भारतकोश
कल्याण: उपनिषद् अङ्क

कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

पृष्ठ 789, कुल 832 में से

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पृष्ठ 789

अध्याय ८ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ७३३ ब्रह्म मैं हूँ, जो भी मैं हूँ, ब्रह्म ही मैं हूँ, मैं ही मैं हूँ, 'वह (अनायास अविलम्ब तत्त्वज्ञान) कैसे होता है ?' मैं अहंता (भेद-प्रतीति) का हवन करता हूँ—स्वाहा (वह इस शंकाके उत्तरमें बतलाते हैं—'भक्तवत्सल भगवान् स्वयं ही भस्म हो जाय), मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकारकी भावनाद्वारा, जैसे मोक्षके सभी विघ्नोंसे सभी भक्तिनिष्ठ लोगों (भक्तों) की परम तेजोरूप महानदीका प्रवाह परम तेजोरूप समुद्रमें प्रवेश रक्षा करते हैं। (उनके) समस्त अभीष्ट प्रदान करते हैं। कर जाय, जैसे परम तेजोमय समुद्रकी तरङ्ग उस परम मोक्ष दिलवाते हैं। (भक्त स्वतः मोक्ष नहीं चाहता। भगवान् तेजोमय समुद्रमें प्रवेश कर जायँ, उसी प्रकार सच्चिदानन्द- उसे अपनी ओरसे मोक्ष प्रदान करते हैं, इसीसे दिलवाते हैं— स्वरूप उपासक सर्वरूपसे परिपूर्ण, अद्वैत परमानन्दस्वरूप वरबस देते हैं, यह कहा गया ।) विष्णु-भक्तिके बिना ब्रह्मादि परब्रह्म मुझ नारायणमें 'मैं सच्चिदानन्दस्वरूप हूँ, मैं अजन्मा समस्त (देवताओं) का भी करोड़ों कल्पोंमें भी मोक्ष हूँ, मैं परिपूर्ण हूँ' इस प्रकार (स्वरूपभूत होकर) प्रविष्ट हो नहीं होता । क्योंकि कारणके बिना कार्य प्रकट नहीं जाता है। तब उपासक तद्रूपहीन, अद्वैत, अपार, निरतिशय होता, अतः भक्ति (जो कारण है, उस) के बिना (कार्य) सच्चिदानन्द-समुद्र हो जाता है ॥ ५ ॥ ब्रह्मज्ञान कभी उत्पन्न नहीं होता। इसलिये तुम भी समस्त 'जो इस (उपदिष्ट) मार्गके द्वारा भलीभाँति आचरण उपायोंको छोड़कर भक्तिका आश्रय लो । भक्तिनिष्ठ बनो । (उपासना) करता है, वह निश्चय ही नारायण हो जाता है। भक्तिनिष्ठ बनो । भक्तिके द्वारा सभी सिद्धियाँ सिद्ध (प्राप्त) सभी मुनिगण इसी मार्गसे सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। असंख्यों होती हैं। भक्तिके द्वारा कुछ भी असाध्य नहीं है ॥ १२ ॥ परम योगी (इसी मार्गसे) सिद्धिको (परम गतिको) 'इस प्रकार गुरुके उपदेशको सुनकर, परम तत्त्वके सभी पहुँचे हैं' ॥ ६ ॥ रहस्योंको जानकर, सम्पूर्ण संशयोंको दूर करके 'शीघ्र ही तब (उपर्युक्त उपदेशके अनन्तर) शिष्य गुरुसे पूछता मोक्ष प्राप्त कर लूँगा' ऐसा निश्चय करके, तब शिष्य उठा । है—भगवन् ! सालम्ब एवं निरालम्ब योग किस प्रकारके उठकर गुरुकी प्रदक्षिणा एवं उन्हें नमस्कार करके, गुरुकी पूजा हैं ॥ ७ ॥ करके, गुरुकी ही आज्ञासे उसने क्रमशः भक्तिनिष्ठ होकर परिपक्व (गुरुदेव बतलाते हैं—) 'सालम्बयोग वह है, जिसमें भक्तिके आधिक्यसे परिपक्व विज्ञान प्राप्त किया। उस (परिपक्व सब प्रकारके कर्मोंसे दूर रहकर कर चरण आदि अङ्गोंवाली विज्ञान) से बिना परिश्रमके ही शिष्य शीघ्र ही साक्षात् मूर्तिविशेष अथवा मण्डल (ज्योति) आदिका (ध्यान- नारायणस्वरूप हो गया' ॥ १३ ॥ उपासनादिके लिये) आलम्बन किया जाय; यही सालम्ब (यह आख्यान सुनाकर) तब भगवान् महाविष्णु योग है। चतुर्मुख ब्रह्माजीकी ओर देखकर बोले—'ब्रह्माजी ! मैंने आपसे 'निरालम्बयोग वह है, जिसमें समस्त नाम, रूप, कर्मको परम तत्त्वका समस्त रहस्य कह दिया । उसके स्मरणमात्रसे अत्यन्त दूरसे छोड़कर, समस्त कामनादि अन्तःकरणकी वृत्तियों- मोक्ष हो जाता है। उसके अनुष्ठानसे सम्पूर्ण अज्ञात ज्ञात हो के साक्षीरूपसे, उस (अन्तःकरणकी किसी भी वृत्ति) के जाता है। जिसके स्वरूपको जान लेनेसे अज्ञात भी ज्ञात हो आलम्बनसे शून्य रहकर भावना की जाय। यही (भावनाहीन जाता है, वह सम्पूर्ण परमतत्त्व रहस्य मैंने बतला दिया' ॥१४॥ स्थितिमे स्थित होना ही) निरालम्बयोग है' ॥ ८ ॥ 'गुरु कौन है ?' ब्रह्माजीके इस प्रश्नके उत्तरमें भगवान् 'तब तो (जब निरालम्बयोग इतना दुरूह है) निरालम्ब- बतलाते हैं—'गुरु साक्षात् आदिनारायण पुरुष है। वह आदि- योगका अधिकारी किस प्रकारका होता है ?'॥ ९ ॥ नारायण मैं ही हूँ। इसलिये एकमात्र मेरी शरणमें आओ। 'जो पुरुष अमानित्व आदि (ज्ञानके) लक्षणोंसे युक्त हो, मेरी भक्तिमें निष्ठावान् होओ। मेरी उपासना करो । इस प्रकार उसीको निरालम्बयोगका अधिकारी बनाना (मानना) चाहिये। मुझे ही प्राप्त करोगे । मेरे अतिरिक्त सब कुछ बाधित ऐसा अधिकारी कोई विरला ही है। इसलिये सभी अधिकारी- (अतत्त्व) है । मुझसे अतिरिक्त अबाधित (सत्ता रखने- अनधिकारियोंके लिये भक्तियोग ही श्रेष्ठ कहा जाता है। वाला) कुछ भी नहीं है। अद्वितीय निरतिशय आनन्द मैं ही भक्तियोग उपद्रव (विघ्न)-रहित है । भक्तियोगसे मुक्ति हूँ। सब प्रकार परिपूर्ण मैं ही हूँ, मैं ही सबका आश्रय हूँ। प्राप्त होती है । भक्तोंको बिना परिश्रमके अविलम्ब ही वाणीका अविषय निराकार परब्रह्मस्वरूप मैं ही हूँ। मुझसे स्वज्ञान हो जाता है ॥ १० ११ ॥ भिन्न अणुमात्र भी नहीं है' ॥ १५ ॥