भारतकोश
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करूँ जगत से न्यार

Karun Jagat Se Nyaar

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

Devanagarihipublished264 पृष्ठ

14. आप दुनिया से निराले हो गये हैं

आप दुनिया से निराले हो गये हैं

हम अपने सामने भक्ति का स्वरूप देख रहे हैं। एक चीज़ देख रहे हैं। कई पंथ समाज में शामिल हो गये; घुल-मिल गये। पर समाज ने साहिब- बंदगी वालों को खुले हृदय से शामिल नहीं किया। कभी सवाल उठता होगा कि क्या बात है; हमसे घृणा क्यों है ? यह विचार आता होगा। आप किसी से मैच नहीं हो रहे हैं । जितने भी मत-मतान्तर हैं, समाज ने उन्हें अपने में आत्मसात् कर लिया यानी स्वीकार किया। आपको समाज आत्मसात् नहीं कर पाया । आत्मसात् का मतलब है कि मान्यता देना। एक ने कहा कि ये मुसलमान भी नहीं हैं, ईसाई भी नहीं हैं, आर्यसमाजी भी नहीं हैं, सनातनी भी नहीं हैं। ये क्या हैं? सही में आपके पंथ को समझना बड़ा मुश्किल है। आप समझ सकते हैं। फ़र्क़ इतना है कि आप आन्तरिक दृष्टि से मजबूत हैं। इस तरह एक सवाल उठा कि समाज ने आपको आत्मसात् क्यों नहीं किया? बाकी ने समाज से समझौता किया। हमने समझौता नहीं किया। अगर कर लेंगे तो हमें आत्मसात् कर लेंगे। जिन-जिन्होंने समाज से समझौता कर लिया, वो पंथ बेहद कमज़ोर हो गये, क्योंकि उन्होंने सामाजिक कुरीतियों का पालन करना शुरू कर दिया। अब सवाल उठा कि आपसे शिकायत कहाँ पर है ? कहाँ पर आप भिन्न हो रहे हैं? सुनें। सबसे पहले हम देखते हैं कि आख़िर आपका भक्ति-सूत्र क्या है ? यह विरोध किन बिंदुओं पर है ? हम कह रहे हैं कि सत्य बोलना, माँस न खाना, शराब न पीना, हक की कमाई खाना, चोरी न करना, जुआ न खेलना, चरित्रवान् रहना । इसमें से कौन-सा नियम समाज के ख़िलाफ़ जा रहा है? कौन सी चीज़ समाज के विरुद्ध जा रही है ? इसमें तो विरोध की गुंजाइश नहीं है। दूसरा, भक्ति हमने एक परम-पुरुष की बोली। कोई अलग सिद्धान्त तो नहीं बताया न ! हमारे से मिलते-जुलते कई अन्य पंथों के भी नियम हैं। सभी धर्मों में दो धाराएँ हैं और सभी में टकराव है। मुसलमानों में शिया और सुन्नी में भयंकर लड़ाई है। लड़ाई की वजह क्या है ? शिया 6 में

से 2 पैगंबरों को मानते हैं, इसलिए मतभेद है । दूसरा सुन्नी का मानना है कि शिया जिसे भी कुछ खिलाते हैं, पहले उसमें थूकते हैं । पानी का भी गिलास देंगे तो थूकते हैं पहले। भोजन भी खिलायेंगे तो थूकेंगे। ऐसे में कहते हैं कि भाई हो गया। मेरे ऊपर लगे आरोपों में बड़े शातिर लोग हैं । जो विरोध में काम कर रहे हैं, आपने गंभीरता से विचार नहीं किया है । यह ऑइडिया उनका अपना नहीं है। यह सुन्नी लोगों का ऑइडिया है । इसलिए घोर विरोध है । भयंकर लड़ाई होती है दोनों में । इस तरह हिंदुओं में भी सनातनी और आर्य समाजी हैं। दोनों में विरोध है। जैनियों में भी श्वेतांबर और पीतांबर का मतभेद बड़ा है । इसी तरह हमारे समकक्ष चलने वाले कुछ पंथ हैं, जो हमसे मिलती-जुलती बातें बोल रहे हैं। वो भी शाकाहारी हैं। वो भी एक परम-पुरुष की बातें कर रहे हैं । यहाँ सवाल है कि उनका विरोध क्यों नहीं है ? शुरू में हुआ। पर फिर उन्हें समाज ने आत्मसात् कर लिया। आपको आत्मसात् नहीं कर पाया। हम समाज को अपने में आत्मसात् करते हैं। आपसे कहीं बेहतर विरोधियों ने मुझे समझा। उन्होंने ठीक समझा । उन्हें लगा कि इनके नक्शेकदम पर चले तो हमारी पूरी दुकानें ख़त्म हो जायेंगी । दयानन्द सरस्वती से भी अधिक विरोध हुआ है मेरा । मेरी विरोध बड़े व्यापक पैमाने पर हुआ । यह मत सोचना कि यह यहीं पर है । जहाँ भी मेरा आदमी है, वहाँ विरोध है । हमारे समकक्ष वालों को समाज ने क्यों आत्मसात् कर लिया ? वो कमज़ोर निकले। उन्होंने समाज की बातें मंजूर कीं। भूत-प्रेत, जादू-टोना, ग्रह-नक्षत्र, तंत्र-मंत्र आदि सब मानने लगे। धीरे-धीरे वो अपनी रंगत छोड़ समाज की धारा में आ गये । अब केवल एक मोहर रह गयी है। मैंने संगत को ताक़त लगाकर इन कुरीतियों से रोका; जगह-जगह जाकर जागृति की । इसमें समझौता नहीं किया । जिन्होंने इन कुरीतियों को नहीं माना, उन्हें समाज ने बाहर का रास्ता दिखाया। मुझे चिंता थी कि कहीं हम भी ऐसे न हो जाएँ, क्योंकि मैं ठीक से जानता था कि अगर ऐसा किया तो डूबेंगे पक्का । पर वो तबका आदमी को विवश करता है, ताक़त लगाकर ले जाता है, घुमा-फिराकर उलझाकर ले जाता है। मैं मुस्तैद रहा। दूसरी बात यह है कि आपके पास रूहानी शक्ति है। जो आपने अनुकरण

किया, आपकी महिमा नहीं थी । अगर आप अपने समकक्ष देखें तो बाकी सब कुछ मान रहे हैं, बकरा भी चढ़ा रहे हैं, जादू-टोना, भूत-प्रेत भी मान रहे हैं, अन्य काम भी कर रहे हैं । मैं जो भी बात करता हूँ, सही होती है। झूठ से सावधान हूँ । माँस खाने से सेहत ख़त्म हो जाती है, झूठ बोलने से अक्ल ख़त्म हो जाती है। झूठे लोग अपने में ही उलझे रहते हैं । उनकी बातों में एकबात नहीं होती है । यहाँ पर जो पाबन्दियाँ हैं, नानी का दूध याद आ जाता है । साहिब के मार्ग में आना कोई बच्चों का खेल नहीं है । मेरा आदमी नाम लेकर झिझकेगा, भयभीत हो जायेगा। मैं जो बातें बोल रहा हूँ, अपने पर लागू करके फिर आपसे बोल रहा हूँ। तो हमारे समकक्ष चलने वाले पंथ हैं, जो समान बात कर रहे हैं । पर उनका विरोध नहीं है । आर्य समाजी देवताओं को नहीं मान रहे हैं । उनका कोई विरोध नहीं है। हमारे समकक्ष वालों का विरोध नहीं है । हमारा विरोध क्यों है ? हमने ग्रह-नक्षत्र नहीं माने, भूत-प्रेत नहीं माने, हमने जादू- -जंत्र नहीं माने ।

तंत्र मंत्र सब झूठ है, मत भरमो कोय ।

सार नाम पाय बिना, कागा हंस न होय ।।

हमने कहा कि ये नहीं मानना है । यहीं पर वो ज़्यादा आक्रांता हैं । उन्होंने महसूस किया कि ये मजबूत हैं । और मैं बहुत वज़न दे रहा हूँ इस पर । आपको एकाग्र इस बात पर नहीं कर रहा हूँ कि बहुत नाम करना, ध्यान करना। मुख्य रूप से नहीं कह रहा हूँ कि सेवा ही करना । अगर एकाग्र कर रहा हूँ तो एक ही बात पर कि नियम पर चलना, भक्ति मजबूती से पकड़ना ।

खेलना हो तो खेलिये, पक्का होकर खेल ।

कच्ची सरसों पेर के, खड़ी भया न तेल ।।

यह तबका समाज को विवश करता है। इनकी समाज में पकड़ है। ये लोग समाज में बड़े औहदे पर बैठे हैं। यह तबका ताक़त से मजबूर करता है । इसका चैनल तगड़ा है। इसलिए मैंने संगत के लिए द्वार खोला है । कभी भी फ़ोन करके पूछ लो । मेरा आदमी पाखण्डियों के निशाने पर है। वो धर्म बदलने

का बहाना लगा देते हैं । आपका विरोध रहना - ही - रहना है, क्योंकि जब तक समाज में पाखंड है, विरोध रहना है । फिर बाकी कहीं-न-कहीं निरंजन को पकड़े हैं। मैंने आपको पीवर भक्ति दी है। आपपर निरंजन का आंतरिक हमला भी है और बाहरी भी । इसकी यह वजह रही कि नाना मत-मतान्तरों को उस तबके ने, जिसने भूत-प्रेतों के नाम पर, जादू- जड़ी के नाम पर, जिसे संत - वाणी में पाखंडी तबका कहा, अपने में विलीन कर लिया, अपने में मिला डाला। उन्हें मजबूर किया गया कि हत्या मानो; उन्हें मजबूर किया गया कि ग्रह मानो और वो झांसे में आ गये। उन्होंने स्वीकार किया। हम सावधान रहे। हमारी संगत ये चीजें नहीं मान रही है । मैंने अभियान चलाया, क्योंकि इससे भक्ति को नुक़सान होगा। हम कह क्या रहे हैं ? पहली कह रहे हैं कि सत्य ही हमारा संचेतक है। सत्य हमारा मोनो है । पहले भी कहा कि जो भी शामिल होता है, सात नियम बताते हैं । सत्य बोलना, माँस न खाना, शराब न पीना, जुआ न खेलना, चरित्रवान् रहना, हक की कमाई करना, चोरी न करना । मेरे विचार से इसमें से कोई भी नियम समाज के ख़िलाफ़ नहीं है । कोई भी नियम समाज को नुक़सान पहुँचाने वाला नहीं है । और हम समानता और मानवता की बात कर रहे हैं। कुछ पंथ जातिवाद फैलाकर कट्टारवाद फैला रहे हैं । हम यह नहीं फैला रहे हैं । एक बार एक पत्रकार ने पूछा कि आपकी उपलब्धि क्या है? मैंने कहा कि दो बड़ी उपलब्धियाँ हैं । एक तो कश्मीर से कन्याकुमारी तक साहिब की भक्ति में सभी छोटे तबके के लोग हैं। मैंने साहिब की भक्ति में 75 हज़ार ब्राह्मणों को, 75 हज़ार ठकुरों को, 75 हज़ार महाजनों को लाया है। मैंनें सबको समझा दिया कि यह भक्ति क्या है । मेरे लोग अनुकरण कर रहे हैं । उपासना की पद्धति हम एक पकड़े है। इसमें भी विरोधाभास की जगह नहीं है, कोई गुंजाइश नहीं है । जैसा कि पहले भी बताया कि समाज, धर्म और मनुष्य तीन मुद्दों पर लड़ रहा है। पहली बात यह कि दुनिया परमात्मा के रूप पर लड़ाई कर रही है । कोई कह रहा है कि शिवजी हैं; कोई हनुमान जी के लिए कह रहा है। दुनिया इस बात के लिए लड़ाई नहीं कर रही है कि परमात्मा है या नहीं। पूरा मानव- समाज स्वीकार कर रहा है। इसके लिए लड़ाई नहीं है। उसकी शक्लोसूरत पर लड़ाई है।

कोई कहे हलुका कोई कहे गरुआ । फिर प्रभु के मकान के बारे में लड़ाई है कि कहाँ रहता है। दिल में खोजो दिल में खोजो । यहीं करीमा रामा ।। पूर्व दिशा हरि को वासा । पश्चिम अल्लह मुकामा । यानी दूसरा उसके ठिकाने के लिए लड़ाई है।

कोई कहे काशी कोई हे मथुरा।

कोई काबे कैलाश बतावे ।।

तीसरी लड़ाई यह है कि उसतक जाने का रास्ता क्या है ।

कोई कहे कर्म अधीना । कोई कहे भाग्य अधीना ।।

इतना अक्लमंद आदमी क्यों लड़ रहा है इन मुद्दों पर ? क्या धर्म- शास्त्र हमें मदद कर सकते हैं इस विषय पर ? हाँ ! पहली बात है परमात्मा की शक्ल सूरत के बारे में । इस पर भी धर्म - शास्त्र बोल रहे हैं । इस विषय पर लड़ाई नहीं है। लड़ाई की भूमिका कुछ और है । यह सुनिजोयित तरीके से लड़ाई है। शास्त्रों में लिखा है-

जेते दृश्यम तेते अनित्यम । जेते अदृश्यम तेते नित्यम।।

और वो इंद्रियातीत है, व्योमातीत है, शब्दातीत है, पंच भौतिक तत्वों से परे है। फिर विवाद खड़ा क्यों हो गया है? वो इंद्रियों से भी जाना जाने वाला नहीं है। यानी लड़ाई बेकार है। नहीं! दूसरा विवाद स्थान के बारे में है। साहिब ने कहा- तू मौको कहाँ ढूँढ़े रे बंदे, मैं तो तेरे पास में । ना मैं देवल ना मैं मस्जिद, नहीं काबे कैलास में ।

.... भँवर गुफा में मैं ना रहता, नहीं अनहद के वास में ।।

खोजी होय तुरत मिल जाऊँ, एक पलक तालाश में ।। कहत कबीर सुनो भाई साधो, हर स्वांसों की स्वांस में ।।

वेद भी अंदर में ही प्रभु को बता रहा है; गीता भी यही कह रही है कि हे अर्जुन, तुम्हारी आत्मा में ही उसका वास है । तो लड़ाई क्या है ? लड़ाई जानबूझकर है । जानबूझकर इंसान को उलझाया गया है। अनादिकाल से इंसान को उलझाया गया है । रामायण भी यही कह रही है-

प्रकृति पार प्रभु सर्व उर वासी ।।

फिर क्यों भटकाया जा रहा है ? यहाँ भी पहले से ही प्लैन है । इस बात पर संतों ने हमला किया और जान गँवानी पड़ी। उसके पास जाने की गाइडिंग मिल रही है क्या ? हाँ ।

कोई कहे तप है सारा । कोई कहे भाग्य अनुसारा।।

कोई कहे ज्ञान है भाई। कोई कहे कर्म बस आई ।।

फिर सूत्र क्या है उसके लिए - गुरु । कुछ कहते हैं कि देवी-देवताओं की भक्ति छोड़कर एक इंसान की भक्ति कर रहे हैं । ऐसा जाहिल ही कहेंगे । मैं अपवाद वाली बातें नहीं कर रहा हूँ। ऋग्वेद से लेकर महापुरुषों की वाणियों में सबमें गुरु की महिमा का वर्णन मिलता है। तो विरोध करने वाला सब गंदे काम भी कर रहा है । हम तो सच्चे सनातनी हैं। वो छल भी कर रहा है, माँस भी खा रहा है। वो हमारे लोगों को कहते हैं कि धर्म छोड़ दिया । विचार करो कि हम हक की कमाई खा रहे हैं, माँस नहीं खा रहे, शराब नहीं पी रहे । इतना कठिन जीवन कलिकाल में जी रहे हैं। तू कौन-सा धर्म वाला है, कौन - सा देवते वाला है । मैं भयभीत नहीं होता हूँ । कम-से-कम उदंड नहीं हूँ । कम-से-कम सही बोल रहे हैं न! आक्रांता होता नहीं हूँ। तुम्हें तो कहना चाहिए कि धन्य हो साहिब बंदगी वाले; इतना उत्तम जीवन है । उलटा कह रहे हो । वाह, हम बेधर्म हो गये जबकि खुद सब गंदे काम कर रहा है ।

निरंजन धन तुमरो दरबार ।।

रंग महल में बसें मसखरे, पास तेरे सरदार |

बेश्या ओढ़े खासा मलमल, गल मोतियन के हार ।

पतिव्रता को मिले न खादी, रूखा निरस अहार ।।

पाखंडी को जग में आदर, सच को कहें लबार ।

धूर धूप में साधु विराजे, भये जो भवनिधि पार ।।

निरंजन धन तुमरो दरबार ।।

साहिब फिर कह रहे हैं- कामी कबीर कलयुग आ गया, संत न पूजे क्रोधी आलसी, इनकी पूजा होय ।। कोय । इसलिए जो ऐसी बातें बोल रहे हैं, वो पाप-कर्म करने वाले हैं।

उनकी बातों की तरफ ध्यान मत दो; अपना काम करते चलो। कुत्ते के भौंकने से हाथी पर बैठे आदमी को परेशान नहीं होना है। हम कहीं भी बदमाशी वाला काम नहीं कर रहे हैं । बाकी कोई भी यात्रा निकालता है तो रोड़ ब्लाक कर देते हैं । हमारे साथ तो कितना नाजायज़ व्यवहार किया गया । 12 आश्रम जला दिये गये । जहाँ भी हमारे पोस्टर देखते हैं, फाड़ देते हैं। ये सब काम बदमाशों वाले हैं। मैं कहता हूँ कि हम विचारवान् हैं । बस, इतना है कि हम दृढ़ हैं अपनी जगह। 24 साल नौकरी करते-करते मुझे सभी पंथों, जातियों के लोगों को पढ़ने का मौका मिला। मेरी बटालियन में सभी पंथ के लोग थे। तो देखा कि क्या कर रहे हैं। वहाँ भी एक महत्वपूर्ण काम किया। मैं पी.सी. इन्स्ट्रक्टर् भी रहा। यह काम आर्मी स्कूल में किया। जो जे. सी. ओ का कोर्स करने जाते हैं, वो वहाँ आते हैं। उन्हें पढ़ाना होता है । वहाँ भी समझा। वहाँ देखा तो उनमें कोई रूहानियत न मिली। बारीकी से देखा तो संत-मत की बात भी कर रहे थे, पर धीरे से अँधेरे में दारू भी पी लेते थे, मीट भी खा लेते थे, बाकी काम भी कर लेते थे, गाली भी बक देते थे। मैंने देखा कि इनका वाणी पर भी कोई कण्ट्रोल नहीं है, अन्य इंद्रियों पर भी नहीं है । मन पर कोई कण्ट्रोल ही नहीं है । आप भी तो अपने रिश्तेदारों में, पड़ौस में देखते होंगे तो पाते होंगे कि सभी पंथों से जुड़े लोग हैं; वो सभी काम करते हैं। वो आपकी भक्ति पर भी हमला करना चाहते हैं। क्योंकि ये सब काल के पंथ हैं। जो कबीर साहिब की बात कर रहे हैं, वो भी वास्तव में काल के ही पंथ हैं। क्योंकि यह भी निरंजन ने साहिब से विनती करके माँगा हुआ है कि वो उनके 12 पंथों को चलायेगा। इसलिए वहाँ ऊपर से बात तो कबीर साहिब की होती है, पर अन्दर से निरंजन वाला मामला होता है। मोहर कबीर साहिब की होती है, पर नाम निरंजन वाला होता है । यह सब निरंजन ने जीवों को भ्रमित करने के लिए माँगा ताकि सभी जीव अमर लोक न जा पाएँ। साहिब ने भी यह सोचते हुए कि जिसे सच्चा नाम मिलेगा, वो तो पार हो जायेगा और ऐसे में निरंजन का देश जल्दी ही खाली हो जायेगा और फिर 17 चौकड़ी असंख्य युग का राज्य करने का परम पुरुष का शब्द पूरा न हो पायेगा, उसकी यह बात भी मान ली। इसलिए इन पंथों के लोग भी अमर-लोक नहीं जायेंगे । इसलिए इनके लोगों में कोई बदलाव भी नहीं है और ये सब जगह भटक भी रहे हैं। क्योंकि इनके पास सच्चा नाम नहीं है । इनके

पास काया वाला नाम है, जो 52 अक्षर की सीमा में आ जाता है। पर आपको जो नाम दिया, वो विदेह नाम है, वो वाणी का विषय नहीं है। ...तो ये खुद तो भटके हुए हैं, आपको भी परेशान करने में लगे हुए हैं। अभी तक मैंने किसी के लिए कभी भी ऐसी प्लैनिंग नहीं की कि उसे नुक़सान पहुँचाया हो। कहीं भी जगह लेता हूँ तो लोग एकाग्रता से जानबूझकर तंग करते हैं । तो समाज ने आत्मसात् क्यों नहीं किया ? हम होना भी नहीं चाह रहे हैं। बाकी को मरोड़ कर शामिल कर लिया । हमने कहा कि हम अपना नियम नहीं छोड़ने वाले हैं। वो पाखंडी तबका सबल है । सब कुरीतियों में कैसे फँस गये ? उस पाखंडी तबके ने फेंक दिया। फिर हममें विवाद कहाँ है? मैं कह रहा कि हत्या नहीं मानना । वो जबरन हत्या मनवाना चाहते हैं। पूरे समाज में वहम - ही - वहम है। आदमी को विवश किया जाता है। सबका मुकाबला हमारे साथ है। क्योंकि किसी भी पंथ में जान नहीं रह गयी है। कौन-सा संतमत है ! सब काम तो कर रहे हैं । मेरा नामी करे तो दुबारा आने नहीं दूँगा । वो विवश करेंगे; भटकाकर ले जायेंगे। पर मेरा नामी यह सब नहीं कर रहा है। वो निराला हो गया है। | कभी-कभी आपको सोच आती होगी कि आप कहाँ पहुँच गये हैं.....ऐसी जगह, जहाँ की आपने कभी कल्पना भी नहीं की थी । एक आन्तरिक सकून मिला आपको। आप प्यारी रूहें हो गयीं । इतनी प्यारी रूहें कहीं नहीं मिलेंगी। आप अपने को देखते होंगे तो आपको भी प्रेम होगा अपने से । किसी से आपका लगाव नहीं रहा होगा। क्योंकि आप दुनिया से निराले हो चुके हो। आपका व्यक्तित्व शीतल हो गया होगा । दुनिया बेकाबू है, पर आपकी सब चीज़ें कंट्रोल में हैं। सच यह है कि आपको आत्मानन्द भी है । आप होश में हैं, दुनिया बेहोश है। मैं कितना कहूँ ! बस, आप हंस जैसे हो गये हैं, आप साधु हो गये हैं।

पुस्तक सूची

हिन्दी में 1. परा रहस्या 35. नाम बिना नर भटक मरे 4. सद्गुरु चालीसा 3. पावन प्रार्थनाएँ 2. मासिक पत्रिका सत्यकेतु 5. वार्षिक डायरी 38. न्यारी भक्ति 36. रोगों की पहचान 37. यह संसार काल को देशा 39. साहिब तेरी साहिबी सब घट रही समाय 6. सद्गुरु भक्ति 7. कहाँ से तू आया और कहाँ तुझे जाना रे? 8. सत्संग सुधारस 9. नाम अमृत सागर 15. गुरु सुमिरै सो पार 16. तीन लोक से न्यारा 10. अमृत वाणी 12. चल हंसा सतलोक 14. मूल नाम गुप्त है, जाने बिरला कोय 17. सेहत के लिए ज़रूरी 18. सहजे सहज पाइये 19. रोगों से छुटकारा 11. सद्गुरु नाम जहाज़ है 13. कोटि नाम संसार में तिनते मुक्ति न होय 41. आयुर्वेद का कमाल रोगों के निदान में 47. जीवड़ा तू तो अमर लोक का पड़ा काल 48. मुझे है काम 'सद्गुरु से 40. जाप मरे अजपा मरे अनहद भी मर जाए 42. सुरति समानी नाम में 44. निन्दक जीवे युगन युग काम हमारा होय । 45. निराले सद्गुरु 46. कुँजड़ों की हाट में हीरे का क्या मोल 43. सबकी गठरी लाल है, कोई नहीं कंगाल 49. जेहि खोजत कल्पो भये घटहि माहिं सो 50. आत्म ज्ञान बिना नर भटके 51. बिन सतगुरु बाँचे नहीं कोटिन करे उपाय जगत रूठे तो रूठन दे' मूर बस आई हो 20. सद्गुरु महिमा 21. भक्ति के चोर 52. अँधी सुरति नाम बिन जानो 53. सत्यनाम निज औषधि सद्गुरु दई बताय 22. अनुरागसागर वाणी 54. सेहत संजीवनी 23. भक्ति सागर 55. भक्ति दान गुरु दीजिए 25. सत्य नाम के सुमरते उबरे पतित अनेक 26. काग पलट हंसा कर दीना 27. कस्तूरी कुण्डल बसै मृग खोजे बन माहिं 28. गुरु पारस गुरु परस है 30. शीश दिये जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान 33. मैं कहता हूँ आँखिन देखी 29. गुरु अमृत की खान 31. मूल सुरति 32. भृंग मता होय जिहि पासा, सोई गुरु सत्य 34. गुरु संजीवन नाम बतावे 24. हरि सेवा युग चार है, गुरु सेवा पल एक धर्मदासा 59. मुक्ति भेद मैं कहौं विचारी 61. सुरति का खेल सारा है 56. मन पर जो सवार है ऐसा 58. रोग निवारक 60. "तेरा बैरी कोई नहीं 62. सार शब्द निरअक्षर सारा 63. करूँ जगत से न्यार 57. सत्यनाम है सार बूझौ सन्त विवेक करि तेरा बैरी मन" ऐसा विरला कोई