करूँ जगत से न्यार
Karun Jagat Se Nyaar
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 257, कुल 264 में से
संदर्भ में पढ़ेंसे 2 पैगंबरों को मानते हैं, इसलिए मतभेद है । दूसरा सुन्नी का मानना है कि शिया जिसे भी कुछ खिलाते हैं, पहले उसमें थूकते हैं । पानी का भी गिलास देंगे तो थूकते हैं पहले। भोजन भी खिलायेंगे तो थूकेंगे। ऐसे में कहते हैं कि भाई हो गया। मेरे ऊपर लगे आरोपों में बड़े शातिर लोग हैं । जो विरोध में काम कर रहे हैं, आपने गंभीरता से विचार नहीं किया है । यह ऑइडिया उनका अपना नहीं है। यह सुन्नी लोगों का ऑइडिया है । इसलिए घोर विरोध है । भयंकर लड़ाई होती है दोनों में । इस तरह हिंदुओं में भी सनातनी और आर्य समाजी हैं। दोनों में विरोध है। जैनियों में भी श्वेतांबर और पीतांबर का मतभेद बड़ा है । इसी तरह हमारे समकक्ष चलने वाले कुछ पंथ हैं, जो हमसे मिलती-जुलती बातें बोल रहे हैं। वो भी शाकाहारी हैं। वो भी एक परम-पुरुष की बातें कर रहे हैं । यहाँ सवाल है कि उनका विरोध क्यों नहीं है ? शुरू में हुआ। पर फिर उन्हें समाज ने आत्मसात् कर लिया। आपको आत्मसात् नहीं कर पाया। हम समाज को अपने में आत्मसात् करते हैं। आपसे कहीं बेहतर विरोधियों ने मुझे समझा। उन्होंने ठीक समझा । उन्हें लगा कि इनके नक्शेकदम पर चले तो हमारी पूरी दुकानें ख़त्म हो जायेंगी । दयानन्द सरस्वती से भी अधिक विरोध हुआ है मेरा । मेरी विरोध बड़े व्यापक पैमाने पर हुआ । यह मत सोचना कि यह यहीं पर है । जहाँ भी मेरा आदमी है, वहाँ विरोध है । हमारे समकक्ष वालों को समाज ने क्यों आत्मसात् कर लिया ? वो कमज़ोर निकले। उन्होंने समाज की बातें मंजूर कीं। भूत-प्रेत, जादू-टोना, ग्रह-नक्षत्र, तंत्र-मंत्र आदि सब मानने लगे। धीरे-धीरे वो अपनी रंगत छोड़ समाज की धारा में आ गये । अब केवल एक मोहर रह गयी है। मैंने संगत को ताक़त लगाकर इन कुरीतियों से रोका; जगह-जगह जाकर जागृति की । इसमें समझौता नहीं किया । जिन्होंने इन कुरीतियों को नहीं माना, उन्हें समाज ने बाहर का रास्ता दिखाया। मुझे चिंता थी कि कहीं हम भी ऐसे न हो जाएँ, क्योंकि मैं ठीक से जानता था कि अगर ऐसा किया तो डूबेंगे पक्का । पर वो तबका आदमी को विवश करता है, ताक़त लगाकर ले जाता है, घुमा-फिराकर उलझाकर ले जाता है। मैं मुस्तैद रहा। दूसरी बात यह है कि आपके पास रूहानी शक्ति है। जो आपने अनुकरण