करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 31, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंमारता था, अब भी मारने लगा तो वो दहाड़ा। सारी भेड़ें भाग गयीं; गडरिया भी भाग गया। रूपांतर यह है कि परमात्म रूपी शेर का बच्चा इंद्रिय रूपी भेड़ों के साथ विषय रूपी घास खा रहा है । मन रूपी गडरिया उसे डंडे मार रहा है। जंगल के शेर रूपी संतजन मिलते हैं तो आज्ञाचक्र रूपी चश्मे के पास ले जाते हैं, कहते हैं कि देख, तू आत्मा है। उसकी ताक़त कहीं कम नहीं हुई थी। पर कहाँ थी ताक़त ? ताक़त भेड़ों जैसी बन गयी क्या ? नहीं, भेड़ों के साथ रहकर भी शेर जैसी ही ताक़त थी। ताक़त नहीं बदली। वही थी। स्वभाव बदल गया । भेड़ों की संगत में रह- रहकर भेड़ों की तरह ही हो गया । शेर मिला तो उसे उसका स्वरूप दिखा दिया । इस तरह संतजन मिलते हैं तो आत्मा को जगा देते हैं । इंद्रिय रूपी भेड़ें भी डरने लगती हैं। मन कहीं भटकाता है तो आत्मा कहती है कि यह नहीं करना है । मन की ताक़त नहीं रह जाती है । इस तरह आपको बदल दिया । यह बदलाव कैसे आया? आत्मदेव अपनी ताक़त समझ चुका कि मेरी इच्छा के बिना कुछ नहीं हो सकता है। इसलिए आप स्थिर हो गये और इच्छाएँ ख़त्म हो गयीं । आप अनूठे हो गये । आप निराले हो गये। अब आत्मदेव भ्रमित नहीं हो रहा है । जगत के पदार्थों का आकर्षण ख़त्म हो गया। कैसे ख़त्म हो गया ? जैसे भ्रमवश रस्सी को साँप मानने के भ्रम से भयभीत थे। अगले पल यथार्थ ज्ञान हो गया तो भ्रम ख़त्म हो गया। फिर चाहें कि डरें तो भी उस रस्सी से भय नहीं लगता है । इस तरह चाहने पर भी अब दुनिया के कामों में मज़ा नहीं मिलने वाला है।
सतगुरु मोर शूरमा, कसकर मारा बाण ।
नाम अकेला रह गया, पाया पद निर्वाण ॥
सद्गुरु ने बड़ा ही अनूठा काम किया।
पकड़े भेद ताहि समझायो ॥
इस तरह मन का बड़ा ज़ोर है । आत्मा को भ्रमित करता है । गुरु आत्मरूप दिखाकर इस मन से पार कर देता है ।
कोटि जन्म का पंथ था, गुरु पल में दिया पहुँचाय ॥
यह काम गुरु नाम-दान के समय एक पल में कर देता है । साहिब ने