करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआप दुनिया से निराले हो गये हैं
हम अपने सामने भक्ति का स्वरूप देख रहे हैं। एक चीज़ देख रहे हैं। कई पंथ समाज में शामिल हो गये; घुल-मिल गये। पर समाज ने साहिब- बंदगी वालों को खुले हृदय से शामिल नहीं किया। कभी सवाल उठता होगा कि क्या बात है; हमसे घृणा क्यों है ? यह विचार आता होगा। आप किसी से मैच नहीं हो रहे हैं । जितने भी मत-मतान्तर हैं, समाज ने उन्हें अपने में आत्मसात् कर लिया यानी स्वीकार किया। आपको समाज आत्मसात् नहीं कर पाया । आत्मसात् का मतलब है कि मान्यता देना। एक ने कहा कि ये मुसलमान भी नहीं हैं, ईसाई भी नहीं हैं, आर्यसमाजी भी नहीं हैं, सनातनी भी नहीं हैं। ये क्या हैं? सही में आपके पंथ को समझना बड़ा मुश्किल है। आप समझ सकते हैं। फ़र्क़ इतना है कि आप आन्तरिक दृष्टि से मजबूत हैं। इस तरह एक सवाल उठा कि समाज ने आपको आत्मसात् क्यों नहीं किया? बाकी ने समाज से समझौता किया। हमने समझौता नहीं किया। अगर कर लेंगे तो हमें आत्मसात् कर लेंगे। जिन-जिन्होंने समाज से समझौता कर लिया, वो पंथ बेहद कमज़ोर हो गये, क्योंकि उन्होंने सामाजिक कुरीतियों का पालन करना शुरू कर दिया। अब सवाल उठा कि आपसे शिकायत कहाँ पर है ? कहाँ पर आप भिन्न हो रहे हैं? सुनें। सबसे पहले हम देखते हैं कि आख़िर आपका भक्ति-सूत्र क्या है ? यह विरोध किन बिंदुओं पर है ? हम कह रहे हैं कि सत्य बोलना, माँस न खाना, शराब न पीना, हक की कमाई खाना, चोरी न करना, जुआ न खेलना, चरित्रवान् रहना । इसमें से कौन-सा नियम समाज के ख़िलाफ़ जा रहा है? कौन सी चीज़ समाज के विरुद्ध जा रही है ? इसमें तो विरोध की गुंजाइश नहीं है। दूसरा, भक्ति हमने एक परम-पुरुष की बोली। कोई अलग सिद्धान्त तो नहीं बताया न ! हमारे से मिलते-जुलते कई अन्य पंथों के भी नियम हैं। सभी धर्मों में दो धाराएँ हैं और सभी में टकराव है। मुसलमानों में शिया और सुन्नी में भयंकर लड़ाई है। लड़ाई की वजह क्या है ? शिया 6 में