कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 790, कुल 832 में से
संदर्भ में पढ़ें७३४ * त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् * [ अध्याय ८
इस प्रकार भगवान् महाविष्णुके इस परम उपदेशका लाभ करके पितामह ब्रह्माजीने परम आनन्द प्राप्त किया। तदनन्तर भगवान् विष्णुके कर स्पर्शसे दिव्यज्ञान प्राप्त करके पितामह उठे और उठकर उन्होंने प्रदक्षिणा तथा नमस्कार करके त्रिविध उपचारोंसे भगवान् महाविष्णुकी भलीभाँति पूजा की। फिर अञ्जलि बाँधकर, विनयपूर्वक समीप जाकर बोले— 'भगवन् ! मुझे भक्तिनिष्ठा प्रदान करें। हे कृपानिधे ! मैं आपसे अभिन्न हूँ, मेरा सब प्रकार पालन करें' ॥ १६-१७ ॥
'वही हो; साधु ! साधु !' इस प्रकार (ब्रह्माजीकी) भलीभाँति प्रशंसा करते हुए भगवान् महाविष्णु बोले—'मेरा उपासक सबसे उत्कृष्ट हो जाता है । मेरी उपासनासे सब मङ्गल होते हैं। मेरी उपासनासे वह सबको विजय कर लेता है। मेरा उपासक सबके द्वारा वन्दनीय होता है। मेरे उपासकके लिये असाध्य कुछ नहीं है। सम्पूर्ण बन्धन पूर्णत. नष्ट हो जाते हैं। सदाचारीकी जैसे सब लोग सेवा करते हैं, वैसे ही समस्त देवता उसकी सेवा करते हैं। महाश्रेय भी (उसकी) सेवा करते हैं। मेरा उपासक उस (उपासना) से निरतिशय अद्वैत परमानन्दस्वरूप परब्रह्म हो जाता है। जो भी मुमुक्षु इस मार्गसे सम्यक् आचरण करता है, वह परमानन्दस्वरूप परब्रह्म हो जाता है ॥ १८ ॥
'जो कोई (इस) परमतत्त्व-रहस्य आथर्वण महानारायणो- पनिषद्का अध्ययन करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। वह जान-बूझकर तथा अनजानमे किये पापोंसे मुक्त हो जाता है। महापापोंसे पवित्र हो जाता है। छिपाकर किये गये, प्रकट- रूपसे किये गये, बहुत दिनोंतक अधिक रूपमें किये गये सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। वह सभी लोकोंको जीत लेता है। उसकी सभी मन्त्रोंके जपमें निष्ठा हो जाती है। वह समस्त वेदान्तके रहस्यको प्राप्त करके परमार्थका ज्ञाता हो जाता है। वह सम्पूर्ण भोगोंका भोक्ता (उन भोगोंके द्वारा मिलनेवाले आनन्दसे युक्त) हो जाता है। उसे सभी योगोंका ज्ञान हो जाता है। वह समस्त जगत्का परिपालक हो जाता है। वह अद्वैत- परमानन्दस्वरूप परब्रह्म हो जाता है ॥ १९ ॥
'यह परमतत्त्व-रहस्य गुरुभक्तिविहीनको नहीं बतलाना चाहिये। जो सुनना न चाहता हो, उसे भी नहीं बतलाना चाहिये; न तपस्याविहीन नास्तिकको और न मेरी (भगवान्की) भक्तिसे रहित दाम्भिकको बतलाना चाहिये। मत्सरयुक्त पुरुषको नहीं बतलाना चाहिये। मेरी निन्दामे लगे (भगवान्में दोषदृष्टि करनेवाले) कृतघ्नको भी नहीं बतलाना चाहिये ॥२०॥
'जो यह परम रहस्य मेरे (भगवान्के) भक्तको बतलावेगा, वह मेरी भक्तिमें निष्ठावान् होकर मुझे (भगवान्- को) ही प्राप्त करेगा। जो हम दोनों (ब्रह्माजी एवं भगवान् विष्णु) के इस संवादका अध्ययन करेगा, वह मनुष्य ब्रह्म- निष्ठ हो जायगा। जो श्रद्धावान् तथा असूया (दोषदृष्टि) रहित होकर सुनेगा या हम दोनोंके इस संवादको पढ़ेगा, वह पुरुष मेरे सायुज्यको प्राप्त करेगा' ॥ २१-२३ ॥
(इतना कहकर) तब महाविष्णु अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् ब्रह्माजी अपने स्थान (ब्रह्मलोक) को चले गये ॥२४॥
॥ अष्टम अध्याय समाप्त ॥ ८ ॥
॥ उत्तरकाण्ड समाप्त ॥
॥ अथर्ववेदीय त्रिपाद्विभूतिमहानारायणोपनिषद् समाप्त ॥
शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!