कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 788, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७३२ * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [अध्याय ८
रसके असंख्य झरनोंसे अत्यन्त मङ्गल रूप हैं। शेषनागके दम सहस्र फणसमूहोंके विशाल छत्रसे शोभित हैं। उस फणोंके मण्डलमें स्थित अत्यन्त तेजस्वी मणियोंकी ज्योतिसे उनका श्रीविग्रह विशेष देदीप्यमान है, तथा शेषनागकी अङ्ग-कान्तिके निर्झरोंसे व्याप्त है। वे निरतिशय ब्रह्मगन्धस्वरूपकी निरतिशय आनन्दरूप ब्रह्ममय गन्धके विशेष (घन) स्वरूप हैं। अनन्त ब्रह्मगन्ध-मूर्तियोंके समष्टिरूप हैं। अनन्त आनन्दमय तुलसीकी मालाओंसे नित्य नूतनरूप हैं। चिदानन्दमय अनन्त पुष्प- मालाओंसे सुशोभित हैं। तेज-प्रवाहकी तरङ्गोंके अविरल प्रवाहसे प्रकाशमान हैं। निरतिशय अनन्त कान्तिविशेषके आवर्तोंसे सर्वदा सब ओर प्रज्वलित हैं। बोधानन्दमय अनन्त धूप दीपावलियोंसे अत्यन्त शोभित हैं। निरतिशय आनन्द- स्वरूप चँवरोंसे परिसेवित हैं। निरन्तर निरुपम निरतिशय उत्कट ज्ञानानन्दमय अनन्त फलोंके गुच्छोंसे अलङ्कृत हैं। चिन्मयानन्दरूप दिव्य विमान, छत्र एव ध्वजसमूहोंसे विशेष शोभित है। परम मङ्गलमय अनन्त दिव्य तेजोंसे सर्वदा प्रकाशमान हैं। वाणीसे अतीत अनन्त तेजोराशिके अन्तर्गत, अर्धमात्रास्वरूप, तुरीय, अनाहत ध्वनिरूप, तुरीयातीत, अकथनीय तथा नाद-बिन्दु-कला एव अध्यात्मस्वरूप आदि अनन्त रूपोंमें अवस्थित, निर्गुण, निष्क्रिय, निर्मल, निर्दोष, निरञ्जन, निराकार, दूसरेके आश्रयसे हीन, निरतिशय अद्वैत परमानन्दस्वरूप (उन) आदिनारायणका ध्यान करे' ॥५०॥
॥ सप्तम अध्याय समाप्त ॥ ७ ॥ अष्टम अध्याय परम सायुज्य-मुक्तिके स्वरूपका निरूपण
तब पितामह् ब्रह्माजी भगवान् महाविष्णुसे पूछते हैं— भगवन् ! शुद्ध अद्वैत परमानन्दस्वरूप आप ब्रह्मके (स्वरूपके) विरुद्ध (ये पूर्ववर्णित) वैकुण्ठ, भवन, प्राचीरें, विमान प्रभृति अनन्त वस्तुरूप भेद कैसे हैं ? ॥ १ ॥ 'तुमने ठीक ही कहा' यह कहकर भगवान् महाविष्णु शङ्का- का निवारण करते हैं—'जैसे शुद्ध स्वर्णके कड़े, मुकुट, बाजूबन्द आदि भेद होते हैं (जैसे ये आकार-भेद स्वर्णकी एकताके बाधक नहीं), जैसे समुद्रीय जलके बड़ी छोटी तरङ्गें, फेन, बुलबुले, ओले, नमक, बर्फ आदि अनन्त वस्तुरूप भेद हैं (जैसे ये भेद जलके एकत्वमें बाधक नहीं), जैसे भूमिके पर्वत, वृक्ष, तिनके, झाड़ियाँ, लता आदि अनन्त वस्तुभेद हैं (जैसे ये भेद भूमिके एकत्वके विरोधी नहीं), वैसे ही अद्वैत परमानन्द- स्वरूप मुझ परम ब्रह्मका सब कुछ अद्वैतरूप सिद्ध ही है। सब (प्रतीयमान लौकिक पारलौकिक भेद) मेरे स्वरूप ही हैं। मेरे अतिरिक्त एक अणु भी विद्यमान नहीं। (मुझसे भिन्न तुच्छतम भी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है)' ॥ २ ॥ पितामह ब्रह्मा फिर पूछते हैं—'भगवन् ! परम वैकुण्ठ ही परम मोक्ष (धाम) है। सर्वत्र (सभी शास्त्रोंमें) परम मोक्ष एक ही सुनायी पड़ता (वर्णित) है। फिर अनन्त वैकुण्ठ तथा अनन्त आनन्द-समुद्रादि अनन्त मूर्तियाँ किस प्रकार हैं?' ॥ ३ ॥ 'यह ठीक ही है' कहकर भगवान् महाविष्णु बोले—'एक ही अविद्यापादमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड अपने आवरणोंके साथ सुने जाते (शास्त्रोंमे प्रतिपादित) हैं। (जैसे अनन्त ब्रह्माण्ड- भेद होनेसे अविद्याकी एकतामें बाधा नहीं आती, वैसे ही) एक ही अण्ड (ब्रह्माण्ड) में बहुत से लोक, बहुत से वैकुण्ठ और अनन्त विभूतियाँ भी हैं ही। सभी ब्रह्माण्डोंमें अनन्त लोक हैं और अनन्त वैकुण्ठ हैं, यह सभी (शास्त्रों)को निश्चित रूपसे मान्य है। (जब एक अविद्यापादकी यह स्थिति है तो) पादत्रयके सम्बन्धमें भी यही बात है, उसमें कहना क्या है। निरतिशय आनन्दका आविर्भाव मोक्ष है, यह मोक्षका लक्षण तीनों पादोंमें है, इसलिये तीनों पाद परम मोक्षधाम हैं। तीनों पाद परम वैकुण्ठ हैं। तीनों पाद परम कैवल्य (धाम) हैं। वहाँ शुद्ध चिदानन्द ब्रह्मके विलासरूप आनन्द, अनन्त परमा- नन्दमय ऐश्वर्य, अनन्त वैकुण्ठ और अनन्त परमानन्द- समुद्रादि हैं ही ॥ ४॥ "उपासक वहाँ (सातवें अध्यायमे वर्णित श्रीनारायणके समीप) पहुँचकर इस प्रकारके (जैसा स्वरूप उनका वर्णित है) नारायणका ध्यान करके, (उनकी) प्रदक्षिणा तथा (उन्हें) नमस्कार करता है, तथा अनेक प्रकारके उपचारोंसे उनकी अर्चना करके निरतिशय अद्वैत परमानन्दस्वरूप हो जाता है। उनके आगे सावधानीसे बैठकर अद्वैतयोगका आश्रय लेता है और सर्वाद्वैत परमानन्दस्वरूप अखण्ड अमित तेजोराशि- स्वरूपकी विशेष रूपसे (सम्यक्) भावना करके उपासक स्वयं शुद्ध बोधानन्दमय अमृतरूप एव निरतिशय आनन्दमय तेजोराशिस্বরূপ हो जाता है। तब महावाक्योंके अर्थका बार-बार स्मरण करता हुआ—'ब्रह्म मै हूँ, मैं ही हूँ,