भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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कह हैं कि जिस साहिब रूपी प्रियतम से बिछुड़ गया है, उसी की भक्ति कर । आगे कह रहे हैं-

तुमको बिसर गईं सुध घर की महिमा अपन जनाई हो॥

निरंकार निर्गुण है माया, तुम को नाच नचाई हो ॥

चर्म दृष्टि का कुलफा देके, चौरासी भरमाई हो ॥

कह रहे हैं कि हे हंसा! तुम्हें अपने सही घर की सुध भूल गयी है । तुम अपनी महिमा को नहीं जानते हो, अपनी ताक़त को नहीं समझते हो । जो निर्गुण है, निरंकार है, वो सब माया है; वो तुम्हें नाना नाच नचा रही है । तुम्हें भौतिक आँखों की परेशानी देकर, माया में लुभाकर चौरासी की धारा में भरमा दिया है। आगे कह रहे हैं- - चार वेद हैं जाकी स्वांसा, ब्रह्मा अस्तुति गाई हो ।

सो कथि ब्रह्मा जगत भुलाए, तेहि मार्ग सब जाई हो ॥

चार वेद उस निर्गण की स्वांसा से उत्पन्न हुए हैं और उन्हीं की अस्तुति ब्रह्मा जी ने गाई है। ऐसे में सब जीव भ्रमित हो गये हैं और उसी निर्गुण परमात्मा की राह पर जा रहे हैं, जो उन्हें चौरासी में भ्रमित किए हुए है। .... तो साहिब ने परम - पुरुष रूपी सच्चे प्रियतम की बात कही। वो सगुण-निर्गुण से परे है। दुनिया परमात्मा को निराकार कह रही है। इस पर साहिब कह रहे हैं— बेचूने जग राँचिया, साहिब नूर निनार ।

आखिर केरे वक्त को, किसका करै दीदार ।।

दुनिया निराकार में मग्न है । यदि वो निराकार है तो अंत में किसका दर्शन करोगे! वो सच्चा साहिब तो शब्द और प्रकाश स्वरूप है । पर वो नि:शब्द शब्द है, अनहद शब्द नहीं। वो अद्भुत प्रकाश है, सांसारिक प्रकाश नहीं । दुनिया कह रही है कि वो अवतार धारण करके संसार में आता है, पर साहिब कह रहे हैं-

दशरथ कुल औतर नहीं आया। नहीं लंका के राव सताया।।

पृथ्वी रमण धमन नहीं करिया । पैठि पाताल न बलि छलिया ।।

... ई सब काम साहिब के नाहीं । झूठ कहै संसारा ।।

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