करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 48, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुरु की बात आती है तो कुछ लोग कहते हैं कि एक गुरु किया है तो अब उसे छोड़कर दूसरे के पास जाना तो अपने पति को छोड़कर दूसरे पति के पास जाना हुआ। यहाँ पर विचार करें कि क्या आप अपने पति (सच्चे परमात्मा, साहिब) की भक्ति कर रहे हैं या पराए की ! साहिब ने त्रिदेव, सिद्ध, मुनि, निराकार, ब्रह्म, साकार ईश्वर, ओम आदि सबसे परे बता दिया। इनमें से किसी को भी जीव का अपना सच्चा पति नहीं कहा। इसका मतलब है कि दुनिया सच्चे पति की भक्ति नहीं कर रही है और जो गुरु पराए पति की ओर ले जा रहा है, जो उसे उसके प्रियतम से नहीं मिला सकता है, उसी की शरण में रहना चाहती है, उसे छोड़कर सच्चे गुरु के पास नहीं आना चाहती है और कहती है कि अपने पति को छोड़कर दूसरे के पास नहीं जाना है । अपना पति कौन है, यही मालूम नहीं है। यहीं पर भूल हो रही है। बाकी यह कहना कि अपने पति को छोड़कर पराए पति की तरफ नहीं जाना है, यह बात तो बड़ी अच्छी है। पर सत्य यह है कि अपने पति को नहीं पहचान पा रही है। दादू दयाल तो कह रहे हैं- -
पुरुष हमारा एक है, हम नारी बहु अंग ॥
उस एक परम-पुरुष रूपी सच्चे पति को कोई नहीं जान पा रहा है I तभी तो साहिब ने कहा-
जब तक गुरु मिले नहीं साँचा । तब तक गुरु करो दस पाँचा ॥
क्योंकि कोई पूरा सद्गुरु ही हमें उस देश में ले जा सकता है, हमें हमारे सच्चे प्रियतम से मिला सकता है। आत्मा परम-पुरुष की अंश है, वो ही हमारा सच्चा साहिब है। काल निरंजन ने साहिब की सब आत्माओं को बाँधकर रखा है। वो आत्माओं के साथ-साथ परम-पुरुष का भी अपराधी है । इसलिए तो परम-पुरुष ने उसे अपने लोक से निकाल दिया है। अब यह निरंजन परम-पुरुष की आत्माओं को अपने लोक से बाहर अमर - लोक नहीं जाने देता और बहुत कष्ट देता है। सब महात्मा लोग भी इसी निरंजन की भक्ति, इसी निरंजन का नाम जीवों को दे रहे हैं। मोहर साहिब की लगा रखी है, पर नाम ज्योति निरंजन, ओंकार, ररंकार, सोहं आदि या त्रिदेव के हज़ारों नामों में से कोई या अन्य 52 अक्षर की सीमा