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कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

कान्हड़दे प्रबन्ध (कवि पद्मनाभ - जालोर चौहान वीरगाथा, अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध व जौहर इतिहास)

Kanhadade Prabandha of Kavi Padmanabha with Commentary

कवि पद्मनाभ (सम्पादक: प्रो. कान्तिलाल बलदेवराम व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished354 पृष्ठ

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प्रस्ताविक वक्तव्य ३ किया - है'। कविका यह कथन सर्वथा सत्यलक्ष्यी है । हमारे प्राचीन साहित्यमें ऐसी रचनायें बहुत विरल हैं । ये रचनायें हमारे महान् राष्ट्रकी - हमारी संसारश्रेष्ठ संस्कृतिकी, सबसे अधिक, अमूल्य निधिरूप हैं । इनके अध्ययन और मननसे हमारे देशकी जनताकी - हमारे राष्ट्रकी भावि संततिकी संस्कारसमृद्धिका विकास होगा । पंडित-कवि पद्मनाभका यह काव्य-प्रबन्ध एक प्रकारसे, प्रायः शुद्ध ऐतिहासिक काव्य है । इसमें वर्णित घटनायें, बहुत अंशमें, इतिहाससमर्थित हैं । कवि उसी स्थानका निवासी है जहां पर प्रबन्ध नायक कान्हड दे ने जन्म लिया, राज्य किया और वह अनुपम आत्मोत्सर्ग किया । अर्थात् कविका कविता-सर्जन उसी जालोर नगरमें हुआ जो कान्हड दे की राजधानी था । कविको इस काव्यकी रचनामें प्रेरणा करने वाला उसी चहुआन वीरका सीधा राजवंशज है, जो कान्हड दे से केवल ५ वीं पीढ़ीमें उसके राज्यसिंहासनका, शायद अन्तिम, उत्तराधिकारी था । इसका नाम अखयराज सोनगरा था । कविके कथनानुसार यह बड़ा धर्मात्मा, सदाचारी, दानशील, और ईश्वरभक्त था । इसके सद्गुणोंका संक्षेपमें वर्णन करता हुआ कवि कहता है कि - अखइराज उत्तम अवतार, जेहनां पुण्य न लामइ पार । जीणइ कीरति कान्हड दे तणी, अखइराजि अजुआली घणी ॥ (४-३३९) 'अखयराज उत्तम अवतारी पुरुष है जिसके पुण्य कृत्योंका कोई पार नहीं है और जिसने [अपने पूर्वज] कान्हड दे की कीर्तिको खूब उजाला है।' मालूम देता है कविके कुलका संबन्ध उस राजघरानेके साथ, वंशानुवंश क्रमसे, चला आ रहा था और इस लिये उसने अपने आश्रय- दाता राजवंशके, एक महान् वीरकी कीर्तिकथा इतने उत्साह और इतनी श्रद्धाके साथ गाई है । कवि कहता है कि इस प्रबन्धकी रचना करनेसे अखइराज सीपामण सरी, पदमनाभ कीरति बिस्तरी ॥ (४-३४१) 'एक तो अखयराजकी प्रेरणा सफल हुई और दूसरी पद्मनाभ कविकी कीर्ति फैली ।' कहनेकी आवश्यकता नहीं कि कविकी यह उक्ति कितनी यथार्थ है । हमने ऊपर, प्रारंभमें, इस प्रबन्धको जो राजस्थानी महाकाव्य कहा है उसके पीछे दो अर्थ लक्षित हैं - एक तो यह कि इस काव्यमें राजस्थानी वीरकी पुनीत गाथा गाई गई है और दूसरा यह कि यह प्राचीन राजस्थानी भाषाकी एक सर्वश्रेष्ठ कृति है । अतः विषय और भाषा दोनों दृष्टिसे यह काव्य राजस्थानी है । इस राजस्थानी विशेषणसे हमारा अभिप्राय उस भाषावैज्ञानिक शास्त्रीय संकेतसे है, जिसकी स्थापना, भारतीय भाषाओंका वैज्ञानिक पद्धतिसे विश्लेषण करने वाले विद्वानोंने की है । यद्यपि हमारे निजी अभिप्रायसे, यह नामाभिधान सर्वथा संगत अर्थ सूचक नहीं है - तथापि जब तक इसके लिये कोई ऐसा अन्य अधिक सार्थक नामनिर्देश विद्वन्मान्य नहीं बनता, तब तक इसका व्यवहार करना समुचित है । हमारे विद्वान् मित्र - गुजरातके सुप्रसिद्ध कवि, लेखक, एवं चिन्तक श्री उमाशंकर जोशीने, इस प्रबन्ध जैसी प्राचीन रचना- ओंकी भाषाको 'मारू-गूर्जर' भाषाका नूतन नामाभिधान सूचित किया है, जो एक प्रकारसे