करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 49, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंमें आने वाला नाम ही दे रहे हैं । कोई भी परम-पुरुष के सत्य-नाम से परिचित नहीं है। वो गुप्त वस्तु है; वो केवल संतों के पास है । क्योंकि जो वहाँ पहुँचा, उसे वही पा सकता है ।
जो पहुँचा जानेगा वोही, कहन सुनन से न्यारा है ॥
वो नाम कहने-सुनने में नहीं आता । पर आज के महात्मा तो 52 अक्षर वाले नाम ही दे रहे हैं । सब निरंजन का नाम दे रहे हैं । साहिब कह रहे हैं
मन ही निरंजन, मन ही ओंकार, मन ही है करतारा ॥
ओंकार भी मन का ही नाम है, निरंजन का ही नाम है। सब इसी का नाम दे रहे हैं। पर दुनिया है कि मानती ही नहीं । न उस नाम को छोड़ना चाहती है, न उस महात्मा को। कुछ तो कहते हैं कि एक गुरु करने के बाद दूसरा करेंगे तो पाप लगेगा। यह पट्टी भी तो ऐसे ही लोगों ने पढ़ाई हुई है ताकि हमारे चंगुल में जो एक बार फँस गया, वो सदा के लिए फँसा रहे । पर साहिब तो समझा रहे हैं—
जब तक गुरु मिले नहीं साँचा । तब तक गुरु करो दस पाँचा ॥
कह रहे हैं कि जब तक सच्चा गुरु नहीं मिल जाता, 5-10 गुरु भी कर लो, कोई बात नहीं है, कोई पाप नहीं लगेगा। फिर कुछ बुद्धू तर्क देते हैं कि एक बाप को छोड़कर दूसरे के पास कैसे जाएँ ! यह बात तब है, जब सच्चा गुरु मिल जाए, परम-पुरुष की भक्ति देने वाला गुरु मिल जाए। तो हुआ आप सच्चे माता-पिता को छोड़कर अन्य कहीं न जाएँ ।
सार नाम छाड़ि के, करै आन की आस ।
ते नर नरकै जाहिंगे, सत्य भाषै रैदास ॥
कह रहे हैं कि जो अपने सच्चे साहिब को छोड़कर दूसरे की आशा रखता है, वो यमपुर में ही जायेगा। यहाँ सवाल खड़ा होता है कि जो अपने सच्चे परमात्मा को छोड़कर काल-पुरुष की भक्ति कर रहा है और उसी की भक्ति करवाने वाले गुरु की शरण में है, उसी का चेला बना हुआ है, वो अपने सच्चे पिता (परम-पुरुष) को छोड़कर दूसरे के पास नहीं है क्या ! वो तो अपने पिता के अपराधी की शरण में है, उसकी सेवा कर रहा है ।