भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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कोई कहे हलुका कोई कहे गरुआ । फिर प्रभु के मकान के बारे में लड़ाई है कि कहाँ रहता है। दिल में खोजो दिल में खोजो । यहीं करीमा रामा ।। पूर्व दिशा हरि को वासा । पश्चिम अल्लह मुकामा । यानी दूसरा उसके ठिकाने के लिए लड़ाई है।

कोई कहे काशी कोई हे मथुरा।

कोई काबे कैलाश बतावे ।।

तीसरी लड़ाई यह है कि उसतक जाने का रास्ता क्या है ।

कोई कहे कर्म अधीना । कोई कहे भाग्य अधीना ।।

इतना अक्लमंद आदमी क्यों लड़ रहा है इन मुद्दों पर ? क्या धर्म- शास्त्र हमें मदद कर सकते हैं इस विषय पर ? हाँ ! पहली बात है परमात्मा की शक्ल सूरत के बारे में । इस पर भी धर्म - शास्त्र बोल रहे हैं । इस विषय पर लड़ाई नहीं है। लड़ाई की भूमिका कुछ और है । यह सुनिजोयित तरीके से लड़ाई है। शास्त्रों में लिखा है-

जेते दृश्यम तेते अनित्यम । जेते अदृश्यम तेते नित्यम।।

और वो इंद्रियातीत है, व्योमातीत है, शब्दातीत है, पंच भौतिक तत्वों से परे है। फिर विवाद खड़ा क्यों हो गया है? वो इंद्रियों से भी जाना जाने वाला नहीं है। यानी लड़ाई बेकार है। नहीं! दूसरा विवाद स्थान के बारे में है। साहिब ने कहा- तू मौको कहाँ ढूँढ़े रे बंदे, मैं तो तेरे पास में । ना मैं देवल ना मैं मस्जिद, नहीं काबे कैलास में ।

.... भँवर गुफा में मैं ना रहता, नहीं अनहद के वास में ।।

खोजी होय तुरत मिल जाऊँ, एक पलक तालाश में ।। कहत कबीर सुनो भाई साधो, हर स्वांसों की स्वांस में ।।

वेद भी अंदर में ही प्रभु को बता रहा है; गीता भी यही कह रही है कि हे अर्जुन, तुम्हारी आत्मा में ही उसका वास है । तो लड़ाई क्या है ? लड़ाई जानबूझकर है । जानबूझकर इंसान को उलझाया गया है। अनादिकाल से इंसान को उलझाया गया है । रामायण भी यही कह रही है-

प्रकृति पार प्रभु सर्व उर वासी ।।