भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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फैलाने वाले भी हैं, जो जीवों को भ्रमित करके काल - पुरुष की ही भक्ति में लगा रहे हैं। पर यदि कोई संत या संत का दास उसे सच्चाई बता दे कि उसके माता-पिता कौन हैं और उसे समझ आ जाए कि उसके असली माता-पिता कौन हैं, और फिर भी वो कहता फिरे कि मैं एक माता-पिता को छोड़कर दूसरे के पास नहीं जा सकता तो कैसा है ? विचार तो करो कि आप कर क्या रहे हैं ! जो आप कर रहे हैं, वो कितना सही है, इस पर विचार करो ! कितनी उलटी बात कर रहे हैं ! जिस परम पुरुष की भक्ति करनी चाहिए, उसकी करते नहीं और जिसकी नहीं करनी चाहिए, उसी की भक्ति सब कर रहे हैं।

ऐसे जग जीव ज्ञान चलाई । धर्मदास तोहि कथा सुनाई ॥

यही जगत की उलटी रीती । नाम न जाने काल सों प्रीती ॥

साहिब कह रहे हैं, हे धर्मदास ! इस संसार के जीवों की उलटी रीति है; वे सत्य नाम को नहीं जानते हैं और उलटा काल-पुरुष से ही प्रीत करते हैं, उसी की भक्ति करते हैं, उसे ही अपना सच्चा साहिब जानते हैं। खैर, पहले तो कोई मानता ही नहीं है, विचार ही नहीं करता है, लड़ने को आ जाता है । साहिब भी कह रहे हैं-

प्रेमी खोजत मैं फिरूँ, प्रेमी मिला न कोय ।

जासो कहिये भेद को, सो फिर बैरी होय ॥

कह रहे हैं कि उस साहिब का प्रेमी खोजता फिरता हूँ, पर कोई भी अपने सच्चे साहिब का प्रेमी नहीं मिलता है । जिससे भी उस सच्चे साहिब का भेद कहता हूँ, वो तो दुश्मन ही हो जाता है। समझ आने के बाद की बात तो दूर की बात है, पर पहले कोई आसानी से समझता ही नहीं है, मानने को तैयार ही नहीं होता है। साहिब कह रहे हैं-

काल का जीव माने नहीं, मैं कोटिन कहूँ समझाय ।

मैं खींचत हूँ सतलोक को, यह बाँधा जमपुर जाय ॥

काल - पुरुष की भक्ति करने वाला जीव मानता ही नहीं है । साहिब कह रहे हैं कि मैं इसे परम-पुरुष का रहस्य देकर सत्लोक ले जाना चाहता हूँ, पर यह है कि मानता ही नहीं, यमपुर में ही बाँधा हुआ जा रहा है।

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