भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

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जैसे नासिका में सूँघने की ताक़त है, पर यह काम कानों से नहीं हो सकता है। ऐसे ही वो परमात्मा केवल आत्मा से जाना जा सकता है। इसका मतलब है कि आत्मा में ताक़त है। तो वो परम चेतन हो जाती है । यही चीज़ महापुरुषों के सान्निध्य में मिलती है । उनकी हाज़िरी में बड़ा अंतर है, बड़ी अनुभूतियाँ होती हैं। उनकी सुरति से हो जाता है । कभी आप कहते हैं कि गुरु जी, हमपर | ध्यान रखना, सुरति देना, कृपा करना । ऐसा क्यों कहा गया ? जैसे बरसात में छाता रख देते हैं तो धूप नहीं लगती है । इस तरह उनकी छत्रछाया में कुछ अजीब मिलेगा, ठंडक मिलेगी । यह तय है कि मिलेगा। इस तरह उनका ध्यान सक्षम है। तभी तो साहिब कह रहे हैं— सुरति में रच्यो ससारा, सुरति का है खेल सारा । आपके व्यक्तित्व में सबसे अलग सुरति ही है। सुरति संभाले काज है, तू मत भरम भुलाय। अगर दुनिया में आपका कुछ भटक रहा है तो वो है—ध्यान, अगर उत्थान - पतन हो रहा है हैन । वो हमारी सुरति को भ्रमित कर रहा है। गुरुजनों से पास जाकर कहते हैं कि हृदय में प्रकाश कर दो। क्या किया जा सकता है? हाँ ! कौन-सा प्रकाश ? क्या बल्ब जगाना है कोई ? यह हृदय प्रकाश से क्या मतलब है? कैसा प्रकाश चाहते हैं हम ? 'शून्य महल में घोर अँधेरा, करो नाम उजियारा ।' भाइयो, यह प्रकाश यानी सुरति से गुरु आपकी आत्मा को चेतन करता है । तब हृदय के विकार दिखते हैं। कमरे में अँधकार है तो कुछ नहीं देख पाते हैं। रोशनी होती है तो सब चीज़ दिखने लग जाती है। जब गुरुजन हृदय में प्रकाश करते हैं तो मन के सब खेल नज़र आने लग जाते हैं, काम, क्रोध आदि दिखने लग जाते हैं । कोई बल्ब, कोई दिया नहीं जलाना है। क्या प्रकाश होता है ? बिलकुल । साहिब वाणी में कह रहे हैं—

नाम बिन हृदय शुद्ध न होई । कोटिन भांति करे जो कोई ॥

तो नाम दान की क्रिया हृदय को प्रकाशित करती है । अब आप बहुत बदल गये। पहले मन जहाँ चाहता था, वहाँ बरबस खींच ले जाता था, पर अब उसका ज़ोर नहीं चल रहा है, लगता है कि हृदय प्रकाशित हो गया । स्वभाव बदल गया। अब आप चाहकर भी पाप नहीं कर पा रहे हैं। जब आप अपनी पहली ज़िदगी से अपने को तौलते हैं तो पाते हैं कि बहुत बदलाव आ गया। हर