कृष्ण त्वामहं शरणं गत ॥
"उसके बाहर प्रणवसे सम्पुटित अग्निवीज (ॐ रमोम्) से वृत्त बनाये । वृत्तमे बाहर छत्तीस दलोंका कमल बनाये । उसके दलोपर हयग्रीवका छत्तीस अक्षरोंवाला और फिर ( उसके नीचे ) अड़तीस अक्षरोंवाला मन्त्र लिखे । मन्त्र क्रमशः यों ह—
'हस' विश्रोत्तीर्णस्वरूपाय चिन्मयानन्दरूपिणे । तुभ्यं नमो हयग्रीव विद्याराजाय विष्णवे 'सोऽहम्' ॥ 'ह्सौं ॐ नमो भगवते हयग्रीवाय सर्ववागीश्वरेश्वराय सर्ववेदमयाय सर्वविद्यां मे देहि स्वाहा ।'
" ( इस मन्त्रमें ३८ अक्षर होनेमे पहलेके दो 'ह्सौमोम्' प्रथम दलपर तथा 'नमो' दूसरे दलपर और शेषपर एक-एक अक्षर लिखे जायेंगे । ) दलोंके सन्धि-स्थलोंमें आदिमे 'ॐ' तथा अन्तमे 'नम' लगाकर केशवादिके चतुर्थी विभक्ति-युक्त चौबीस नाममन्त्र (प्रत्येक दलपर पूरा एक मन्त्र) तथा शेष बारह दलोंपर राम-कृष्णके दोनों गायत्री-मन्त्रोंके चार-चार अक्षर एक-एक स्थलपर ( पहली गायत्रीके चार-चार अक्षरके बाद दूसरीके चार-चार अक्षर क्रमसे ) लिखे । मन्त्र ये हैं—
ॐ केशवाय नम, ॐ नारायणाय नम, ॐ माधवाय नमः, ॐ गोविन्दाय नम, ॐ विष्णवे नम, ॐ मधुसूदनाय नम, ॐ त्रिविक्रमाय नम', ॐ वामनाय नम', ॐ श्रीधराय नम, ॐ हृषीकेशाय नम, ॐ पद्मनाभाय नम, ॐ दामोदराय नम, ॐ संकर्षणाय नम, ॐ वासुदेवाय नम', ॐ प्रद्युम्नाय नम, ॐ अनिरुद्धाय नम, ॐ पुरुषोत्तमाय