करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 46, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंये सब काम साहिब के नहीं हैं, निरंजन के हैं। वो किसी से छल नहीं करता । वो किसी को नहीं मारता ।
है दयाल द्रोह न वाके, कहु कौन को मारा ।।
यह सारा पसार उसी का है।
जन्म मरण से रहित है, मेरा साहिब सोय ।
बलिहारी उस पीव की, जिन सिरजा सब कोय ।।
साहिब धर्मदास को परम-पुरुष के विषय में बताते हुए कह रहे हैं-
अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड रच, सब से रहे न्यार ।
जिन्द कहे धर्मदास सों, ताका करो विचार ॥
कह रहे हैं कि जो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों की रचना करके स्वयं सबसे न्यारा है, उसका विचार करो ।
देस हमार न्यार तिहुँ पुर ते । अहिपुर नरपुर अरु सुरपुर से ॥
तहाँ नहीं यम का प्रवेशा। आदि पुरुष का है वह देशा ॥
सत्यलोक तेहि देस सुहेला । सत्यनाम गहि कीजे मेला ॥
अद्भुत ज्योति पुरुष की काया । हंसन शोभा अधिक सुहाया ॥
एक हंस जस षोडस भाना । अग्र वासना हंस अघाना ॥
सत्यपुरुष की ऐसी बाता । कोटिक शशी इक रोम लजाता ।।
एक रोम की शोभा ऐसी । और बदन की बरनौं कै सी ॥
अनगिनत चन्दा
जगत में, अनगिनत दरसें
सूर ॥
झलकें नूर सब, नूर नूर
भरपूर ॥
ऐसी शोभा लोक की, सत्य पुरुष की
कोटि चन्द की शीतलता, कोटि सूर्य का
सेज ॥
तेज ॥
कह रहे हैं कि परम-पुरुष के एक-एक रोम की महिमा इतनी है कि करोड़ों सूर्य और चंद्रमा लजा जाएँ। फिर पूरे शरीर की महिमा कैसे वर्णन करूँ !!
शब्द अखण्ड होत दिन राती । न कोई पूजा न कोई पाती ॥
ऐसी हकीकत को मैंने जाना । अरस कुरस नूर कोटि भानु साँच दरस, तेज मानु, रोम रोम पुंज देखा ॥ देखा । - गरीबदास जी