करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंकह रहे हैं कि मूल नाम ही सार है, मैं पुकार - पुकार कर यह बात बोल रहा हूँ। जो सद्गुरु द्वारा इस नाम को पायेगा, वही काल से बच सकता है, अन्यथा काल का ग्रास ही बनना पड़ेगा, क्योंकि सब जगह काल का ही जाल फैला हुआ है। काल बली तिहुँ लोक में, जीव शीव के नाथ। मूल नाम जो पावई, सो चले हमारे
साथ ॥
तीनों लोक में प्रबल काल का जाल फैला हुआ है। वो सब जीवों और ईश्वरों का मालिक है। पर जो मूल नाम को पा लेता है, वो इसके चंगुल से छूटकर हमारे साथ हमारे देश में चलता है।
धर्मदास मैं सत्यहि भाखा । तुमसे गोय कछु नहिं राखा ॥
चौदह अरब ज्ञान मैं भाखा । मूल नाम गुप्त करि राखा ॥
मूल नाम है सबके भेदा । पावे हंसा होय अखेदा ॥
गुप्त प्रगट हम तुमसे भाखा । पिण्ड ब्रह्माण्ड के ऊपर राखा॥
कहा कि मैंने तुमसे सत्य - सत्य बात कही, कुछ भी गुप्त नहीं रखा। चौदह अरब ज्ञानी की बातें तुमसे कहीं, पर मूल नाम को गुप्त ही रखा। मूल नाम में ही सबका भेद छिपा है। जो हंस उस नाम को पा लेता है, उसके सारे दुख समाप्त हो जाते हैं । मैंने तुमसे गुप्त नाम को प्रकट करके बताया और पिण्ड - ब्रह्माण्ड से ऊपर कर दिया ।
मूल नाम प्रगट नहिं करिये । यहि नाम को गुप्तहिं थरिये ॥
मूल नाम सो जीव उबारा। और नाम प्रगट संसारा॥
मूल नाम जाके घट आवें । सो हंसा सत्य लोक सिधावें ॥
मूल नाम की पावे डोरी । टूटे घाट अठासी करोरी ॥
युगन युगन लेई अवतारा। मूल नाम सो हंसा उबारा ॥
मूल नाम गुप्त तुम राखो । सत्त नाम प्रगट तुम भाखो ॥
कोटि कर्म हंस के होई । मूल नाम सो डारो धोई ॥
नीर पवन का भेद अपारा। मूल नाम इन्हुँ ते न्यारा॥
मूल नाम बिनु मुक्ति न होई । लाख ज्ञान कथे सो कोई ॥
अकह नाम जीव के सारा । पावे हंसा होय भवपारा ॥
साहिब कह रहे हैं कि इस गुप्त नाम को प्रगट नहीं करना है, गुप्त ही