भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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गरीबदास जी कह रहे हैं कि मेरी इस बात को सच मानना कि मैंने उस परम-पुरुष के एक-एक रोम में करोड़ों सूर्यों का प्रकाश देखा । कोई पारखी ही उसे समझ सकता है। वो परम - पुरुष ही आत्मा का सच्चा प्रियतम है । साहिब कह रहे हैं-

आवै न जावै मरे नहिं जनमे, सोई निज पीव हमारा हो ।

ना कोई जननी ने जन्मो, ना कोई सिरजनहारा हो ॥

साध न सिद्ध मुनि ना तपसी, ना कोई करत अचारा हो ।

ना षट दर्शन चार वर्ण में, ना आश्रम व्यवहारा हो ॥

ना त्रिदेवा सोहं शक्ति, निराकार से पारा हो ।

शब्द अतीत अचल अविनाशी, क्षर अक्षर से न्यारा हो ॥

ज्योति स्वरूप निरंजन नाहीं, ना ओम हंकारा हो ।

धरणि न गगन पवन ना पानी, ना रवि चंद न तारा हो ॥

है प्रगट पर दीसत नाहीं, सतगुरु सैन सहारा हो ।

कहैं कबीर सब घट में साहिब, परखो परखनहारा हो ॥

शब्दों की तरफ ध्यान दें । कह रहे हैं कि जो हमारा सच्चा प्रियतम है, वो जन्म-मरण से परे है, संसार में आता-जाता नहीं यानी वो माता के पेट से अवतार धारण करके नहीं आता । उसका कोई माता-पिता नहीं है और न ही उसे किसी ने बनाया है । वो न सिद्ध है, न साधु, न तपस्वी और न ही वो संसार के आचार करता है। वो इनमें से भी कोई नहीं है और षट् - दर्शन, चार वर्ण आदि से भी परे है। वो चार आश्रम से भी परे है यानी वो न जवान होता है, न बूढ़ा होता है, न वो बच्चा है । उसकी कोई उम्र नहीं है। वो त्रिदेव में से कोई भी नहीं है; वो सोहं भी नहीं है; वो शक्ति भी नहीं है। वो तो निराकार से भी परे है। वो शब्द (नि:शब्द शब्द) स्वरूपी अचल और अविनाशी है । वो माया और ब्रह्म से भी न्यारा है। वो ज्योति - र - स्वरूप निरंजन भी नहीं है और 'ओम' भी नहीं है। वो धरती, आकाश, हवा, पानी आदि तत्वों से भी कोई नहीं है और सूर्य, चाँद, तारों से भी परे है। वो सबमें है, पर दिखाई नहीं देता । सद्गुरु के शब्द ही उसका बोध दे सकते हैं। वो साहिब तो सबके घट में रहने वाला है । कोई पारखी ही उसे परख सकता है। इस शब्द में बहुत बड़ा रहस्य साहिब ने बोल दिया। जब सच्चे