भारतकोश
करूँ जगत से न्यार

करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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तो यदि समाज में पाप का बर्चस्व हो गया है तो चिंतन करना होगा । देखना होगा कि भक्ति का स्वरूप कैसा है । इस समय जो भक्ति का स्वरूप देख रहे हैं, क्या ठीक है ! यदि कोई त्रुटि है तो वो कहाँ है ? समाज में पाप बहुत फैल गया है। भ्रष्टाचार, क्रूरता आदि फैल गयी है। यह अधिक है। मुझसे एक पत्रकार ने सवाल किया। वो बहुत प्रासंगिक था। सवाल था कि चारों ओर भक्ति के माहौल को देखकर क्या लगता है कि आज इंसान भक्ति की तरफ झुक रहा है ? मैंने कहा- नहीं । मेरा ऐसा दृष्टिकोण है कि जितना आज इंसान भक्ति से दूर है, इतना कभी भी नहीं था । यदि इतिहास उठाकर देखें तो पता चलेगा कि आज इंसान भक्ति से बहुत दूर हो गया है। यदि आज भक्ति का माहौल होता तो मानव में आज हिंसा, अनीति, भ्रष्टाचार आदि कैसे होता! यानी वर्तमान में भक्ति के स्वरूप में दोष है । आज उसे मजबूरन भक्ति की तरफ खींचा गया है। जैसे व्यापारी ग्राहक को आहुत करता है, जैसे राजनीतिक पार्टी करती है, ऐसे ही हरेक मत-मतांतर इंसान को अपनी ओर खींचने का प्रयास कर रहा है । यह एक मत की बात नहीं है । हम देख रहे हैं कि धर्म में प्रतिस्पर्द्धा आ गयी है । कोई भी फ्री नहीं है । हरेक पर किसी-न- किसी मत की मोहर लगी हुई है। वर्तमान में धर्म प्रचारक क्या चाह रहे हैं ? क्या वे इंसान की मुक्ति चाह रहे हैं ? यदि इंसान भक्ति की तरफ है तो समाज में अपराध नहीं होना चाहिए था ।

भक्ति स्वतंत्र सकल गुण खानी । बिनु सत्संग न पावत प्राणी ॥

भक्ति तो सकल गुणों को उत्पन्न करने वाली है । प्रेम, दया, क्षमा, विवेक आदि भक्ति के लक्षण हैं । जब भी इंसान भक्ति करेगा तो उसमें ये सद्गुण आयेंगे। पर वर्तमान में कहीं प्रेम दिखाई नहीं दे रहा है, कहीं अपनापन दिखाई नहीं दे रहा है । भक्ति के लक्षण दिखाई नहीं दे रहे हैं । भक्ति को क्या हो गया है ! समाज में रोग बहुत हो गये । इस पर आम लोगों की राय ली गयी । शोध किया गया तो कारण साफ़ था । उसमें यह नज़र आया कि वायुमण्डल प्रदूषित हो रहा है। रोगों का कारण मिला कि भोजन दूषित खा रहे हैं, जिसमें ज़हरीले केमिकल्स हैं, यूरिया बगैरह है । फिर हरेक चीज़ में मिलावट है । फिर प्रदूषण के कारण शुद्ध जलवायु नहीं मिल पा रही है।