करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 65, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंनहीं। इसमें ज्ञान है, विचार है, दोष नहीं हैं, निर्मल है, क्रोध नहीं है, लोभ भी नहीं है, हिंसा भी नहीं है, विकार भी नहीं हैं । विवेक है, आनन्द है । शील भी है, संतोष भी है। वे ही सद्गुण हैं, जो प्रभु में हैं। रामायण भी कह रही है—
ईश्वर अंश जीव अविनाशी । चेतन अमल सहज सुखरासी ॥
सो माया बस भयो गुसाईं । बंध्यो कीर मरकट की नाईं ॥
यह अनाश्रित भी है। इसे किसी का सहारा नहीं चाहिए। यानी यह बाहरी संसाधनों पर निर्भर नहीं है । शरीर तो निर्भर है। पानी न मिले तो नष्ट हो जायेगा, हवा न मिले तो समाप्त हो जायेगा। पर आत्मा को ये समस्याएँ भी नहीं हैं। बड़ी आनन्दमयी है, अविनाशी है । यह है इसका स्वभाव, यह है इसकी प्रवृत्ति । बड़ी शील है आत्मा । पर कहाँ खो गयी है ? किसी में जो कुछ भी दिख रहा है, अनात्म दिख रहा है, मन का परिवार दिख रहा है। जो भी दिख रहा है, आत्मा नहीं है । जैसा कर्म मनुष्य कर रहा है, उसे आत्मा नहीं कहा जा सकता है। सबमें देखो, लोभ है, अहंकार है, घृणा है । रूह गयी कहाँ है ? यही आत्मा है क्या? यही है तो फिर निर्मल नहीं कही जा सकती है। यह बहुत बुरी तरह से जकड़ी है। जो दिख रहा है, मन दिख रहा है, दोष दिख रहे हैं, क्रूर परिवार दिख रहा है। आत्मदेव गुम हो गया है। इसलिए तो आत्मसाक्षात्कार की ज़रूरत है । सभी कह रहे हैं कि आत्मा को जानें। बड़ी बिडंबना है कि इसी से विचार कर रहे हैं और पता नहीं चल रहा है । आत्मा को भ्रमित करने वाली सत्ता इसे निकलने नहीं दे रही है, समझने नहीं दे रही है ।
बहु बंधन ते बाँधिया, एक विचारा जीव ।
जीव विचारा क्या करे, जो न छुड़ावे पीव ॥
यह पूरा आत्मा का बंधन है।
प्रबल अविद्या का परिवारा ॥
यह अविद्या का परिवार है । गोस्वामी जी भी कह रहे हैं-
जड़ चेतन है ग्रंथ पड़ गयी । यद्यपि मिथ्या छूटत कठिनई ॥
यही शब्द साहिब कह रहे हैं कि कहीं जकड़न में है आत्मा ।
पार लगन को हर कोई चाहे । बिन सतगुरु कोई पार न पावे ॥
पर गुरु की इतनी महिमा है कि बदल देगा। दुनिया का झूठा धर्म है। मैंने आपको छल, कपट आदि से युक्त मन का गंदा धर्म छुड़ाकर बदल दिया।