भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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नाम के पहले और बाद में

इस भवसागर से पार होने के लिए नाम चाहिए, यह तो आज इंसान समझ चुका है। नाम की महिमा को भक्त लोग समझ चुके हैं। गोस्वामी जी ने रामचरितमानस में बड़ा सुंदर कहा- राम एक तापस तिय तारी । नाम कोटि खल कुमति उबारि । कह रहे हैं कि रामचंद्र जी ने तो एक तपस्वी की स्त्री (अहिल्या) का ही उद्धार किया, पर नाम की ताक़त से करोड़ों पापी तर गये । इसलिए आगे कह रहे हैं—

ब्रह्म राम तें नामु बड़, बर दायक बरदानि ।

रामचरित सत कोटि महँ, लिय महेस जियँ जानि ।।

नाम को सगुण राम और निर्गुण ब्रह्म, दोनों से बड़ा कह रहे हैं। नाम की महिमा का वर्णन करते हुए एक स्थान पर तो तुलसीदास जी ने यहाँ तक कह डाला है—

कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई । राम न सकहिं नाम गुन गाई ।।

उस निर्वाण-पद की प्राप्ति कराने वाला मूल नाम ही सबका राजा है। यह कहने-सुनने से परे है । यह अजर, अमर नाम है। यह आनन्द का देने वाला नाम सगुण और निर्गुण दोनों से परे है। साहिब कह रहे हैं-

मूल नाम निज सार है । सब सारन के सार ।

जो कोई पावे नाम को, सोई हंस हमार ॥

कह रहे हैं कि यह मूल नाम सबका सार है। जो इस नाम को पा लेता है, वो हमारा हंस हो जाता है । साहिब फिर कह रहे हैं- मूल नाम निज सार है, कही पुकार पुकार । जो पावे सो बाचई, नहीं तो काल

पसार ॥