भारतकोश
संग्रह पर लौटें

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

ये सब काम साहिब के नहीं हैं, निरंजन के हैं। वो किसी से छल नहीं करता । वो किसी को नहीं मारता ।

है दयाल द्रोह न वाके, कहु कौन को मारा ।।

यह सारा पसार उसी का है।

जन्म मरण से रहित है, मेरा साहिब सोय ।

बलिहारी उस पीव की, जिन सिरजा सब कोय ।।

साहिब धर्मदास को परम-पुरुष के विषय में बताते हुए कह रहे हैं-

अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड रच, सब से रहे न्यार ।

जिन्द कहे धर्मदास सों, ताका करो विचार ॥

कह रहे हैं कि जो अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों की रचना करके स्वयं सबसे न्यारा है, उसका विचार करो ।

देस हमार न्यार तिहुँ पुर ते । अहिपुर नरपुर अरु सुरपुर से ॥

तहाँ नहीं यम का प्रवेशा। आदि पुरुष का है वह देशा ॥

सत्यलोक तेहि देस सुहेला । सत्यनाम गहि कीजे मेला ॥

अद्भुत ज्योति पुरुष की काया । हंसन शोभा अधिक सुहाया ॥

एक हंस जस षोडस भाना । अग्र वासना हंस अघाना ॥

सत्यपुरुष की ऐसी बाता । कोटिक शशी इक रोम लजाता ।।

एक रोम की शोभा ऐसी । और बदन की बरनौं कै सी ॥

अनगिनत चन्दा

जगत में, अनगिनत दरसें

सूर ॥

झलकें नूर सब, नूर नूर

भरपूर ॥

ऐसी शोभा लोक की, सत्य पुरुष की

कोटि चन्द की शीतलता, कोटि सूर्य का

सेज ॥

तेज ॥

कह रहे हैं कि परम-पुरुष के एक-एक रोम की महिमा इतनी है कि करोड़ों सूर्य और चंद्रमा लजा जाएँ। फिर पूरे शरीर की महिमा कैसे वर्णन करूँ !!

शब्द अखण्ड होत दिन राती । न कोई पूजा न कोई पाती ॥

ऐसी हकीकत को मैंने जाना । अरस कुरस नूर कोटि भानु साँच दरस, तेज मानु, रोम रोम पुंज देखा ॥ देखा । - गरीबदास जी

गरीबदास जी कह रहे हैं कि मेरी इस बात को सच मानना कि मैंने उस परम-पुरुष के एक-एक रोम में करोड़ों सूर्यों का प्रकाश देखा । कोई पारखी ही उसे समझ सकता है। वो परम - पुरुष ही आत्मा का सच्चा प्रियतम है । साहिब कह रहे हैं-

आवै न जावै मरे नहिं जनमे, सोई निज पीव हमारा हो ।

ना कोई जननी ने जन्मो, ना कोई सिरजनहारा हो ॥

साध न सिद्ध मुनि ना तपसी, ना कोई करत अचारा हो ।

ना षट दर्शन चार वर्ण में, ना आश्रम व्यवहारा हो ॥

ना त्रिदेवा सोहं शक्ति, निराकार से पारा हो ।

शब्द अतीत अचल अविनाशी, क्षर अक्षर से न्यारा हो ॥

ज्योति स्वरूप निरंजन नाहीं, ना ओम हंकारा हो ।

धरणि न गगन पवन ना पानी, ना रवि चंद न तारा हो ॥

है प्रगट पर दीसत नाहीं, सतगुरु सैन सहारा हो ।

कहैं कबीर सब घट में साहिब, परखो परखनहारा हो ॥

शब्दों की तरफ ध्यान दें । कह रहे हैं कि जो हमारा सच्चा प्रियतम है, वो जन्म-मरण से परे है, संसार में आता-जाता नहीं यानी वो माता के पेट से अवतार धारण करके नहीं आता । उसका कोई माता-पिता नहीं है और न ही उसे किसी ने बनाया है । वो न सिद्ध है, न साधु, न तपस्वी और न ही वो संसार के आचार करता है। वो इनमें से भी कोई नहीं है और षट् - दर्शन, चार वर्ण आदि से भी परे है। वो चार आश्रम से भी परे है यानी वो न जवान होता है, न बूढ़ा होता है, न वो बच्चा है । उसकी कोई उम्र नहीं है। वो त्रिदेव में से कोई भी नहीं है; वो सोहं भी नहीं है; वो शक्ति भी नहीं है। वो तो निराकार से भी परे है। वो शब्द (नि:शब्द शब्द) स्वरूपी अचल और अविनाशी है । वो माया और ब्रह्म से भी न्यारा है। वो ज्योति - र - स्वरूप निरंजन भी नहीं है और 'ओम' भी नहीं है। वो धरती, आकाश, हवा, पानी आदि तत्वों से भी कोई नहीं है और सूर्य, चाँद, तारों से भी परे है। वो सबमें है, पर दिखाई नहीं देता । सद्गुरु के शब्द ही उसका बोध दे सकते हैं। वो साहिब तो सबके घट में रहने वाला है । कोई पारखी ही उसे परख सकता है। इस शब्द में बहुत बड़ा रहस्य साहिब ने बोल दिया। जब सच्चे

गुरु की बात आती है तो कुछ लोग कहते हैं कि एक गुरु किया है तो अब उसे छोड़कर दूसरे के पास जाना तो अपने पति को छोड़कर दूसरे पति के पास जाना हुआ। यहाँ पर विचार करें कि क्या आप अपने पति (सच्चे परमात्मा, साहिब) की भक्ति कर रहे हैं या पराए की ! साहिब ने त्रिदेव, सिद्ध, मुनि, निराकार, ब्रह्म, साकार ईश्वर, ओम आदि सबसे परे बता दिया। इनमें से किसी को भी जीव का अपना सच्चा पति नहीं कहा। इसका मतलब है कि दुनिया सच्चे पति की भक्ति नहीं कर रही है और जो गुरु पराए पति की ओर ले जा रहा है, जो उसे उसके प्रियतम से नहीं मिला सकता है, उसी की शरण में रहना चाहती है, उसे छोड़कर सच्चे गुरु के पास नहीं आना चाहती है और कहती है कि अपने पति को छोड़कर दूसरे के पास नहीं जाना है । अपना पति कौन है, यही मालूम नहीं है। यहीं पर भूल हो रही है। बाकी यह कहना कि अपने पति को छोड़कर पराए पति की तरफ नहीं जाना है, यह बात तो बड़ी अच्छी है। पर सत्य यह है कि अपने पति को नहीं पहचान पा रही है। दादू दयाल तो कह रहे हैं- -

पुरुष हमारा एक है, हम नारी बहु अंग ॥

उस एक परम-पुरुष रूपी सच्चे पति को कोई नहीं जान पा रहा है I तभी तो साहिब ने कहा-

जब तक गुरु मिले नहीं साँचा । तब तक गुरु करो दस पाँचा ॥

क्योंकि कोई पूरा सद्गुरु ही हमें उस देश में ले जा सकता है, हमें हमारे सच्चे प्रियतम से मिला सकता है। आत्मा परम-पुरुष की अंश है, वो ही हमारा सच्चा साहिब है। काल निरंजन ने साहिब की सब आत्माओं को बाँधकर रखा है। वो आत्माओं के साथ-साथ परम-पुरुष का भी अपराधी है । इसलिए तो परम-पुरुष ने उसे अपने लोक से निकाल दिया है। अब यह निरंजन परम-पुरुष की आत्माओं को अपने लोक से बाहर अमर - लोक नहीं जाने देता और बहुत कष्ट देता है। सब महात्मा लोग भी इसी निरंजन की भक्ति, इसी निरंजन का नाम जीवों को दे रहे हैं। मोहर साहिब की लगा रखी है, पर नाम ज्योति निरंजन, ओंकार, ररंकार, सोहं आदि या त्रिदेव के हज़ारों नामों में से कोई या अन्य 52 अक्षर की सीमा

में आने वाला नाम ही दे रहे हैं । कोई भी परम-पुरुष के सत्य-नाम से परिचित नहीं है। वो गुप्त वस्तु है; वो केवल संतों के पास है । क्योंकि जो वहाँ पहुँचा, उसे वही पा सकता है ।

जो पहुँचा जानेगा वोही, कहन सुनन से न्यारा है ॥

वो नाम कहने-सुनने में नहीं आता । पर आज के महात्मा तो 52 अक्षर वाले नाम ही दे रहे हैं । सब निरंजन का नाम दे रहे हैं । साहिब कह रहे हैं

मन ही निरंजन, मन ही ओंकार, मन ही है करतारा ॥

ओंकार भी मन का ही नाम है, निरंजन का ही नाम है। सब इसी का नाम दे रहे हैं। पर दुनिया है कि मानती ही नहीं । न उस नाम को छोड़ना चाहती है, न उस महात्मा को। कुछ तो कहते हैं कि एक गुरु करने के बाद दूसरा करेंगे तो पाप लगेगा। यह पट्टी भी तो ऐसे ही लोगों ने पढ़ाई हुई है ताकि हमारे चंगुल में जो एक बार फँस गया, वो सदा के लिए फँसा रहे । पर साहिब तो समझा रहे हैं—

जब तक गुरु मिले नहीं साँचा । तब तक गुरु करो दस पाँचा ॥

कह रहे हैं कि जब तक सच्चा गुरु नहीं मिल जाता, 5-10 गुरु भी कर लो, कोई बात नहीं है, कोई पाप नहीं लगेगा। फिर कुछ बुद्धू तर्क देते हैं कि एक बाप को छोड़कर दूसरे के पास कैसे जाएँ ! यह बात तब है, जब सच्चा गुरु मिल जाए, परम-पुरुष की भक्ति देने वाला गुरु मिल जाए। तो हुआ आप सच्चे माता-पिता को छोड़कर अन्य कहीं न जाएँ ।

सार नाम छाड़ि के, करै आन की आस ।

ते नर नरकै जाहिंगे, सत्य भाषै रैदास ॥

कह रहे हैं कि जो अपने सच्चे साहिब को छोड़कर दूसरे की आशा रखता है, वो यमपुर में ही जायेगा। यहाँ सवाल खड़ा होता है कि जो अपने सच्चे परमात्मा को छोड़कर काल-पुरुष की भक्ति कर रहा है और उसी की भक्ति करवाने वाले गुरु की शरण में है, उसी का चेला बना हुआ है, वो अपने सच्चे पिता (परम-पुरुष) को छोड़कर दूसरे के पास नहीं है क्या ! वो तो अपने पिता के अपराधी की शरण में है, उसकी सेवा कर रहा है ।

जैसे माता-पिता से शरीर बना, उन्होंने जन्म दिया तो वे आदरणीय हैं, उनकी सेवा करनी चाहिए । जो माता-पिता की सेवा नहीं करता, उनकी आज्ञा नहीं मानता, वो दोषी है । इसी तरह सच्चे गुरु की सेवा का महत्व है। वो भी कुछ देता है। वो आत्मा को कुछ देता है और उसे उसके सच्चे पिता, सच्चे प्रियतम (साहिब) के पास ले जाता है। इसलिए उसे माता-पिता और परमात्मा से भी बड़ा कहा। जो उसकी सेवा है, वो परम - पुरुष की ही सेवा हुई। इसलिए परम-पुरुष की सेवा करनी है तो सच्चे सद्गुरु की शरण में आकर उनकी सेवा करनी होगी । अब जो भी काल-पुरुष की भक्ति कर रहा है, वो तो परम- पुरुष का अपराधी ही हुआ न, जो उनकी सेवा नहीं करता। पर जो काल-पुरुष की भक्ति देकर परम-पुरुष के सब जीवों को काल के चंगुल से छूटने नहीं दे रहा है, उन्हें अधिक-से-अधिक उलझा रहा है, वो तो परम-पुरुष का महाअपराधी है। ख़ैर, दुनिया को उस परम-पुरुष की ख़बर नहीं है, पर जो भेद को जानकर भी, परम-पुरुष (अपने सच्चे पिता) का भेद जानकर भी एक गुरु को छोड़कर दूसरे के पास नहीं जाना है, झूठे गुरु को छोड़कर सच्चे गुरु के पास नहीं जाना है, काल- पुरुष की भक्ति देने वाले को छोड़कर परम-पुरुष की भक्ति देने वाले के पास नहीं जाना है वाली बात कर रहा है, वो कैसी बात कर रहा है ! वो परम पुरुष का अपराधी हुआ कि नहीं ! जैसे छोटे-पन से किसी को उसके माता-पिता से कोई चुराकर ले जाए। वो अपने माता-पिता को न जान पाए और चुराकर ले जाने वाले गुण्डे को ही अपना पिता मानने लगे तो कोई अपराध नहीं है । उसे पता नहीं है । पर गुण्डा उससे अपना स्वार्थ ही तो सिद्ध करेगा, उससे बंधुआ मजदूर की तरह काम लेकर साथ में डण्डे भी मारेगा। उसके दिल में भी आयेगा कि कैसा बाप है, जो इतना कष्ट दे रहा है ! ऐसे ही इस संसार में मिल रहे अपार कष्टों को देखकर कुछ के दिल में विचार उठता है कि इतना कष्ट देने वाला परमात्मा नहीं हो सकता है। पर उसे समझाने वाला कोई न मिले तो वो नहीं समझ पाता है। यदि ऊपर से कोई उस गुण्डे का ही चेला मिल जाए, जो उसे भ्रमित करता रहे कि यही तेरा बाप है तो वो पूरा भ्रमित हो जायेगा, उसे लगेगा कि शायद कष्ट देने वाला ही उसका पिता है। ऐसे ही संसार में काल - पुरुष की भक्ति

फैलाने वाले भी हैं, जो जीवों को भ्रमित करके काल - पुरुष की ही भक्ति में लगा रहे हैं। पर यदि कोई संत या संत का दास उसे सच्चाई बता दे कि उसके माता-पिता कौन हैं और उसे समझ आ जाए कि उसके असली माता-पिता कौन हैं, और फिर भी वो कहता फिरे कि मैं एक माता-पिता को छोड़कर दूसरे के पास नहीं जा सकता तो कैसा है ? विचार तो करो कि आप कर क्या रहे हैं ! जो आप कर रहे हैं, वो कितना सही है, इस पर विचार करो ! कितनी उलटी बात कर रहे हैं ! जिस परम पुरुष की भक्ति करनी चाहिए, उसकी करते नहीं और जिसकी नहीं करनी चाहिए, उसी की भक्ति सब कर रहे हैं।

ऐसे जग जीव ज्ञान चलाई । धर्मदास तोहि कथा सुनाई ॥

यही जगत की उलटी रीती । नाम न जाने काल सों प्रीती ॥

साहिब कह रहे हैं, हे धर्मदास ! इस संसार के जीवों की उलटी रीति है; वे सत्य नाम को नहीं जानते हैं और उलटा काल-पुरुष से ही प्रीत करते हैं, उसी की भक्ति करते हैं, उसे ही अपना सच्चा साहिब जानते हैं। खैर, पहले तो कोई मानता ही नहीं है, विचार ही नहीं करता है, लड़ने को आ जाता है । साहिब भी कह रहे हैं-

प्रेमी खोजत मैं फिरूँ, प्रेमी मिला न कोय ।

जासो कहिये भेद को, सो फिर बैरी होय ॥

कह रहे हैं कि उस साहिब का प्रेमी खोजता फिरता हूँ, पर कोई भी अपने सच्चे साहिब का प्रेमी नहीं मिलता है । जिससे भी उस सच्चे साहिब का भेद कहता हूँ, वो तो दुश्मन ही हो जाता है। समझ आने के बाद की बात तो दूर की बात है, पर पहले कोई आसानी से समझता ही नहीं है, मानने को तैयार ही नहीं होता है। साहिब कह रहे हैं-

काल का जीव माने नहीं, मैं कोटिन कहूँ समझाय ।

मैं खींचत हूँ सतलोक को, यह बाँधा जमपुर जाय ॥

काल - पुरुष की भक्ति करने वाला जीव मानता ही नहीं है । साहिब कह रहे हैं कि मैं इसे परम-पुरुष का रहस्य देकर सत्लोक ले जाना चाहता हूँ, पर यह है कि मानता ही नहीं, यमपुर में ही बाँधा हुआ जा रहा है।

5. नाम से पहले और बाद में

नाम के पहले और बाद में

इस भवसागर से पार होने के लिए नाम चाहिए, यह तो आज इंसान समझ चुका है। नाम की महिमा को भक्त लोग समझ चुके हैं। गोस्वामी जी ने रामचरितमानस में बड़ा सुंदर कहा- राम एक तापस तिय तारी । नाम कोटि खल कुमति उबारि । कह रहे हैं कि रामचंद्र जी ने तो एक तपस्वी की स्त्री (अहिल्या) का ही उद्धार किया, पर नाम की ताक़त से करोड़ों पापी तर गये । इसलिए आगे कह रहे हैं—

ब्रह्म राम तें नामु बड़, बर दायक बरदानि ।

रामचरित सत कोटि महँ, लिय महेस जियँ जानि ।।

नाम को सगुण राम और निर्गुण ब्रह्म, दोनों से बड़ा कह रहे हैं। नाम की महिमा का वर्णन करते हुए एक स्थान पर तो तुलसीदास जी ने यहाँ तक कह डाला है—

कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई । राम न सकहिं नाम गुन गाई ।।

उस निर्वाण-पद की प्राप्ति कराने वाला मूल नाम ही सबका राजा है। यह कहने-सुनने से परे है । यह अजर, अमर नाम है। यह आनन्द का देने वाला नाम सगुण और निर्गुण दोनों से परे है। साहिब कह रहे हैं-

मूल नाम निज सार है । सब सारन के सार ।

जो कोई पावे नाम को, सोई हंस हमार ॥

कह रहे हैं कि यह मूल नाम सबका सार है। जो इस नाम को पा लेता है, वो हमारा हंस हो जाता है । साहिब फिर कह रहे हैं- मूल नाम निज सार है, कही पुकार पुकार । जो पावे सो बाचई, नहीं तो काल

पसार ॥

कह रहे हैं कि मूल नाम ही सार है, मैं पुकार - पुकार कर यह बात बोल रहा हूँ। जो सद्गुरु द्वारा इस नाम को पायेगा, वही काल से बच सकता है, अन्यथा काल का ग्रास ही बनना पड़ेगा, क्योंकि सब जगह काल का ही जाल फैला हुआ है। काल बली तिहुँ लोक में, जीव शीव के नाथ। मूल नाम जो पावई, सो चले हमारे

साथ ॥

तीनों लोक में प्रबल काल का जाल फैला हुआ है। वो सब जीवों और ईश्वरों का मालिक है। पर जो मूल नाम को पा लेता है, वो इसके चंगुल से छूटकर हमारे साथ हमारे देश में चलता है।

धर्मदास मैं सत्यहि भाखा । तुमसे गोय कछु नहिं राखा ॥

चौदह अरब ज्ञान मैं भाखा । मूल नाम गुप्त करि राखा ॥

मूल नाम है सबके भेदा । पावे हंसा होय अखेदा ॥

गुप्त प्रगट हम तुमसे भाखा । पिण्ड ब्रह्माण्ड के ऊपर राखा॥

कहा कि मैंने तुमसे सत्य - सत्य बात कही, कुछ भी गुप्त नहीं रखा। चौदह अरब ज्ञानी की बातें तुमसे कहीं, पर मूल नाम को गुप्त ही रखा। मूल नाम में ही सबका भेद छिपा है। जो हंस उस नाम को पा लेता है, उसके सारे दुख समाप्त हो जाते हैं । मैंने तुमसे गुप्त नाम को प्रकट करके बताया और पिण्ड - ब्रह्माण्ड से ऊपर कर दिया ।

मूल नाम प्रगट नहिं करिये । यहि नाम को गुप्तहिं थरिये ॥

मूल नाम सो जीव उबारा। और नाम प्रगट संसारा॥

मूल नाम जाके घट आवें । सो हंसा सत्य लोक सिधावें ॥

मूल नाम की पावे डोरी । टूटे घाट अठासी करोरी ॥

युगन युगन लेई अवतारा। मूल नाम सो हंसा उबारा ॥

मूल नाम गुप्त तुम राखो । सत्त नाम प्रगट तुम भाखो ॥

कोटि कर्म हंस के होई । मूल नाम सो डारो धोई ॥

नीर पवन का भेद अपारा। मूल नाम इन्हुँ ते न्यारा॥

मूल नाम बिनु मुक्ति न होई । लाख ज्ञान कथे सो कोई ॥

अकह नाम जीव के सारा । पावे हंसा होय भवपारा ॥

साहिब कह रहे हैं कि इस गुप्त नाम को प्रगट नहीं करना है, गुप्त ही

रहने देना है। इसी गुप्त नाम से संसार के जीव पार होंगे। जिसके घट में यह नाम आयेगा, वो हंस सत्य-लोक में पहुँच जायेगा । मूल नाम पा लेने पर काल के सारे जाल कट जायेंगे। मैं युग-युग इस संसार में आता हूँ और मूल नाम की डोरी से हंसों को सत्य-लोक ले जाता हूँ । इस नाम से हंस के करोड़ों कर्मों का जाल भी कट जाता है । चाहे कोई कितना भी ज्ञान प्राप्त कर ले, ज्ञान की बातें कर ले, पर मूल नाम के बिना मुक्ति हो ही नहीं सकती है। यह नाम कहने में नहीं आता है। जो इस नाम को पा लेता है, वो संसार - सागर से पार हो जाता है। यह नाम करता क्या है ? यह नाम आया कहाँ से ? इन बातों को जानने से पहले देखते हैं कि नाम से पहले आप क्या हैं । नाम से पहले वर्तमान में आप क्या है वर्तमान में आप मन की दुनिया में पूरी तरह से डूबे हुए हैं। आपका मन और आत्मा दूध-पानी की तरह एक हो गये हैं । इसलिए आत्मा का वजूद नज़र नहीं आ रहा है । मन आपकी आत्मा पर हावी हो गया है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि आपको पाप-पुण्य का ठीक-ठीक ज्ञान नहीं हो पा रहा है सही ग़लत का आपको पता नहीं चल पा रहा है। जैसा-जैसा मन कहे जा रहा है, वैसा-वैसा आप किये जा रहे हैं । चाहे अनचाहे आपको वो सब करना पड़ रहा है। यह मन कभी अच्छा भी मन जाता है और कभी बहुत बुरा भी। अच्छे-बुरे दोनों कर्मों का प्रेरक मन है । यही कारण है कि वर्तमान में आप मन की चालाकी को समझ नहीं पा रहे हैं । यही बन आपसे अनिष्टकारी काम भी करवा रहा है। छल, कपट, ठगी, बेइमानी आदि सब कुछ आपसे करवा रहा है। वर्तमान में आम आदमी की सुरति कुंद है। जब हीरा मिट्टी में होता है तो वो रोशनी नहीं दे पाता है, लेकिन जब उसे निकाल साफ़ किया जाता है तो वो हीरा रोशनी देने लगता है। हीरे की रोशनी कम नहीं होती, केवल मात्र आच्छादित हो जाती है । इसी तरह हमारी सुरति अपने-आप में परिपूर्ण है। वो घटती-बढ़ती नहीं। उसकी रोशनी, उसका गुण, उसकी ताक़त कम नहीं हो

सकती। इसलिए उसे किसी शक्ति की ज़रूरत नहीं है, पर उसमें मन - माया की गंध लग गयी है, जिसके कारण से उसका प्रकाश लुप्त हो गया है, उसका गुण छिप गया है। कभी-कभी कुछ लोग कहते हैं कि भक्ति करेंगे तो उससे आत्मा को शक्ति मिलेगी । नहीं ! नहीं! ऐसी बात नहीं है । यदि आत्मा को किसी चीज़ से ताक़त की ज़रूरत है तो फिर वो चीज़ आत्मा से बड़ी हो जायेगी। पर नहीं, आत्मा से बड़ी कोई चीज़ नहीं है । यह तो ईश्वर की अंश है । इसे किसी बाहरी पदार्थ की ज़रूरत नहीं है । फिर यदि ऐसा है तो भक्ति क्यों करनी है ? ध्यान क्यों करना है ? आओ, इस ओर चलते हैं । भक्ति से, ध्यान से आत्मा को शक्ति नहीं मिलेगी, पर आत्मा के ऊपर जो मन-माया का कीचड़ लगा हुआ है, वो धुलता जायेगा और आत्मा अपने को अनुभव करने लग जायेगी। जब आत्मा अपने को जान जायेगी तो फिर यह मन की किसी बात को नहीं मानेगी। अभी तो आपकी आत्मा मन के कहने पर चल रही है। जो-जो मन कह रहा है, वो वो करती जा रही है। सारे गंदे काम जो मनुष्य कर रहा है, क्या वो आत्मा करना चाह रही है ? नहीं! मन ही तो सारे गंदे कामों की प्रेरणा दे रहा है। आत्मा अपने को अनुभव नहीं कर पा रही है। मन 24 घंटे आत्मा पर सवार रहता है; सोचने भी नहीं दे रहा है कि क्या बात है । मन की ताक़त से आत्मा भूलवश अपने को शरीर मान बैठी है और मन की इच्छाओं की पूर्ति में जुट गयी है। इस शरीर में बहुत झंझट हैं । काम, क्रोध, मोह, लोभ और अहंकार रूपी बड़े-बड़े भयंकर राक्षस बैठे हुए हैं, जो बरबस आत्मा को नरक की ओर घसीट रहे हैं । आत्मा असहाय हो गयी है।

जीव पड़ा बहु लूट में नहीं कछु लेन न देन ।।

बड़ी लूट में है। सबसे पहले वर्तमान में हमारे धर्म में भक्ति का जो स्वरूप है, क्या इसमें कोई ग़लती आ गयी है ? अगर सुधार क्यों न करें ! वर्तमान में हमारी भक्ति में दोष तो नहीं आ गया है ! यह गंभीर विषय है। थोड़ा समय पहले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के विषय पर लोगों से राय माँगी गयी। रेडियो, टी. बी. आदि पर आम आदमी की राय माँगी जाती है ।

तो यदि समाज में पाप का बर्चस्व हो गया है तो चिंतन करना होगा । देखना होगा कि भक्ति का स्वरूप कैसा है । इस समय जो भक्ति का स्वरूप देख रहे हैं, क्या ठीक है ! यदि कोई त्रुटि है तो वो कहाँ है ? समाज में पाप बहुत फैल गया है। भ्रष्टाचार, क्रूरता आदि फैल गयी है। यह अधिक है। मुझसे एक पत्रकार ने सवाल किया। वो बहुत प्रासंगिक था। सवाल था कि चारों ओर भक्ति के माहौल को देखकर क्या लगता है कि आज इंसान भक्ति की तरफ झुक रहा है ? मैंने कहा- नहीं । मेरा ऐसा दृष्टिकोण है कि जितना आज इंसान भक्ति से दूर है, इतना कभी भी नहीं था । यदि इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि आज इंसान भक्ति से बहुत दूर हो गया है। यदि आज भक्ति का माहौल होता तो मानव में आज हिंसा, अनीति, भ्रष्टाचार आदि कैसे होता! यानी वर्तमान में भक्ति के स्वरूप में दोष है । आज उसे मजबूरन भक्ति की तरफ खींचा गया है। जैसे व्यापारी ग्राहक को आहुत करता है, जैसे राजनीतिक पार्टी करती है, ऐसे ही हरेक मत-मतांतर इंसान को अपनी ओर खींचने का प्रयास कर रहा है । यह एक मत की बात नहीं है । हम देख रहे हैं कि धर्म में प्रतिस्पर्द्धा आ गयी है । कोई भी फ्री नहीं है । हरेक पर किसी-न- किसी मत की मोहर लगी हुई है। वर्तमान में धर्म प्रचारक क्या चाह रहे हैं ? क्या वे इंसान की मुक्ति चाह रहे हैं ? यदि इंसान भक्ति की तरफ है तो समाज में अपराध नहीं होना चाहिए था ।

भक्ति स्वतंत्र सकल गुण खानी । बिनु सत्संग न पावत प्राणी ॥

भक्ति तो सकल गुणों को उत्पन्न करने वाली है । प्रेम, दया, क्षमा, विवेक आदि भक्ति के लक्षण हैं । जब भी इंसान भक्ति करेगा तो उसमें ये सद्गुण आयेंगे। पर वर्तमान में कहीं प्रेम दिखाई नहीं दे रहा है, कहीं अपनापन दिखाई नहीं दे रहा है । भक्ति के लक्षण दिखाई नहीं दे रहे हैं । भक्ति को क्या हो गया है ! समाज में रोग बहुत हो गये । इस पर आम लोगों की राय ली गयी । शोध किया गया तो कारण साफ़ था । उसमें यह नज़र आया कि वायुमण्डल प्रदूषित हो रहा है। रोगों का कारण मिला कि भोजन दूषित खा रहे हैं, जिसमें ज़हरीले केमिकल्स हैं, यूरिया बगैरह है । फिर हरेक चीज़ में मिलावट है । फिर प्रदूषण के कारण शुद्ध जलवायु नहीं मिल पा रही है।

बीमारियाँ बढ़ रही हैं तो कारण है कि वातावरण में प्रदूषण, खान- पान में त्रुटियाँ, रहन-सहन में त्रुटियाँ और टेंशन। ध्यान रखें कि टेंशन हरेक बीमारी को बुलाती है। हार्ट, फेफड़े, दिमाग़ आदि सब पर असर पड़ता है । टेंशन से हार्ट फेल हो सकता है, मस्तिष्क संबंधी रोग हो सकते हैं । जब आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो रही है तो टेंशन है। तो समाज में पाप बढ़ गया है तो इसका कारण क्या है ? कोई जिम्मेदार तो होगा न! हरेक गलती के लिए कोई जिम्मेदार ढूँढ़ा जाता है। एक्सीडेंट होता है तो जिम्मेदार ढूँढ़ा जाता है । क्यों हुआ, इसका कारण ढूँढ़ा जाता है । क्या सिग्नेल नहीं था या स्टेशन मास्टर की ग़लती है, यह देखा जाता है। एक्सीडेंट के पीछे क्या कारण रहा, यह खोजा जाता है । फिर उसे दण्डित किया जाता है या सुधार लाया जाता है। इस तरह पाप का कारण ढूँढ़ा जाना चाहिए। आज धरती पर समाज में पाप दीख रहा है तो जिम्मेदार धर्मक्षेत्र है । मानव छल कर रहा है तो सरकार की जिम्मेदारी नहीं है । सबसे पहले धर्म की जिम्मेदारी है । आप देखें कि पहले लोग पाप नहीं कर रहे थे । पहले धर्मवेत्ताओं ने अच्छी तरह से समझा दिया था। इसलिए लोग पाप नहीं कर रहे थे । इसलिए वे छल आदि नहीं कर रहे थे । यदि थे तो बहुत कम थे। आज कई शातिर तरीके से अपराध कर रहे हैं। आदमी पाप-पुण्य को नहीं समझ पा रहा है। भक्ति तंत्र फेल हो रहा है। इसलिए ध्यान देने की ज़रूरत है कि भक्ति - क्षेत्र कैसे ख़राब हो गया। भाई-भाई को मारने के लिए तैयार है । जो चरित्रवान् है, उसे बुद्ध समझा जा रहा है; जो शराब नहीं पी रहा है, उसे बेवकूफ़ माना जा रहा है, उसे हीन भावना से देखा जा रहा है; जो छल नहीं कर रहा है, उसे पिछड़ा हुआ माना जा रहा है; जो हिंसा नहीं कर रहा है, उसे डरपोक माना जा रहा है। यानी छल, हिंसा आदि का ग्राहक बढ़ता जा रहा है । मन काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रूपी पाँचों हाथों से सबको मरोड़े जा रहा है। बिना नाम के सब मन-माया के जाल में पिस रहे हैं। यह पूरी दुनिया मन की है । मन इस संसार का राजा है, इसलिए उसी की हुकूमत चल रही है । जिसकी हुकूमत होती है, उसी का राज होता है, उसी का हुकुम चलता है। देखते हैं कि दुनिया में काल - पुरुष की हुकूमत चल रही है क्या ?

थोड़ा चिंतन करें तो लगेगा कि चल रही है । जिस भी पार्टी की सत्ता होती है, उसी का हुकुम चलता है। कैबिनेट में बड़े मिनीस्टर होते हैं। बिजली के महकमें के लिए अलग मंत्री है, रक्षा के लिए अलग मंत्री है। लगता है कि पूरी हुकूमत चला रहे हैं। क्या इस तरह मन की हुकूमत हमारे अन्दर चल रही है ? लग रहा है कि हम सबके अन्दर एक ऐसी सत्ता की हुकूमत चल रही है, जो हमेशा हमारे विरुद्ध चल रही है। स्कूलों में सरकार की हुकूमत है। वो चाहें तो स्कूल 7 बजे खुलेंगे, वो चाहें तो 8 बजे खुलेंगे। इस तरह दुनिया में निरंजन की हुकूमत चल रही है। वो कैसे कर रहा है हुकूमत ?

मनहिं निरंजन सबपर छाए ॥

उसकी ताक़त है कि उसके हर आदेश का पालन होता है। आख़िर कुछ जान सकते हैं कि कैसे चलता है ? वो हरेक चीज़ करवा सकता है । कैसे ? जैसे सी.एम. का शासन चल रहा है। मन की हुकूमत कैसे चलती है ? यह ब्रेन को संदेश देता है । जितने भी मिनीस्टर हैं, सी. एम. के अधीन हैं । इस तरह मन भी बड़े मिनीस्टर हैं । मन ने कहा कि फ़लाने को तमाचा मारो। यह आज्ञा कैसे पालन हुई ? मन ने यह चीज़ बुद्धि को बताई । बुद्धि क्या है ? यह बुद्धि भी मन है। उसने विचार किया कि गाली बकी थी इसने । बुद्धि ने क्रोध को बुलाया, कहा कि सुनो, यह काम करना । गुस्से का मिनीस्टर है - क्रोध । संदेश दिया। उकसाना ज़रूरी था वहाँ । नहीं आता क्रोध तो नहीं मारना था । इनका कोई कसूर नहीं है। पुलिस वालों को आदेश मिला कि मारो नहीं उनका कसूर नहीं है, आदेश का पालन कर रहे हैं । इस तरह इनका कसूर नहीं है । इन्होंने आदेश माना। इसके भी एस. पी. हैं । इन्द्रियों पर देवता हैं; सब इसकी बात मान रहे हैं। मन ने कहा कि आम खाना है । हरेक बात का पालन होता है । मन ने कहा कि धन चाहिए। क्या कर रहा है ? बॉस है, किनारे बैठकर नेटवर्क चला रहा है। माफिया है । तभी कह रहे हैं- तेरा बैरी कोई नहीं,

तेरा बैरी मन ॥

जीव के संग मन काल रहाई। अज्ञानी नर जानत नाहीं ॥

धन चाहिए। ऐसे नहीं आयेगा । बुद्धि ने लोभ को कहा – हाय पैसा, हाय पैसा। दिल में समा जायेगा। सरकार ने कहा कि फ़लाना काम करना है ।

सभी जुट जाते हैं कार्यकत्ता । बुद्धि एक बार आदेश दे दे कि चाँटा मारना है, हाथ तैयार हो जायेंगे। यह काम हो जायेगा। पाँच चीजें विशिष्ट हैं । पाँचों इसमें बड़े मंत्री हैं। इनके सैकेट्री हैं, पूरा परिवार है । जो कहा, वो करना-ही- करना है, नहीं तो शांति नहीं है । चाहे अनचाहे करना ही है, क्योंकि मन का आदेश है। मोह आया। मोह का मिनीस्टर ब्रेन में बैठेगा, कहेगा कि बेटे के लिए यह कर, वो कर । आदमी सोचता है कि तारे तोड़ लाऊँ । मिनीस्टरों ने कार्यकर्त्ताओं को अधिकार दे रखे हैं । इस तरह इनके पास हथियार हैं, दिख नहीं रहे हैं । साहिब कह रहे हैं-

तीन लोक में मनहिं विराजी । ताहि न चीह्नत पंडित काजी ॥

तीन - लोक में मन विराजमान है । मन जो चाहता है, वो करता है । यही दुश्मन बना देता है। इसकी तह में जायेंगे तो यह सेना बहुत है। मन की सेना बड़ी तगड़ी है। इसलिए साहिब वाणी में एक बात कह रहे हैं—

बहु बंधन ते बांधिया, एक विचारा जीव ॥

जैसे सैकेट्री हैं, तहसीलदार हैं, कमीश्नर हैं, थाना है, चौकियाँ हैं, फिर बाज़ारों में सिपाही खड़े हैं। पूरे एरिए को पकड़ा है। इस तरह मन तीन- लोक का राजा जो है । यह इसे सही में मिला है। पॉवर मिला है। काम, क्रोध आदि भी इसी के हैं । प्रथम प्रवृत्ति मन को, महामोह अहंकार । दूजी प्रवृत्ति उपजो, काम

प्रबल जग में ॥

ये दुर्गुण सबमें हैं। काम, क्रोध, मोह, लोभ, दंभ, अहंकार आदि सबमें हैं। रूप का भी मद है। यदि पढ़ा लिखा है तो उसका भी मद आ जाता है । फिर आगे इनके परिवार भी हैं । मोह की स्त्री है - प्रिया । यह सबके अन्दर है । कोई भी चीज़ प्यारी लगेगी। एक महात्मा किसी को प्रिय नहीं मानता है । वो जानता है कि क्या है । फिर इसका बेटा है घमंड । नूह है ममता। यानी मेरा-मेरा। यह आत्मा नहीं है । बहुत बड़ा झमेला अन्दर में है । चश्म दिल से देख तू, क्या क्या तमाशे हो रहे । दिल सतां क्या क्या हैं

तेरे दिल सताने के लिए ॥

,

टी.बी. पर देखें तो कोई महात्मा बाल बना रहा है, कोई दाढ़ी, कोई टिक्का लगाए है। सबने भेष से पहचान बनाई हुई है । मेरी पहचान भेष नहीं है। मेरे कुर्ते से आप मुझे पहचान लेते हैं । यदि मैं पैंट-कमीज पहनकर निकल पहूँ तो पूरा शहर घूमकर आ जाऊँगा पर कोई पहचान नहीं पाएगा। ट्रेन में एक लड़की मिली । मैं ब्रश कर रहा था। रात को वो मिली। सुबह जब मैं ब्रश कर रहा था तो अपनी नज़र झुकाकर मुझे देखने लगी। बाद में कहने लगी कि आप साहिब हैं न? मैं मुस्कराया तो वो जान गयी। वो कहने लगी कि मैं अपने पति से रात को ही कह रही थी कि ये साहिब लग रहे हैं, पर वो मान नहीं रहे थे। मैं आपको पहचानने में लगी हुई थी। आपकी चाल देखकर मुझे लग रहा था कि आप साहिब ही हैं । उसने नाम भी लिया था। देखा न, वो मुझे पहचान नहीं पा रही थी । इतनी देर से ट्रेन में बैठी थी। ....तो इस तरह काम का भी परिवार है। काम की स्त्री है— रति । यह रति क्या है ? संभोग क्रिया ही रति है । काम की यही पत्नी है । दोनों मिलकर वार करते हैं। ये दुश्मन ऐसे हैं कि दिखाई भी नहीं देते, वार पूरा करते हैं । फिर लालच इसका पुत्र है । जहाँ ये सब नहीं, वहाँ संभोग नहीं। फिर लोलुपता यानी उसी में रहना। तू-ही-तू बस । यह लोलुपता है। यह भी काम की बहू है । किसी से कोई लड़ाई करे तो उसके घर के सारे सदस्य भिड़ जायेंगे, एक हो जायेंगे। इस तरह ये सब भिड़ते हैं । एक महापुरुष ख़ालिस होता है, सबकी ख़बर लेने वाला होता है ।

प्रबल अविद्या का परिवारा ॥

गोस्वामी जी रामायण में बोल रहे हैं-

इन सब मिल जीवहि घेरा ॥

ये दिख नहीं रहे हैं । इन्होंने आत्मा को घेरा है । आत्मा यहाँ बँधी है । वो पीड़ित है। ये समझ नहीं आ रहे हैं। बड़े बारीक दुश्मन से पाला पड़ा है। फिर क्रोध है। उसकी पत्नी है— हिंसा । क्रोध आता है तो मारने की भावना आती है। हिंसा आती है तो मारकूटकर मज़ा आता है। तब ही तसल्ली मिलती है । यह सबकी कहानी है। यह कहती है कि मारने से ही शांति मिली । तसल्ली के लिए मारता है। यह कैसी तसल्ली है कि गाली देकर मारकर तसल्ली ले रहे हैं ! शरीर का इल्म ही नहीं है इंसान को । पूरे सिस्टमों को नहीं समझ पा रहा है।

एक मनोवैज्ञानिक मिला; वो एक ही सवाल में ढेर हो गया। मैंने कहा कि मन क्या है ? कहाँ रहता है ? जब पूरी बात हुई तो कहने लगा कि महाराज, जो बात आप कर रहे हैं, वो आजतक किसी स्लेबस में नहीं है । मैं ड्राइवर पर भी नज़र रखता हूँ। चलते-चलते लड़की पर नज़र टिके तो टोक देता हूँ। क्योंकि आदत बन गयी है यह । कभी फ़ालतू हार्न बजाए तो टोकता हूँ, मारता भी हूँ। मैं कहता हूँ कि मेरी गाड़ी में यह हरकत कर रहा है। चाँटा भी मारता हूँ। क्योंकि उसकी आदत बन गयी है।

रहिमन लाख भली करो, औगुणी अगुण न जाय ॥

ये सब ताक़तवर हैं। वेदों की रचना करने वाले वेदव्यास जी भी पुत्र के शोक में रो रहे थे। पेड़ ने कहा तब होश आया। क्रोध का बेटा है- अविचार । यानी विचार नहीं करना है । जब भी क्रोध आता है तो विचार नहीं करने देता है । अन्दर में दैवी गुणों को दबा कर रखता है । इसकी बहू है- भूल । कहते हैं कि भूल गया । यह बहू है । लोभ का परिवार भी है। तृष्णा इसकी स्त्री है। लोभ से इंसान पूरे पाप करता है। झूठ इसकी बहू है । पाप पुत्र है ।

अस असुर घट में बसे, कैसे रहे कुशल ॥

इस तरफ किसी का चिंतन नहीं है । मन का नेटवर्क बहुत है । बड़े- बड़े नहीं समझ पा रहे हैं। तभी साहिब वाणी में कह रहे हैं-

सय्याद के काबू में हैं सब जीव विचारे ॥

सही में समस्त जीव शैतानी ताक़तों के हाथ में हैं। छुटकारा नहीं मिल रहा है। चाहे-अनचाहे उसका हुकुम चल रहा है। यह आदेश हमारे शरीर में घूमता है। विचार करने पर भी पता चलता है कि ऐसी ताक़तों का हुकुम चल रहा है। ये कौन है ? मन । साहिब वाणी में कह रहे हैं-

मनहिं आहे काल कराला । जीव नचाए करे बेहाला ॥

इसका मतलब है कि हम सबके अन्दर एक ऐसी सत्ता काम कर रही है, जिसका हुकुम आत्मदेव को मानना पड़ रहा है। देखते हैं कि हमारे नुक़सान में है क्या ? साहिब की बात में वज़न लग रहा है कि सभी किसी ऐसी शैतानी ताक़त के हाथ में हैं, जो क्रूर हैं, हिंसक हैं। उदाहरण के लिए मन का

हर एक आदेश पालन किया जाता है । जो भी चाहता है, करवा लेता है। इस मन की हुकुमत बहुत बड़ी है। बहुत सेना है । बहुत ताक़त है इस मन में। मन एक संदेश देता है। सभी इंद्रियाँ इस आदेश का पालन करती हैं। मन के चार रूप हैं- मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार । चारों ये मन के रूप हैं । यह बुद्धि आदेश देती है कि फ़लाने को तमाचे लगाने हैं तो हाथ, शरीर, आत्मा सभी उस मन की आज्ञा का अनुकरण करते हैं । मन के मिनीस्टर हैं— काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, दंभ। इनकी बड़ी सेना है । जैसे शासन संचालित होता है, ऐसे ही मन का पूरा नेटवर्क है । जो ऊपर से संदेश आया, नीचे तक सभी उस आदेश का पालन करते हैं । इस तरह मन के आदेश का सभी पालन करते हैं । उदाहरण के लिए बुद्धि ने कहा कि इसने हमें अच्छा नहीं कहा, इसे मारो। तो आदेश देती है। हाथ मारने के लिए तेज़ी से चल पड़ते हैं । फिर यह काम कैसे होता है ? क्रोध के साथ हिंसा भी आ जाती है । हिंसा क्रोध की पत्नी है । अविचार उसका पुत्र है और घृणी उसकी बहू है। परिवार इतना ख़तरनाक है। हिंसा रानी कहती है कि मज़ा आ रहा है, मारो | इतना आनन्द आता है कि विवेक नहीं होता है । अविचार उसका पुत्र है । जब भी क्रोध आता है लगता है कि शांति तभी मिलेगी, जब मारेंगे। गुस्से में कभी गाली बकता है । शांति के लिए बकता है । सकून मिलता है । यह कैसा सकून था कि किसी को चोट पहुँचाने से शांति मिली! यह हिंसा क्रोध की पत्नी थी। तब अविचार भी आ जाता है, कुछ नहीं सोचने देता है। वो कहता है कि लगे रहो । फिर घृणा आ जाती है। परिवार ख़तरनाक है । देखते हैं तो हरेक इंसान में ये चीजें मिल रही हैं । इसका मतलब है कि मन का नेटवर्क बहुत बड़ा है। इस तरह इसका मंत्री लोभ है। जब भी धन की आकांक्षा होती है, बुद्धि लोभ को आज्ञा देती है— उठ! लोभ उठ जाता है । उसकी पत्नी है— तृष्णा । वो भी खड़ी हो जाती है, कहती है—हाय पैसा ! तृष्णा होती है तो शांति नहीं मिलती है। उसका बेटा है- - पाप । पुत्र भी ख़तरनाक है । वो कभी भी आदमी को सोचने नहीं देता है। वो पाप ही करवायेगा। यह पूरी मन की फौज है । आत्मदेव पूरा इनका पालन कर रहा है । इस तरह कामदेव है । जब मन चाहता है तो जीव को उलझाता रहता है। जब काम आ जाता है तो बुद्धि भी वैसी ही हो जाती है । विषय-विकारों की तरफ ध्यान हो जाता है। काम की पत्नी है— रति । रतिक्रिया संभोग क्रिया

को कहते हैं । इसका परिवार भी बड़ा ख़तरनाक है । इन सबने मिलकर जीव को घेरा है।

इन सब मिल जीवहि घेरा । बिना परिचय भया यम को चेरा॥

फिर मोह |

मोह सकल व्याधिन को मूल । ताते उपजत बहु विधि सूला ॥

यह क्या है मोह ? जब आदमी में मोह आता है तो अनर्थ कार्य करने लगता है। मोह की पत्नी है, पूरा परिवार है। इसकी वधु है—लोलुपता । पुत्र है— अज्ञान। मोह आ जाता है तो लगता है कि यह मेरा ही है। मोह बड़ी चीज़ों का है। बिलकुल भी मन एक्टिव हो रहा है। जिस भी दल की सरकार है, हुकूमत चल रही है। मुखिया जो आदेश दे रहा है, लागू हो रहा है। मन जो भी आदेश दे रहा है, लागू हो रहा है। राक्षस की सेना होगी तो ख़तरनाक ही होगी। वो भी ख़राब होगा। ये मनुष्य के अन्दर रहते हैं, अपना काम कर रहे हैं । ये सब शक्तिशाली हैं, एक से बढ़कर एक हैं । आत्मदेव आज्ञा पालन के लिए बाध्य है। अब सवाल उठा कि क्यों कर रहा है ? ये इससे ताक़तवर हैं क्या ? नहीं, अज्ञान के कारण। अज्ञान यह कि अपने को मन समझ लिया, बुद्धि समझ लिया। इसलिए मन नचा रहा है । मन का हथियार अज्ञान है । पता नहीं चल रहा है कि कौन कर रहा है । अज्ञान से सब हो रहा है । पर किसकी ताक़त से हो रहा है ? आत्मा की । आत्मदेव अनुकरण न करे तो कुछ नहीं हो सकता है। साहिब ने कहा—

आपा को आपा ही बंध्यो ॥

यह बड़ा सतर्क किया है । अपनी शक्ति से अपने को बाँधा ।

जैसे स्वान काँच मंदिल मां, भरमत भूँकि परयो ॥

जैसे काँच के महल में रहने वाला कुत्ता शीशे में दिखने वाले अपने ही प्रतिबिंब को दूसरा कुत्ता समझकर भौंकता भौंकता मर जाता है। सच यह है कि अपनी ही परछाईं को उसने दूसरा कुत्ता समझा ।

जैसे नाहर कूप में, अपनी प्रतिमा देख परयो ॥

जैसे शेर कुँए में अपनी परछाईं को देख दहाड़ा । ध्वनि प्रतिध्वनि होती है। उसे कोई नहीं मारा। दूसरा शेर समझकर वो कूद पड़ा। यानी अपनी ताक़त से अज्ञान के कारण मारा गया। इस तरह अपने को बंधन में डालने

के लिए आत्मदेव अज्ञानवश स्वयं अपनी ही उर्जा लगा रहा है। आत्मा के लिए तो शास्त्रों में कहा कि नाश नहीं होता, अजर-अमर है । वासुदेव कृष्ण ने जब कहा कि मैं गीता का संदेश पहले भी सूर्य को दे चुका हूँ। अर्जुन ने कहा कि आप तो इसी युग में हुए हैं और सूर्य पुरातनकाल से है, फिर यह कैसे संभव है? तब वासुदेव ने कहा कि तेरे और मेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं, पर अन्तर यह है कि वो सब तुझे याद नहीं हैं, पर मुझे याद हैं।

यानी आत्मा ने कई शरीर धारण किये। सभी छूट गये ।

आखिर यह तन खाक मिलेगा, कहाँ फिरत मगरूरी में ॥

यह भी छूट जायेगा। यह पूरा - पूरा सच है । इसके बाद भी कैसा अज्ञान है कि सच मान रहे हैं। क्योंकि मोह आ जाता है तो सच लगता है । मोह के कारण आत्मा भी मेरा-मेरा कहने लगी, लोभ के कारण पाप करने लगी । यह आत्मा का स्वभाव नहीं है। यानी वर्तमान में बिना नाम के आपमें आत्मा का स्वभाव मिल नहीं रहा है। | किसी को भी जानने का प्रयास करते हैं तो दो चीज़ों से। एक तो शारीरिक नाक-नक्शे से और दूसरा स्वभाव से । नाक, आँख आदि देखकर पहचाना। यह याददाश्त में रखा हुआ है कि उसका रूप ऐसा है । दूसरा स्वभाव से जानता है कि कैसा है। पूछा जाता है कि फ़लाना कैसा है ? क्यों पूछा जा रहा है ? कर्म से कैसा है, स्वभाव से कैसा है, क्रिया से कैसा है, यह पूछा जा रहा है। कहता है कि अच्छा है । धोखा नहीं दे रहे हैं, परमार्थी हैं, पीड़ा नहीं दे रहे हैं तो अच्छा है । आत्मा को भी देखते हैं । आत्मा कहाँ है ? स्वभाव भी देखते हैं। ढाँचा तो बड़ा निर्मल है। यह स्त्री भी नहीं है, पुरुष भी नहीं है। पंच भौतिक तत्व भी नहीं है । यानी वायु भी नहीं, आग भी नहीं । परमात्मा का अंश है । बहुत निर्मल है। यह छोटी भी नहीं है, बड़ी भी नहीं है । अजर, अमर है । इसका ढाँचा भी निराला है । कमती - बढ़ती भी नहीं है । कभी भी नाश नहीं होती। मजबूत है । नित्य है । इसका बाहरी स्वरूप बड़ा ज़ोरदार बनावट भी मजबूत है । तत्वों से परे है । जहाँ भी तत्व हैं, वहाँ विनाश है। पृथ्वी का विनाश जल कर देता है, जल का विनाश आग कर देती है, आग का विनाश हवा कर देती है और हवा का विनाश आकाश कर देता है । पर आत्मा इनसे परे है। अब आत्मा के गुण देखते हैं । इसे आत्मदेव कहते हैं, कोई राक्षस

नहीं। इसमें ज्ञान है, विचार है, दोष नहीं हैं, निर्मल है, क्रोध नहीं है, लोभ भी नहीं है, हिंसा भी नहीं है, विकार भी नहीं हैं । विवेक है, आनन्द है । शील भी है, संतोष भी है। वे ही सद्गुण हैं, जो प्रभु में हैं। रामायण भी कह रही है—

ईश्वर अंश जीव अविनाशी । चेतन अमल सहज सुखरासी ॥

सो माया बस भयो गुसाईं । बंध्यो कीर मरकट की नाईं ॥

यह अनाश्रित भी है। इसे किसी का सहारा नहीं चाहिए। यानी यह बाहरी संसाधनों पर निर्भर नहीं है । शरीर तो निर्भर है। पानी न मिले तो नष्ट हो जायेगा, हवा न मिले तो समाप्त हो जायेगा। पर आत्मा को ये समस्याएँ भी नहीं हैं। बड़ी आनन्दमयी है, अविनाशी है । यह है इसका स्वभाव, यह है इसकी प्रवृत्ति । बड़ी शील है आत्मा । पर कहाँ खो गयी है ? किसी में जो कुछ भी दिख रहा है, अनात्म दिख रहा है, मन का परिवार दिख रहा है। जो भी दिख रहा है, आत्मा नहीं है । जैसा कर्म मनुष्य कर रहा है, उसे आत्मा नहीं कहा जा सकता है। सबमें देखो, लोभ है, अहंकार है, घृणा है । रूह गयी कहाँ है ? यही आत्मा है क्या? यही है तो फिर निर्मल नहीं कही जा सकती है। यह बहुत बुरी तरह से जकड़ी है। जो दिख रहा है, मन दिख रहा है, दोष दिख रहे हैं, क्रूर परिवार दिख रहा है। आत्मदेव गुम हो गया है। इसलिए तो आत्मसाक्षात्कार की ज़रूरत है । सभी कह रहे हैं कि आत्मा को जानें। बड़ी बिडंबना है कि इसी से विचार कर रहे हैं और पता नहीं चल रहा है । आत्मा को भ्रमित करने वाली सत्ता इसे निकलने नहीं दे रही है, समझने नहीं दे रही है ।

बहु बंधन ते बाँधिया, एक विचारा जीव ।

जीव विचारा क्या करे, जो न छुड़ावे पीव ॥

यह पूरा आत्मा का बंधन है।

प्रबल अविद्या का परिवारा ॥

यह अविद्या का परिवार है । गोस्वामी जी भी कह रहे हैं-

जड़ चेतन है ग्रंथ पड़ गयी । यद्यपि मिथ्या छूटत कठिनई ॥

यही शब्द साहिब कह रहे हैं कि कहीं जकड़न में है आत्मा ।

पार लगन को हर कोई चाहे । बिन सतगुरु कोई पार न पावे ॥

पर गुरु की इतनी महिमा है कि बदल देगा। दुनिया का झूठा धर्म है। मैंने आपको छल, कपट आदि से युक्त मन का गंदा धर्म छुड़ाकर बदल दिया।