भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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गधा बनना पड़ेगा, चूहा बनना पड़ेगा, बिल्ली बनना पड़ेगा, कुत्ता बनना पड़ेगा, गंदी-गंदी योनियों में जाना पड़ेगा। सोचने लगे कि अब क्या करूँ ! फिर ध्यान आया कि अंत में गुरुदेव ही रक्षा करते हैं । चल पड़े गुरु के पास । जाकर सारी बात गुरु जी को साफ़-साफ़ बता दी । मछुआरे ने नारद जी को समझा दिया; बचने का उपाय बता दिया। तब नारद जी पुनः विष्णु महाराज के पास वैकुण्ठ में आए और पूछने लगे कि मुझे किन-किन योनियों में जाना होगा? विष्णु जी ने कहा कि चौरासी लाख योनि यानी सभी योनियों में जाना है। नारद जी कहने लगे कि जिन-जिन योनियों में मुझे जाना है, वो कृपा करके किसी जगह लिख दें। जहाँ सब योनियों के नाम विष्णु जी ने लिखे, उसकी एक तरफ नारद जी लेट गये और लोटते हुए दूसरी तरफ से पार हो गये । फिर उठकर कहने लगे—यह लो प्रभु! मैंने चौरासी भोग ली; अब मुझे क्षमा करो । विष्णु जी कहने लगे कि यह क्या बात हुई ! नारद जी ने कहा कि मैं तो चौरासी भोग चुका। विष्णु जी सोच में पड़ गये कि यह कैसे हुआ ! फिर ध्यान आया कि गुरु ने इसे (नारद को ) बचाया है । तब विष्णु जी ने नारद को गले से लगा लिया और गुरु की महिमा बताते हुए समझाया कि गुरु ही इंसान का सच्चा साथी है, क्योंकि वह लोक और परलोक दोनों का साथी है। गुरु में बैठकर ही ईश्वर अपना काम करता है । गुरु के बिना परमात्मा पंगु है । जो राह हमें गुरु ने बताई, वो परमात्मा नहीं बता सकता था। वो हमारे पास था, पर हम फिर भी उससे दूर थे। यह दूरी बिना गुरु के कभी समाप्त नहीं होनी थी, इसलिए गुरु को कभी परमात्मा से कम नहीं मानना है। साहिब की वाणी बार-बार समझा रही है— गुरु हैं बड़े गोविंद ते, मन में देख विचार ।

हरि सुमिरै सो वार है, गुरु सुमिरै सो पार ।।

आज विज्ञान का युग है। सभी क्षेत्रों में मानव तरक्की पर है। क्या खुद मनुष्य वहाँ तक नहीं जा सकता ! क्या जररूत है गुरु की ! आओ, कुछ देर के लिए गुरु को एक तरफ रखते हैं और स्वयं रूहानी दुनिया में चलते हैं। रुको! रुको! सभी धर्मशास्त्र कह रहे हैं, नहीं! ऐसा नहीं करना । गुरु के बिना अन्दर की दुनिया में जाने का प्रयत्न नहीं करना । साहिब सावधान कर रहे हैं-

यह घट मंदिर प्रेम का, मत कोई बैठो धाय ।

जो कोई बैठे धाय के, वो बिन सिर सेती जाय ।।

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