कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 787, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७३१
[बायाँ स्तम्भ]
ॠ ॡ लृ ट् ए ऐ ओ औ अं अ क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त् थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह क्ष) लिखे । उसके दलोंकी सन्धियोंमे प्रणव तथा श्रीबीजसे सम्पुटित राम एव कृष्णके माला-मन्त्र (क्रमश ऊपर-नीचे) लिखे । मन्त्र इस प्रकार होंगे— (राममाला मन्त्र—) ‘ॐ श्रींमों नमो भगवते रघुनन्दनाय रक्षोघ्नविशदाय मधुरप्रसन्नवदनायामिततेजमे बलाय रामाय विष्णवे नम श्रीमोम्’ । (श्रीकृष्णमाला मन्त्र—) ‘ॐ श्रींमों नमः कृष्णाय देवकीपुत्राय वासुदेवाय निगलच्छेदनाय सर्वलोकाधिपतये सर्वजगन्मोहनाय विष्णवे कामितार्थदाय स्वाहा श्रीमोम्’ ॥ ४६ ॥ “उसके बाहर अष्टशूलोंमे अङ्कित एक भूचक्र और बनाये । उन शूलोंमे प्रणवसम्पुटित महानीलकण्ठ-मन्त्रके अक्षर अर्थात् ‘ॐ ॐ नमो नीलकण्ठाय ॐ’ लिखे । शूलोंके अग्रभागमें आदिमें प्रणव तथा अन्तमें नम लगाकर चतुर्थी विभक्तियुक्त लोकपालोंके मन्त्र इस प्रकार क्रमशः लिखे— ओमिन्द्राय नमः, ओमग्नये नमः, ॐ यमाय नम, ॐ निर्ऋतये नम, ॐ वरुणाय नमः, ॐ वायवे नम, ॐ सोमाय नम, ओमीशानाय नम ॥ ४७ ॥ “उसके बाहर प्रणव (ॐ) की मालासे युक्त तीन वृत्त बनाये। उसके बाहर चार द्वारोंसे युक्त चार भूपुर बनाये, जिसमें चक्रके चारों कोनोंपर महावज्र शोभित हों। उन वज्रोंमें प्रणव तथा श्रीबीजसे सम्पुटित दो अमृत-बीज—‘ॐ श्रीं वं वं श्रीं ॐ’ लिखे । प्रणव-वृत्तोंके बाहर सबसे बाहरी भूपुर-वीथीमें ये मन्त्र लिखे— ‘ओमाधारशक्त्यै नमः, ॐ मूलप्रकृत्यै नमः, ओमादिकूर्माय नम, ओमनन्ताय नमः, ॐ पृथिव्यै नम ।’ मध्यभूपुर-मार्गमे ये मन्त्र लिखे—ॐ क्षीरसमुद्राय नमः, ॐ रत्नद्वीपाय नम, ॐ रत्नमण्डपाय नम, ॐ श्वेतच्छत्राय नम, ॐ कल्पकवृक्षाय नम, ॐ रत्नसिंहासनाय नम ।’ प्रथम भूपुर-वीथीमें आदिमे प्रणव तथा अन्तमे नमः लगाकर चतुर्थी विभक्तियुक्त धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य, सत्त्व, रजस्, तमस्, माया, अविद्या, अनन्त एव पद्मके मन्त्र लिखे । (इन मन्त्रोंके ये रूप होंगे—ॐ धर्माय नम, ॐ ज्ञानाय नम, ॐ वैराग्याय नमः, ओमैश्वर्याय नम, ओमधर्माय नम, ओमज्ञानाय नमः, ओमवैराग्याय नम, ओमनैश्वर्याय नम, ॐ सत्त्वाय नमः,
[दायाँ स्तम्भ]
ॐ रजसे नम, ॐ तमसे नमः, ॐ मायायै नम, ओमाविद्यायै नमः, ओमनन्ताय नमः, ॐ पद्माय नमः ।) बाहरी वृत्तकी वीथीमें—विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना—इन सबके चतुर्थ्यन्त नाम आदिमें प्रणव और अन्तमे ‘नमः’ लगाकर लिखे (ॐ विमलायै नम, ओमुत्कर्षिण्यै नम, ॐ ज्ञानायै नमः, ॐ क्रियायै नम, ॐ योगायै नम, ॐ प्रह्व्यै नमः, ॐ सत्यायै नम, ओमीशानायै नम) । भीतरी वृत्तकी वीथी- में ‘ओमनुग्रहायै नमः, ॐ नमो भगवते विष्णवे सर्व- भूतात्मने वासुदेवाय सर्वात्मसंयोगयोगपीठात्मने नम’ लिखे । ‘वृत्तोंके बीचके स्थानोंमें—मन्त्रोंके बीज, प्राण, शक्ति, दृष्टि, वश्य आदि, मन्त्र-यन्त्रोंके नाम, गायत्री, प्राणप्रतिष्ठा, भूतशुद्धि तथा दिक्पालोंके बीज—ये यन्त्रके दस अङ्ग ( तथा इनके अतिरिक्त ) मूलमन्त्र, मालामन्त्र, कवच तथा दिग्वन्धन- के मन्त्र भी दिये जाते हैं। ‘इस प्रकारका यह यन्त्र महायन्त्रमय है । योगके द्वारा जिनका अन्तःकरण ज्ञानसे आलोकित हो उठा है, ऐसे पुरुषों- द्वारा इसे परम मन्त्रोंसे अलङ्कृत किया गया है । षोडशो- पचारोंसे पूजे जानेपर तथा जप-हवनादिसे साधित (सिद्ध) होनेपर यह यन्त्र शुद्ध ब्रह्मतेजोमय, सब प्रकारके भयोंसे छुड़ानेवाला, समस्त पापोंका नाशक, सभी अभीष्टोंको देनेवाला तथा सायुज्य मुक्ति देनेवाला है। यह परमवैकुण्ठ-महानारायण- यन्त्र प्रकाशमान है ॥ ४८-४९ ॥ ‘उस (यन्त्र) के ऊपर भी आदिनारायणका ध्यान करे । वे निरतिशय आनन्दमयी तेजोरशिके भीतर भलीभाँति विराजमान हैं । शब्दातीत आनन्दमय तेजोरराशिस्वरूप, चैतन्य (ज्ञान) के धारसे आविर्भूत आनन्दमय विग्रहयुक्त, बोधानन्दस्वरूप, निरतिशय सौन्दर्यसिन्धु, तुरीयस्वरूप, तुरीयातीत तथा अद्वैत परमानन्दमय हैं । निरन्तर तुरीयातीत निरतिशय सौन्दर्य एवं आनन्दके पारावार हैं, लावण्य-सरिताकी लहरोंसे उल्लसित तथा विद्युत्की-सी कान्तिसे प्रकाशित हैं, उनका विग्रह दिव्य एव मङ्गलमय है । वे मूर्तिधारी परम मङ्गलोंसे सेवित हैं। चिदानन्दमय अनन्तकोटि सूर्योंके समान तेजोमय प्रकाशवाले अनन्त भूपणोंसे अलङ्कृत हैं। सुदर्शन, चक्र, पाञ्चजन्य शङ्ख, पद्म, कौमोदकी गदा, नन्दक खड्ग, शाङ्ग-धनुप, मुसल, परिघ आदि चिन्मय अनेकों मूर्तिमान् आयुधोंसे सुसेवितं हैं। श्रीवत्स, कौस्तुभ एव वनमालासे उनका वक्षःस्थल अङ्कित (शोभित) है। ब्रह्मरूप कल्पवनके अमृतमय पुष्पोंकी वर्षासे निरन्तर आनन्दस्वरूप हैं। ब्रह्मानन्दमय