भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

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पृष्ठ 786

७२० -- त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् -- [ अध्याय ७ नम', ॐ अधोक्षजाय नम ॐ नारसिंहाय नम, ॐ अच्युताय नम ॐ जनार्दनाय नम, ॐ उपेन्द्राय नम., ॐ हरये नम, ॐ श्रीकृष्णार नम ।' (श्रीरामगायत्री--) दाशरणाय विद्महे सीतावह्लभाय धीमहि तन्नो रामः प्रचोदयात् । (श्रीकृष्णगायत्री--) दामोदराय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्न कृष्ण. प्रचोदयात्। "उसके बाहर प्रणवते सम्पुटित अङ्कुश-व्रीज 'ॐ क्रों ॐ' मन्त्रसे वृत्त बनाये। उस वृत्तसे बाहर (कुछ अन्तर छोड़कर उसी मन्त्रसे) फिर वृत्त बनाये । दोनों वृत्तोंके मध्यमें बारह कोष्ठ (वृत्त) बनाये, जिनके मध्यमें अन्तर हो। उन कोष्ठो (वृत्तो) मे आदिमे प्रणव तथा अन्तमे 'नम' लगाकर चतुर्थी विभक्तियुक्त कौस्तुभ, वनमाल, श्रीवत्स, सुदर्शन गरुड, पद्म, ध्वज, अनन्त, शार्ङ्ग, गदा, शङ्ख एवं नन्दकके मन्त्र लिखे। मन्त्र इसे प्रकार होंगे- ॐ कौस्तुभाय नम, ॐ वनमालायै नम, ॐ श्रीवत्साय नम, ॐ सुदर्शनाय नमः, ॐ गरुडाय नम', ॐ पद्माय नम, ॐ ध्वजाय नम, ॐ अनन्ताय नम', ॐ शार्ङ्गाय नम, ॐ गदायै नम, ॐ शङ्खाय नम, ॐ नन्दकाय नमः। "कोष्ठोंके अन्तरानोंमें आदिमे प्रणवयुक्त ये मन्त्र लिखे- ॐ विष्वक्सेनाय नम, ॐ आचक्राय स्वाहा, ॐ विचक्राय स्वाहा, ॐ सुचक्राय स्वाहा, ॐ धीचक्राय स्वाहा, ॐ सचक्राय स्वाहा, ॐ ज्वालाचक्राय स्वाहा, ॐ क्रुद्धोल्काय स्वाहा, ॐ महोल्काय स्वाहा, ॐ वीर्योल्काय स्वाहा, ॐ विद्योल्काय स्वाहा, ॐ सहस्रोल्काय स्वाहा ॥ ४०-४२ ॥ "उसके बाहर प्रणवसे सम्पुटित गरुडपञ्चाक्षर 'ॐ क्षिप ॐ स्वाहा ॐ' मन्त्रसे वृत्त बनाये। दोनों वृत्तोंके मध्य भागमे अन्तर छोड़कर बारह वज्र बनाये । उन वज्रोंके कोणोंमें ये मन्त्र लिखे- ॐ पद्मनिधये नम, ॐ महापद्मनिधये नम, ॐ गह्व- निधये नम, ॐ शङ्खनिधये नम, ॐ मकरनिधये नम', ॐ कच्छपनिधये नम, ॐ विद्यानिधये नम., ॐ परमानन्द- निधये नम, ॐ मोक्षनिधये नम, ॐ लक्ष्मीनियये नम', ॐ ब्रह्मनिधये नम, ॐ मुकुन्दनिधये नम । "उन वज्रोंके बीचके भागोंमे ये मन्त्र लिखे- ॐ विद्याकल्पकतरवे नम, ॐ आनन्दकल्पकतरवे नम., ॐ ब्रह्मकल्पकतरवे नम., ॐ मुक्तिकल्पकतरवे नम', ॐ अमृतकल्पकतरवे नम, ॐ बोधकल्पकतरवे नम, ॐ विभूति- कल्पकतरवे नम. ॐ वैकुण्ठकल्पकतरवे नम, ॐ वेदकल्पक- तरवे नम., ॐ योगल्पस्तरवे नन, ॐ यज्ञकल्पकतरवे नम', ॐ पद्मकल्पकतरवे नम । "इस वृत्तको शिवगायत्री तथा परब्रह्म-मन्त्रके अक्षरोंद्वारा वृत्तरूपसे घेरे । (अर्थात् वृत्तके बाहर पहले शिवगायत्री इस प्रकार लिखे कि वृत्तके चारो ओर गोलाईमें आधी दूरके लगभग वह लिखी जाय और आगे 'परब्रह्म' मन्त्र लिखकर उस गोलेको पूरा कर दे ।) मन्त्र ये हैं- (शिव-गायत्री-) तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात्। (परब्रह्ममन्त्र-) श्रीमन्नारायणो ज्योतिरात्मा नारायण. परः । नारायणपर ब्रह्म नारायण नमोऽस्तु ते ॥ "उसके बाहर प्रणवसे सम्पुटित श्रीबीज अर्थात् 'ॐ श्रीमोम्' मन्त्रसे वृत्त बनाये। वृत्तके बाहर चालीस दलोंका कमल बनाये। उसके दलोपर व्याहृति एवं शिरोभागसे सम्पुटित वेद-गायत्रीके चारों पाद तथा सूर्याष्टाक्षर मन्त्र लिखे । मन्त्र इस प्रकार होगे- 'ॐ भू ॐ भुवः ॐ सुव. ॐ महः ॐ जन. ॐ तप. ॐ सत्यम् ॐ तत्सवितुर्वरेण्यम् ॐ भर्गो देवस्य धीमहि ॐ धियो यो न प्रचोदयात् । ॐ परो रजसे सावद्रोम् ओ- मापो ज्योतो रसोऽमृतं ब्रह्म भूर्भुव सुवरोम् ।' 'ॐ घृणि. सूर्य आदित्य ।', "दलोंके सन्धि-स्थलोंपर सब कहीं प्रणव और श्रीबीजसे सम्पुटित नारायण-बीज अर्थात् 'ॐ श्रींमं श्रीमोम्' यह मन्त्र लिखे ॥ ४३-४४ ॥ "उसके बाहर आठ शूलोंसे अङ्कित भू-चक्र बनाये । चक्रके भीतर चारों दिशाओंमे प्रणवसे सम्पुटित 'हंस' सोऽहम्' मन्त्र और नारायणाष्ट्र मन्त्र लिखे । पूरा मन्त्र यह है- 'ॐ हंस सोऽहमोम्' 'ॐ नमो नारायणाय हु फट्' ॥ ४५ ॥ "उसके बाहर प्रणव-मालासे युक्त वृत्त बनाये । वृत्तके बाहर पचास दलोंका कमल बनाये । उन दलोंमें 'ळ' को छोड़कर मातृकाके सभी शेष पचास अक्षर (अर्थात् अ आ इ ई उ ऊ