भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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ये सब काम साहिब के नहीं हैं, निरंजन के हैं। वो किसी से छल नहीं करता । वो किसी को नहीं मारता ।

है दयाल द्रोह न वाके, कहु कौन को मारा ।।

यह सारा पसार उसी का है।

जन्म मरण से रहित है, मेरा साहिब सोय ।

बलिहारी उस पीव की, जिन सिरजा सब कोय ।।

साहिब धर्मदास को परम-पुरुष के विषय में बताते हुए कह रहे हैं-

अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड रच, सब से रहे न्यार ।

जिन्द कहे धर्मदास सों, ताका करो विचार ॥

कह रहे हैं कि जो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों की रचना करके स्वयं सबसे न्यारा है, उसका विचार करो ।

देस हमार न्यार तिहुँ पुर ते । अहिपुर नरपुर अरु सुरपुर से ॥

तहाँ नहीं यम का प्रवेशा। आदि पुरुष का है वह देशा ॥

सत्यलोक तेहि देस सुहेला । सत्यनाम गहि कीजे मेला ॥

अद्भुत ज्योति पुरुष की काया । हंसन शोभा अधिक सुहाया ॥

एक हंस जस षोडस भाना । अग्र वासना हंस अघाना ॥

सत्यपुरुष की ऐसी बाता । कोटिक शशी इक रोम लजाता ।।

एक रोम की शोभा ऐसी । और बदन की बरनौं कै सी ॥

अनगिनत चन्दा

जगत में, अनगिनत दरसें

सूर ॥

झलकें नूर सब, नूर नूर

भरपूर ॥

ऐसी शोभा लोक की, सत्य पुरुष की

कोटि चन्द की शीतलता, कोटि सूर्य का

सेज ॥

तेज ॥

कह रहे हैं कि परम-पुरुष के एक-एक रोम की महिमा इतनी है कि करोड़ों सूर्य और चंद्रमा लजा जाएँ। फिर पूरे शरीर की महिमा कैसे वर्णन करूँ !!

शब्द अखण्ड होत दिन राती । न कोई पूजा न कोई पाती ॥

ऐसी हकीकत को मैंने जाना । अरस कुरस नूर कोटि भानु साँच दरस, तेज मानु, रोम रोम पुंज देखा ॥ देखा । - गरीबदास जी